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बलात्कार

26 Oct 2015

बलात्कार एक गलत सोच - गिता कोई कहता हैँ बलात्कार लडकीयोँ के कम कपडे पहनने से होते हैँ. कोई कहता लडकीयोँ के जिंस, और स्कर्ट पहनने से होता हैँ. तो कोई कहता लडकीयोँको बाहार घुमने फिरने से होता हैँ. राजनेता तो महीला सुरक्षा के वादे पुरे नहीँ कर पाते तो भी लडकी दोषी होती हैँ. धर्म गुरु तो लडकीयोँ को मर्यादा मेँ रहना सिखाते हैँ. तो आरोँपीयोँ के वकील लडकीओँ को ही दोषी करार देते हुयेँ दलिले देते हैँ. परंतु कोई भगवान के शब्दो पर गौर नहीँ करता. मुझे तो आश्चर्य होता हैँ की धर्म गरु भी भगवान श्रीकृष्ण के बातो को नहीँ समझे पायेँ ! भगवान श्री कृष्णने गिता मेँ बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के बारे मेँ प्रत्यक्षरुप से वर्णन नहीँ किया हैँ परंतु समझनेवालेको ईशारा काफी होता हैँ । ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते । संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ {गिता अ. 2, श्लोक 62 और 63 } अर्थात, हे अर्जुन ! विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की वासना उत्पन्न होती है और वासना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है ॥62॥ क्रोध से अविवेक अर्थात भ्रान्ति निर्माण होती हैँ, भ्रान्ति से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से निश्चयात्मक बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है अर्थात उसका पुर्णता पतन हो जाता हैँ ॥63॥ भगवान की बातो को समझे तो बलात्कार की प्रकिया मनसे शुरु होकार बुद्दी और इद्रीयोँ के तृप्तता पर जा कर खतम होती (1) विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष :- Mobile तथा TV पर Blue Flim, Hot Scenes, Nude Wallpapers देखना । (2) उन विषयों में आसक्ति हो जाती है :- आसक्ति याने बार बार उनको देखने की आदत पड जाना । (3) आसक्ति से उन विषयों की वासना उत्पन्न होती है :- आदत पड जाने से उन विषयोँ को अर्थात स्री भोग भोगने की वासना अर्थात इच्छा प्रबल जागृत होना । (4) वासना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है :- किसी लडकी तथा Girl Friend के साथ सबंध बनाने पर मना करने के कारण वासना मेँ विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है । (5) क्रोध से अविवेक अर्थात भ्रान्ति निर्माण होती हैँ :- अपुर्ण वासना से उत्पन्न हुये क्रोध से अविवेक अर्थात भ्रान्ति यानी सत्य-असत्य का ज्ञान नहीँ रहता । (6) भ्रान्ति से स्मृति में भ्रम हो जाता है :- वासना से क्रोध और क्रोध से अविवेक और अविवेक से स्मृति में भ्रम अर्थात स्मरणशक्ती का नाश हो जाता है और वह पुरुष यह भुल जाता हैँ बलात्कार जघन्य अपराधों है। जिसकी सजा उम्रकैद अथवा मौत तक हो सकती है। (7) स्मृति में भ्रम हो जाने से निश्चयात्मक बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है :- स्मरणशक्ती ना होने से मनुष्य विचार करने निश्चयात्मक शक्ति अर्थात ज्ञानशक्ती खो देता है और वासना तृप्ती के लिये प्रयत्न करने लगता हैँ । (8) बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है अर्थात उसका पुर्णता पतन हो जाता हैँ :- अर्थात जब बुद्धि का नाश होता हैँ तो वह वासना तृप्ति के लिये बलात्कार जैसे अपराध कर बैठता हैँ तथा लडकी को जिँदा जलाने जैसे जघन्य अपराध से उसका ही पतन होता हैँ । यह प्रक्रीया मन से शुरु होती है इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ {गिता 2-67 } क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है॥67॥ जब वह एक ही प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है तब वह पुरष आगे पिछे न सोच कर कुकर्म कर बैठता हैँ । हम कहते ज्ञानी और बुद्दिमान पुरष ये अपराध कैसे कर सकते हैँ, यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ {गिता 2-60 } हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं ॥60॥ जब ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं अर्थात पहले बलात्कारी के मन और बुध्दि पर ये इद्रियाँ बलात्कार करती हैँ [इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम (sex) इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है। ॥Geeta 3-40॥ ] और ये सब होता हैँ गलत सोच से... जब बलात्कार होता है तो सडको पर मार्च निकाला जाता हैँ, We Want Justice जैसे नारे चलते हैँ पर... क्या फायदा जब कोई नयी फिल्म आती हैँ तो बिना Hot Bold Scences वाली फिल्म Floph करार दि जाती हैँ । कोई भी Director अपनी फिल्म मेँ Hotness चाहता हैँ, क्यो की लोगो की खराब मानसिकता को यही पसंद हैँ । पहले जमाने मेँ छोटे बच्चो को Blue Flim देखने को नहीँ मिलती थी, और आज कल तो पाँचवी का बच्चा भी 20 रुपये वाला Net Pack डालकर सैकडो MMS देखता हैँ. और लडकीओँ के Privete Parts को हमेशा घुरता रहता हैँ । जिन्हे सचमुच बलात्कार मुक्त भारत चाहीये वह लोग क्यो नहीँ Porn Nude Internet का बहिश्कार करते, क्यो ऐसी फिल्मे और B,C Grede फिल्मो का बहिश्कार नहीँ करतेँ ? कोइ भी अपने Girl Friend का MMS बनाकर Web Site पर डालता है, तो कोई Facebook Page पर Nude Girls की तस्विरे डालकर भद्धी Comment करता हैँ । क्यो कोई सरकार या न्याय व्यवस्था इन सब पर भारत मेँ Ban नहीँ करता ? जागिये, और बहिश्कार किजिये इन Porn, Nude और Hot Bollywood तथा Porn Nude Internet का । सोच बदलो देश बदलेगा, अकेले नरेद्र मोदी क्या करेँगेँ ।

'माँस' खाना भी हिँसा हैँ तो, "बुध्द धर्म" 'अहिँसावादी' कैसे ?

31 Aug 2015

धम्मपद धम्मपद की गाथा “दण्ड्वग्गो’ मे तथागत बुद्ध कहते है : १२९.

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्चुनो। अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥

सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अंत सभी को अपने जैसा समझ कर न किसी की हत्या करे , न हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

१३०.

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं। अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥

सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

१३१.

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति। अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो न लभते सुखं॥

जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है ( कष्ट पहुँचाता है ) वह मर कर सुख नही पाता है ।

१३२.

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति। अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो लभते सुखं॥

जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित नही करता है ( कष्ट नही पहुँचाता है ) वह मर कर सुख पाता है ।

स्पष्ट है बुद्ध का मार्ग अहिसंक होते हुये भी मध्यमार्गीय रहा लेकिन वह व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिये पशु हिंसा के पक्ष मे न थे ।

अगर हिम्मत हैँ तो जवाब दो...की अपने सुख की चाह से मास के लिये, जानवर कष्ट पहुँचाने वालोँ क्या मर कर सुख पावोँगे और

क्या बुध्द की राह पर न चलना बुध्द धर्म के मुर्खता की पहचान नहीँ हैँ ?

बुध्द की मृत्यु सूअर का मास खाने से हुई| असल मे बोध्द धर्म मे बुध्द के बाद भिछुको ने अपनी सुविधानुसार परिवर्तन किए थे इसी तरह एक बौध्द भिछु ने किसी चील के मुह से गिरे हुए मास का टुकडा खा लिया ओर ये प्रचार फैला दिया कि पशु को मारना पाप है जबकि मास खाना नही वास्तव मे बुध्द ने कभी मासाहार नही किया ओर न कभी इसका समर्थन किया लेकिन विरोध अवश्य किया है| अब हम आप को बताते है सूअर के मास के पीछै का रहस्य- "चुदस्स भत्त मुजित्वा कम्मारस्साति ये सुतं| आबाधं सम्फुसो धीरो पबाव्ठे मारणान्तिकं| भत्तस्स च सूकर मद्दवेन,व्याधि पवाह उदपादि सत्थुनो| विरेचमानो मगवा आबोच गच्छामहं कुसिनारं नगरंति|{दीर्घ निकाय} इसका भावार्थ है कि चुन्नासा भट्ट ने महात्मा बुध्द को सूकर का मद्दव खिला दिया|उससे उनके पेट मे अति पीडा हुई और उनहे अतिसार हौ गया|तब उनहोने कहा ,"मै कुसीनगर को जाउगा " यहा सूकर मद्दव को लोग सूअर का मास समझते है विशेषकर श्रीलंकाई बोध्दो ने इसे सुअर का मास बताया लेकिन ये सच नही है वास्तव मै यहा सूकर मद्दव पाली शब्द है जिसे हिन्दी करे तो होगा सूकर कन्द ओर संस्कृत मे बराह कन्द यदि आम भाषा मे देखे तो सकरकन्द चुकि ये दो प्रकार का होता है १ घरेलु मीठा२ जंगली कडवा इस पर छोटे सूकर जैसे बाल आते है इस लिए इसे बराह कन्द या शकरकन्द कहते है|ये एक कन्द होता है जिसका साग बनाया जाता है |इसके गुण यह है कि यह चेपदार मधुर और गरिष्ठ होता है तथा अतिसार उत्पादक जिस जगह भगवान बुध्द ने यह खाया ओर उनहे अतिसार हुआ उस गौरखपुर देवरिया की तराई मे उस समय ओर आज भी सकर कन्द की खेती की जाती है| वास्तव मै उसका अर्थ सूअर का मास करना मुर्खता ही है इस तरह अन्य चीजे भी है जैसे एक औषधी अश्वशाल होती है जिसका शाब्दिक अर्थ घौडे के बाल लेकिन वास्तव मे यै औषधिय पौधा होता है इसी तरह अंग्रेजी मे lady finger जिसका अर्थ करे तो औरत की उंगली लेकिन वास्तव मे यह भिंडी के लिए है इसी तरह कुकरमुत्ता जिसका शाब्दिक अर्थ कुत्ते का मूत्र लेकिन ये वास्तव मे एक साग होता है इसी तरह अश्वगंधा जिसका घौडे की गंध लेकिन वास्तव मे ये औषधिए पौधा होता है|

महात्मा बुद्ध एवं माँसाहार महात्मा बुद्ध महान समाज सुधारक थे। उस काल में प्रचलित यज्ञ में पशु बलि को देखकर उनका मन विचलित हो गया और उन्होंने उसके विरुद्ध जन आंदोलन कर उस क्रूर प्रथा को रुकवाया। महात्मा बुद्ध जैसे अहिंसा के समर्थक एवं बुद्ध धर्म के विषय में दो बातें उनके आंदोलन कि मूलभूत आत्मा अहिंसा के विरुद्ध प्रतीत होती हैं। एक महात्मा बुद्ध कि मृत्यु सूअर का माँस खाने से पेट का संक्रमण होने से होना, द्वितीय बुद्ध को मानने वाले अधिकतर देशों में माँस खाया जाना हैं। इस सम्बन्ध में स्वामी दयानंद द्वारा यह कथन सबसे अधिक तर्कसंगत सिद्ध होता हैं कि बुद्ध काल में माँसाहार का प्रचलन नहीं था कालांतर में किसी बुद्ध भिक्षु को किसी पक्षी के मुख से गिरा हुआ माँस का टुकड़ा मिला जिसे उसने खा लिया और वही से इस परिपाटी का प्रचलन हो गया कि कोई भी केवल माँस खाने से पापी नहीं बनता, पापी तो पशु का वध करने वाला होता हैं। इस प्रचलन को देखकर मनु स्मृति का माँसाहार विषय पर एक श्लोक स्मरण हो गया। अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51) अर्थ - अनुमति = मारने की आज्ञा देने, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिए लेने और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले - ये आठों प्रकार के मनुष्य घातक, हिंसक अर्थात् ये सब एक समान पापी हैं। इस श्लोक से स्पष्ट सिद्ध होता हैं कि माँस खाने वाला भी उतना ही पापी हैं जितने पशु हत्या करने वाला पापी हैं। सन्देश यह हैं कि बुद्ध कि पवित्र शिक्षा को मानने वालो को उन्हें यथार्थ में अपने जीवन में ग्रहण करना चाहिए। केवल गेरुआ वस्त्र पहनने और सर मुण्डा कर मठ में रहने भर से व्यक्ति त्यागी और तपस्वी नहीं हो सकता। कोई मुझसे पूछे कि धर्म और अन्धविश्वास में क्या अंतर हैं तो मेरा उत्तर यही होगा कि धर्म सत्य का आचरण हैं जैसा बुद्ध ने निभाया था और अन्धविश्वासी बुद्ध का नाम लेकर माँस खाने वाले बौद्ध लोग हैं जो अज्ञानी हैं। क्या बुद्ध माँसाहारी थे? क्या उनकी मृत्यु सूअर का माँस खाने से हुई थी? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए आर्य विद्वान पंडित गंगा प्रसाद जी उपाध्याय द्वारा लिखित इस शोध पूर्ण लेख से पाठक लाभान्वित हो सकते हैं।

तो शिव को किस प्रकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जा सकता हैँ...

14 Jul 2015

सदियो से हिन्दु धर्मावलंबी लोग ब्रम्हा विष्णु महेश का पुजन करते आये है परंन्तु परमेश्वर श्रीकृष्ण महाराज को इन तिनो देवोँ मे रखना उचित प्रतित नहीँ होता

[चेतावनी:- हमारा उद्देश देवोँकेँ दोषोँ को दिखाना नहीँ हैँ बल्की सत्य को अवगत करना हैँ...]

{हो सके तो आप और हरीहरब्रम्हाजी हमेँ माफ करे... }

[A] शिवजी ने क्रोध मेँ एक बालक का शिरछेद कर डाला

शिर ऐसी जगह गया की उसे लाना असभंव हो गया था,

तथा कामदेव शिवजी द्वारा कोध्राग्नी मेँ जल जाने के कारण उनका शरीर वापस तयार करने मेँ भी शिव असमर्थ थे,

तो शिवजी किस प्रकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर हो सकते हैँ

और भगवान श्रीकृष्ण ने सांदिपनी गुरु के पुत्र जो समुद्र मे डुब कर मर गया था, उसे यमलोक से सहशरीर वापस ले आये थे,

[श्रीमद्भगवत कथा महापुराण - दशम स्कन्द पुर्वार्ध अध्याय 45 श्लोक 35 से 50]

तो आप ही विचार किजिये सर्वशक्तिमान परमेश्वर कौन हैँ

श्रीकृष्ण सर्वशक्तीमान परमेशर के अवतार हैँ,

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥

{गिता अध्याय 9, श्लोक 18, }

अर्थात, हे अर्जुन, होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान (प्रलयकाल में संपूर्ण भूत सूक्ष्म रूप से जिसमें लय होते हैं उसका नाम 'निधान' है) और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ॥

एक तरफ भगवान श्रीकृष्णजी का कहना की मै पोषन कर्ता, उत्पादक, संहारक, हितचिंतक, रक्षक, साक्षी, आश्रयस्थान, निधान, अविनाशी, मुलकारण, मोक्षदाता परमेश्वर हुँ।

बल्की शिव को तो हाथी के शिर से काम चलाते हुये देखा जा सकता है ।

तथा शिवजी और भगवान श्रीकृष्ण के आचार और विचार भी नही मिलते हैँ

[B] शिवजी ने तो विष्णुजी के एक "मोहिनी" रुप को नहीँ पहचान सके और काम वासना तृप्त करने के लिये भाग गये मोहीनी के पिछे,

पढिये भागवतके कुछ श्लोक...

[({ वे मोहनीको निहारने और उसकी चितवनके रसमेँ डुबकर इतने विहल हो गये कि उन्हे अपने आपकी भी सुधि न रही ।...॥22॥

मोहिनी ने शंकरजीका विवेक छीन लिया । वे उसके हाव-भावोँसे कामातुर हो गये और भवानीके (पार्वतीजी) सामने ही लज्जा छोड़कर उसकी ओर चल पडे ॥25॥

शकंरजी की इद्रियाँ अपने वशमेँ नहीँ रहीँ, वे कामवश हो गये थे; अत: हथिनीके पीछे हाथीकी तरह उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे ॥27॥

शकंरजी भी उन मोहिनीवेषधारी अद्भुतकर्मा विष्णुजीके पीछे-पीछे दौड़ने लगे । मानो उनके शत्रु कामदेवने इस समय उनपर विजय प्राप्त कर ली हैँ ॥31॥

कामुक हथिनीके पीछे दौड़नेवाले मदोन्मत हाथीके समान वे मोहिनीके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। यद्यपि शकंरजी का वीर्य अमोघ है, फिर भी मोहिनीकी मायासे वह स्खलित हो गया ॥32॥

श्रीमदभागवत कथा महापुराण अष्टम स्कन्ध, 12 अध्याय, श्लोक 17 से 37 })]

और दुसरी तरफ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ की

हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल ॥3-41॥

{गिता अध्याय 3, श्लोक 41, }

शिवजी के कोध्र मेँ गणपती अपना सिर तथा कामदेव अपना शिरीर गवा बैठे,

शिव मे काम वासना और क्रोध मौजुद परंन्तु भगवान श्रीकृष्ण नेँ कहा हैँ की

काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को 'नरक के द्वार' कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए ॥Geeta 16-21॥

तो आप हि तय किजीये शिव और भगवान श्री कृष्ण के आचरण और विचार मेँ कितना फरक हैँ...

[C] शिवजी ने वृकासुर (भस्मासुर) को वर दिया की "तुम जिनके सर पर हाथ रखो वो जल कर भस्म हो जाय" ...

तो वृकासुर ने ये प्रयोग शिवजी के साथ करने की ठानी और शिवजी के पिछे उनके सिर पर हाथ रखने के लिये भाग उठे...

"अब तो शिव अपने दिये हुए वरदानसे भयभीत होँ गये ॥23॥

"वह शिव का पिछा करने लगा

और शिव उससे डरकर काँपते हुये भागने लगे । वे पृथ्वी, स्वर्ग और दिशाऔँके अन्ततक दौड़ते गये; परन्तु फिर भी उसे पीछा करते देखकर उत्तरकी ओर बढे ॥24॥

बड़े बड़े देवता इस सकंटको टालनेका कोई उपाय न देखकर चुप रह गये। अन्तमेँ शिव वैकुठलोक मेँ गये ॥25॥

[श्रीमदभागवत कथा महापुराण - दशम स्कन्द उत्तरार्थ, अध्याय 88, श्लोक 23 से 25]

तो आप के पास दिमाग हो तो ही विचार कीजिये की...

एक राक्षस से भयभीत होकर शिव डरकर कापते हैँ और विष्णुजी से मदत मागते हैँ...

और इधर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ...

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च­ भविष्यताम्‌ ।

हे अर्जुन !मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ ॥GEETA 10-34॥

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌ ॥

और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो ॥GEETA 10-39॥

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥

मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ ॥GEETA 10-42॥

तो एक तरफ शिवजी का अपने भस्म हो जाने के डर से काँप कर डरकर भाग जाना..

और दुसरी तरफ भगवान श्रीकृष्ण का कहना की "मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ"

दोने के कथनी और करनी मेँ कितना फरक हैँ...

तो जरा सोचिये की एक राक्षस के भय से भागने वाले शिव सर्वशक्तिमान परमेश्वर कैसे हो सकते हैँ...

...आगे हमनेँ अत्यंत चौकाने वाले खुलासे किये हैँ जानने के लिये यहाँ किल्क करे...

कुछ ऐसे प्रश्न जो सनातन हिँदु धर्म को आश्चर्यचकित कर देँगेँ...

6 Jul 2015



क्या "राधा" या "रुख्मिणी" की भक्ती करने से श्रीकृष्ण की प्राप्ति होगी ?



"परमेश्वर भक्ती" और "देवता भक्ती" मेँ क्या अतंर है ?



"वैकुंठ" और 'श्रीकृष्ण' के "परमधाम" मेँ क्या अतंर है ?



अगर "श्रीविष्णु" और "श्रीकृष्ण" अलग अलग हैँ, तो भगवान ने गिता मेँ मैँ ही 'राम' या 'विष्णु' हुं ऐसा क्योँ कहा है ?



क्या "देवी-देवताओ" की संख्या असल मेँ 33 कोटी है ? या कुछ और ? तथा कौन से है उनके स्थान?



असल मेँ "विष्णु" कितने हैँ ? और कौनसे हैँ उनके स्थान ?



जानिये, पुराण प्रसिध्द दस अवतार किसने लिये ? और बाकी अवतार किसने लिये ?



जानिये, "भगवान श्रीकृष्ण" ने कौन से युग मेँ कौन सा अवतार लिया है ?



क्या साधु, संत या गुरुओ की पुजा या फिर उनकी समाधी पुजा उचित है ?



क्या परमेश्वर का अंश जिवात्मा है ? क्या इसांन ही परमेश्वर हैँ ?



क्या "गिता" के अनुसार हमेँ 'श्राद' करना चाहिये ?



क्या "गिता' के अनुसार "मासाहांर" का सेवन करना उचित है ?



क्या "गिता" के अनुसार कीसी भी 'जानवर', 'जिव', या 'पेडोपौधे' को मारना उचित है ।



"गिता" के किन वचनोँ का पालन करने से हम सच्चे "श्रीकृष्ण भक्त" बन पायेँगे ? अथवा गिताका सरल भाव ।



जानिये, भगवान से कुछ मांगना (मनोकामना) गलत क्यो है ?



जानिये, कौनसे "शास्त्र" और "वेद" तथा उपनिषद कीससे निर्माण हुये है ?



जानिये, "18 पुराणो" के निर्माता कौनसे ऋषी थे ?



"महानुभाव" या "जय क्रिष्णी" पंथ के बारे मेँ सज्जनोँ की राय ।



क्या 'हिंदु' ये शब्द "गिता" मेँ लिखा है ।



भगवान श्री दत्तात्रेय परमेश्वर अवतार हैं, फिर भी उन्हेँ क्योँ ब्रम्हा - विष्णू - महेश का अवतार माना जाता हैँ ?



जानिये "धर्म" क्या हैँ ? और "अधर्म" क्या हैँ ? तथा "ज्ञान" और "अज्ञान" किसे कहते हैँ ?



जानिये "कर्तव्य कर्म" कौन से हैँ ? और "अकर्तव्य कर्म" कौन से हैँ ?



समाधी पुजा करने से नरक की प्राप्ति (श्रीमदभगवत गिता ) - शिर्डी के 'साईबाबा' , 'स्वामी समर्थ' और शेँगाव के 'गजानन महाराज' की समाधी पुजा क्यो ?

6 Jul 2015



क्या साधु, संत या गुरुओ की पुजा या फिर उनकी समाधी पुजा उचित है ?

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गिता मेँ साधु, संत या गुरुओ की पुजा या फिर उनकी समाधीयोँ को पुजने वाले लोग नरक

मेँ जाते हैँ.... जानने के लिये यहां किल्क करे...





19 जुलै 1994 को संपादक दिपक तिलक ईनका सह्याद्री अंक मे दुसरा नानासाहब पेशवा ही साईबाबा है यह लेख प्रसिद्ध हूआ था लेखक अरुण ताम्हणकर ईनोने रहस्योद्घाटन करते हूए एक अज्ञात साधु का आधार लिया है ।

ऊनका ये लेख दै मुलनिवासी नायक के पास ऊपलब्ध है । ताम्हणकर ईस लेख मेँ जो कहते है ऊसका सारांष तो यही कहता है सदाशिवराव पेशवा ही स्वामी समर्थ हैतात्या टोपे ये शेगांव के गजानन महाराज हैदुसरा नानासाहब पेशवा ही साईबाबा है । लेखक ताम्हनकर को बाबा के प्रकटिकरण मान्य नही वे कहते है कि ये बाबा लोग अचानक प्रकट हूए कैसे?

साधारण आदमी के तरह माँ के पेट से जनम क्यो नही लिया? स्वजाति के बारमे अपनने ऊलटा सिधा बोल दिया ईसके लिए ताम्हणकर ने अपना मुँह बंद किया तो कभी खोला ही नही । ब्रामणो ने स्वामी समर्थ महाराज ईनके कई जगह मठ स्थापण किये अक्कलकोट मंगलवेढा चिपलुण अहमदनगर कल्याण दादर गिरगांव (महाराष्ट्र) ईन प्रमुख संस्थानो (मठ) मे स्वामी का प्रकट दिन हर साल मनाया जाता है । और हर मठो मे खालि सिंहासन है । क्यो कि सिर्फ ब्रामण ही जानते है की स्वामी समर्थ ये पेशवा सदाशिवरावही है । ईस प्रकरण का शोध लेने के लिए प्रत्यक्ष कुछ मठो मेँ भी जाकर देखा है ।

यह लेख किसीकी भावनाओ को ठेच पहूचाने के लिए नही लिखा गया है ।

सामान्य जनता को ब्रामणी षडयंत्र समजे, गुप्त बाते समजकर अंधश्रद्धा खात्मा हो यही हेतु है ।पानिपत कि तीसरी लडाईता 13 फरवरी 1760 को पटदुर यहा विश्वासराव पेशवा ईनके साथ सदाशिवराव पेशवा को मिशन पर भेजने का निर्णय लिया गया । ग्वालियर होकर ता 30 मई 1760 को तोफ, रसद, बारुद, घोडदल कुछ औरते लेकर सव्वालाख फौज निकली । अहमदशाह अब्दाली चौकन्ना हो गया वह कुशल सेनापती था ऊपर से पेशवाओ मे चालाकी का अभाव था सदाशिवराव ये कुत्सित जिद्दि स्वभाव के थे (ऐसा ब्रामण कादंबरीकारो ने लिख कर रखा है) ता14 जनवरी 1760 को पानिपत यहा लडाई हूई ।विश्वाराव ईनकि गोलि लगने से म्रुत्यु हो जाति है तो सदाशिवराव बच्चो कि तरह रोने लगते है ईससे सैनिको का मनोबल कम होता है । सदाशिवराव को बिना लडखडाए मैदान खडा रहना आवश्यक था । पर अचानक सदाशिवराव मैदान मे से गायब हो गये(म .यु. भा. ईतिहास पेज क्र 112) । ईतिहास मे पाणिपत कि लडाई का वर्णन सव्वा लाख चुडिया तुट गई ऐसा किया गया है । स्वामी समर्थ अचानक ऊसी समय 1760/61 मंगलवेढा (महाराष्ट्र) को प्रकट हूए स्वामी समर्थ के प्रकटिकरण से पाणिपत कि लडाई का घटनाक्रम जुडता है ।पहले तो मंगलवेढा गांव के लोग ऊन्हे नग्न मतिमंद पागल व्यक्ती समजते थे । कुछ सालो में ही ईस तरुण नग्न मनुष्य का दिगंबर बाबा हो गया ।(गांधिजी भि सव्वालाख पट चालाक थे ऊनोने प्राप्त किया हूआ महात्मापन एकनंबर माडल है ।)स्वामि समर्थ का चरित्रई स 1818 को ब्रामण गोपलबुवा केलकर ने स्वामी कि पहलि बखर(Historical document) लिखि । गोपालबुवा ये स्वामी के बहुतसी गुप्त बाते जानने वाले शिष्य थे । ऊसके बाद ता 09 मई 1975 को रामचंद्र चिंतामण ने बखर का पुन:लेखन किया ।

कथाकथित अनंतकोटी ब्रम्हांडनायक राजाधिराज स्वामी समर्थ महाराज ईनका जनम कहा हुआ?, वो छोटे के बडे कहा हुए ? ऊनके मातापिता कौन ? ऊनकी जाति कोनसी ? ईनमसे कोई भि बातो का पता नही चलता ऐसा बखर मे लिखा है ।

स्वामि मंगलवेढा मे 12 साल रहे । गांव के लोग ऊनको मतिमंद मनुष्य समजते थे । बसप्पा तेलि के घर मे रहने वाला यह नग्न व्यक्ती सिंदुर लगाए हूए पत्थरो पर पेशाब करता था ।स्मशान मे कबरो पर संडास करता था ।बसप्पा तेलि के घर के चुल्हे मे संडास करता ये सब स्वामी के लिला थे, वे अवतारी पुरुष थे ऐसा बखर कहती है

(अंग्रेजो को कुछ ब्रामण साधु सन्यासीयो के जिवन चरीत्र के सबुत मिले एक जानकारी हमारे पढने मे आयी के एक साधु अपने अनुयाईयो को अपनी संडास खाने देता और ऊसके बाद ही ऊसे अपना चेला बनाता )।

परंतु बसप्पा कि पत्नी मात्र अपना पती कहासे ईस मतिमंद पगले के पिछे लग गया ईसके लिए दुखी थी । रोजि रोटी करके पेठ भरनेवाला यह तेलि परिवार बहुत ही गरीब मे जी रहा था । अचानक बसप्पा के परिवार को कहासे तो सोने की खान मील गयी और उनकी गरीबी हमेशा के लिए नष्ट हो गयी ।

असलियत मे स्वामी को मिलने के लिए मालोजिराव पेशवा मंगलवेढा आते थे ।ऊन्होने स्वामी का महिने का खर्चा बसप्पा को देने की व्यवस्थ लगा रखी थी । स्वामी कभी कभी बसप्पा के परिवारवालो को घर से बाहर निकाल देते और दरवाजे के सामने लाठी लेकर बैठते ।पेशवाओसे महिना अर्थसहाय्य मिलने के बाद गणपत चोलप्पा नाम का नौकर स्वामी की सेवा के लिए ऊपस्थित हो गया ।मै टोली तयार करता हू स्वामी मंगलवेढा मे रहते समय ऊन्हे जब भी पागलपन का झटका आता तो ऊने शांत करने के लिए चेले गांव कि मतिमंद स्त्रि सरस्वती सुनारीन को लाते ।यह मतिमंद स्त्रि लाठी और बगल मेँ फटे कपडो का गठ्ठा लेकर चेलो के पिछे भागती एक चेला कहता 'ज्ञानबा तुकारम' अर्थात दुसरा कहता 'पगली का क्या काम' यह शरारत देख स्वामी जोरजोरसे हसते इतना कि ऊनका पलंग भि हिलता ।12 साल रहने के बाद भी स्थीती नही सुधारी । अक्कलकोट मे चिंतोपंत टोल के यहासे एरंडी की सुखी लकडियो के हतेलिभर तुकडे करते ।



आगे जारी हैँ...



शिरडी साई : कथाकथित भगवान, संत, फकिर या करोडपती

6 Jul 2015

बाबा फ़क़ीर अथवा धनि

1. बाबा की चरण पादुका स्थापित करने के लिए बम्बई के एक भक्त ने 25 रुपयों का मनीआर्डर भेजा । स्थापना में कुल 100 रूपये व्यय हुए जिसमे 75 रुपये चंदे द्वारा एकत्र हुए ! प्रथम पाच वर्षों तक कोठारे के निमित 2 रूपये मासिक भेजते रहे । स्टेशन से छडे ढोने और छप्पर बनाने का खर्च 7 रूपये 8 आने सगुण मेरु नायक ने दिए ! {अध्याय 5} 25 75 =100 2 रु मासिक, 5 वर्षों तक = 120 रूपये 100 120 =220 रूपये कुल ये घटनाये 19वीं सदी की है उस समय लोगो की आय 2-3 रूपये प्रति माह हुआ करती थी !

तो 220 रूपये कितनी बड़ी रकम हुई ?? उस समय के लोग 2-3 रूपये प्रति माह में अपना जीवन ठीक ठाक व्यतीत करते थे ! और आज के 10,000 रूपये प्रति माह में अपना जीवन ठीक ठाक व्यतीत करते है ! तो उस समय और आज के समय में रुपयों का अनुपात (Ratio) क्या हुआ ? 10000/3=3333.33 तो उस समय के 220 रूपये आज के कितने के बराबर हुए ?

220*3333.33=733332.6 रूपये (7 लाख 33 हजार रूपये) यदि हम यह अनुपात 3333.33 की अपेक्षा कम से कम 1000 भी माने तो :-

उस समय के 220 रूपये अर्थात आज के कम से कम 2,20000 (2 लाख 20 हजार रूपये) {अनुपात=1000 } इतने रूपये एकत्र हो गये ? मस्त गप्पे है इस किताब में तो !

2. बाबा का दान विलक्षण था ! दक्षिणा के रूप में जो धन एकत्र होता था उसमें से वे किसी को 20, किसी को 15 व किसी को 50 रूपये प्रतिदिन वितरित कर देते थे ! {अध्याय 7 }

3. बाबा हाजी के पास गये और अपने पास से 55 रूपये निकाल कर हाजी को दे दिए ! {अध्याय 11 }

4. बाबा ने प्रो.सी.के. नारके से 15 रूपये दक्षिणा मांगी, एक अन्य घटना में उन्होंने श्रीमती आर. ए. तर्खड से 6 रूपये दक्षिणा मांगी {अध्याय 14 }

5 . उन्होंने जब महासमाधि ली तो 10 वर्ष तक हजारों रूपये दक्षिणा मिलने पर भी उनके पास स्वल्प राशी ही शेष थी । {अध्याय 14 } यहाँ हजारों रूपये को कम से कम 1000 रूपये भी माने तो आप सोच सकते है कितनी बड़ी राशी थी ये ? उस समय के 1000 अर्थात आज के 10 लाख रूपये कम से कम ! {अनुपात =1000 }

6 . बाबा ने आज्ञा दी की शामा के यहाँ जाओ और कुछ समय वर्तालाब कर 15 रूपये दक्षिणा ले आओ ! {अध्याय 18 }

7 बाबा के पास जो दक्षिणा एकत्र होती थी, उनमे से वे 50 रूपये प्रतिदिन बड़े बाबा को दे दिया करते थे ! {अध्याय 23 }

8 . प्रतिदिन दक्षिणा में बाबा के पास बहुत रूपये इक्कठे हो जाया करते थे, इन रुपयों में से वे किसी को 1, किसी को 2 से 5, किसी को 6, इसी प्रकार 10 से 20 और 50 रूपये तक वो अपने भक्तों को दे दिया करते थे ! {अध्याय 29 }

9 . निम्न प्रति अध्याय 32 की है : बाबा की कमाई = 2 (50 100 150 ) = 600 रूपये वाह !!

10 . बाबा ने काका से 15 रूपये दक्षिणा मांगी और कहा में यदि किसी से 1 रु. लेता हु तो 10 गुना लौटाया करता हु ! (अध्याय 35 )

11 . इन शब्दों को सुन कर श्री ठक्कर ने भी बाबा को 15 रूपये भेंट किये (अध्याय 35 )

12 . गोवा से दो व्यक्ति आए और बाबा ने एक से 15रूपये दक्षिणा मांगी ! (अध्याय 36 )

13 . पति पत्नी दोनों ने बाबा को प्रणाम किया और पति ने बाबा को 500 रूपये भेंट किये जो बाबा के घोड़े श्याम कर्ण के लिए छत बनाने के काम आये ! (अध्याय ३ ६ )

बाबा के पास घोडा भी था ?

ये कोन लोग थे जो बाबा को इतनी दक्षिणा दिए जा रहे थे !

दोस्तों आप स्वयं ही निर्णय ले ये क्या चक्कर है ?? में तो हेरान हु !

बाबा की जिद 14 अक्तूबर, 1918 को बाबा ने उन लोगो को भोजन कर लौटने को कहा ! लक्ष्मी बाई सिंदे को बाबा ने 9 रूपये देकर कहा “मुझे अब मस्जिद में अच्छा नही लगता ” इसलिए मुझे अब बूंटी के पत्थर वाडे में ले चलो, जहाँ में सुख पूर्वक रहूँगा” इन्ही शब्दों के साथ बाबा ने अंतिम श्वास छोड़ दी ! {अध्याय 43 } 1886 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन बाबा को दमा से अधिक पीड़ा हुई और उन्होंने अपने भगत म्हालसापति को कहा तुम मेरे शरीर की तिन दिन तक रक्षा करना यदि में वापस लौट आया तो ठीक, नही तो मुझे उस स्थान (एक स्थान को इंगित करते हुए) पर मेरी समाधी बना देना और दो ध्वजाएं चिन्ह रूप में फेहरा देना ! {अध्याय 43}

जब बाबा सन 1886 में मरने की हालत में थे तब तथा सन 1918 में भी, बाबे की केवल एक ही इच्छा थी मुझे तो बस मंदिर में ही दफ़न करना !

1918-1886 = 32 वर्षों से अर्थात 48 वर्ष की आयु से बाबा के दिमाग में ये चाय बन रही थी !

14. जीवन में अधिकतर बीमार व मृत्य बीमारी से !! बाबा की स्थति चिंता जनक हो गई और ऐसा दिखने लगा की वे अब देह त्याग देंगे ! {अध्याय ३९} 1886 में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन बाबा को दमा से अधिक पीड़ा हुई और उन्होंने अपने भगत म्हालसापति को कहा तुम मेरे शरीर की तिन दिन तक रक्षा करना यदि में वापस लौट आया तो ठीक, नही तो मुझे उस स्थान (एक स्थान को इंगित करते हुए) पर मेरी समाधी बना देना और दो ध्वजाएं चिन्ह रूप में फेहरा देना ! {अध्याय 43}

1. बाबा को 1886 अर्थात 48 वर्ष की आयु में दमे की शिकायत हुई ! थापना में कुल 100 रूपये व्यय हुए =1,00,000 (1 लाख रूपये) “बाबा समाधिस्त हो गये ” – यह ह्रदय विदारक दुख्संवाद सुन सब मस्जिद की और दोड़े {अध्याय 43} स्पष्ट है बाबे ने मस्जिद में दम तोडा ! लोगो में बाबा के शरीर को लेकर मतभेद हो गया की क्या किया जाये और यह ३ ६ घंटों तक चलता रहा {अध्याय ४ ३ } इस किताब में बार बार समाधी/महासमाधी/समाधिस्त शब्द आया है किन्तु बाबा की मृत्यु दमे व बुखार से हुई ! बाद में दफन किया गया अतः उस स्थान को समाधी नही कब्र कहा जायेगा !! और क्रब्रों को पूजने वोलों के लिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता जी में क्या कहा है आगे देखने को मिलेगा ! समाधी स्वइच्छा देहत्याग को कहते है ! 3 दिनों पुरानी लाश को बाद में मंदिर में दफन किया गया ! बाबा का शरीर अब वहीँ विश्रांति पा रहा है , और फ़िलहाल वह समाधी मंदिर नाम से विख्यात है {अध्याय 4}

आगे जारी हैँ...

शिरडी साई : साई चरित्र एक मजाक या पांखड

6 Jul 2015





गणितीय विवेचन :—

{एक और बड़ा खुलासा}

1. “साईं सच्चरित्र” लिखे जाने का कम से कम वर्ष सन 1926 !

2. बाबा 16 वर्ष में दिखे, 3 वर्ष रहे फिर 1 वर्ष गायब इस प्रकार 20 वर्ष की आयु में बाबा का शिर्डी पुनः आगमन व मृत्यु होने तक वही निवास ! साईं बाबा का जीवन काल 1838 से 1918 (80 वर्ष) तक था (अध्याय 10)

अर्थात बाबा 20 वर्ष के थे सन 1858 में ! इस किताब में जितनी भी बाबा की लीलाएं व चमत्कार लिखे गये है वे सभी 20 वर्ष के आयु के पश्चात के ही है , क्यू की 20 वर्ष की आयु में ही वे शिर्डी में मृत्यु होने तक रहे !

3. स्पष्ट है जो लीला बाबा ने सन 1858 से करनी प्रारंभ की वो लिखी गई इस किताब में सन 1926 में ! अर्थात (1926-1858) 68 वर्षों पश्चात !

अब जरा दिमाग, बुद्धि व अपने विवेक का प्रयोग करिये और सोचिये 68 वर्ष पुराणी घटनाओं को इस किताब में लिखा गया वो कितनी सही होंगी ?????

अब यदि ये माने की किताब लिखने वालों ने जो भी लिखा है वो सब आँखों देखा हाल है तो किताब लिखने वालों की सन 1858 में आयु क्या होगी ???

ध्यान से समझे :–

1. जैसा की किताब लिखने वाले बहुत ही चतुर किस्म के लोग थे तभी उन्होंने इस किताब को उलझा कर रख दिया, बाबा के सन्दर्भ में जहाँ जहाँ उनकी आयु व लीला करने का सन लिखने की नोबत आयी वहां वहां उन्होंने बाते एक ही स्थान पर न लिख कर टुकड़ों में लिखी जैसे : बाबे के सर्वप्रथम देखे जाने की आयु लिखी 16 वर्ष पर सन नही लिखा —–> अध्याय 4 में जीवन काल 1838 से 1918 लिखा

—–>अध्याय 10 में इस बिच बाबे के 3 वर्ष, आयु 16 से 19 को पूरा गायब ही कर दिया ! और बचपन पूरा अँधेरे में है युवक –>व्यक्ति/फ़क़ीर–>युवक —>व्यक्ति/पुरुष इस चतुराई से साफ है की वे (किताब लिखने वाले) 40 से 60 वर्ष के रहे होंगे सन 1926 में जब किताब लिखनी प्रारंभ की !

1. हम 40 वर्ष माने तो 1858 में वे(किताब लिखने वाले) पैदा भी नही हुए ! 1926-40=1886>1858

२. किताब लिखने वालों की आयु सन 1926 में 50 वर्ष माने तो भी वे 1858 में पैदा नही हुए !

३. 60 वर्ष माने तो भी पैदा नही हुए —-> 1926-60 = 1866 > 1858

4. 68 वर्ष माने तो किताब लिखने वाले जस्ट पैदा ही हुए थे जब बाबा 20 वर्ष के थे —> 1926-68=1858 (1858=1858) ये तो संभव ही नही की किताब लिखने वाले सन 1858 में जन्मे और जन्म लेते ही बाबे की लीलाए देखि समझी और 1926 में किताब में लिख दी हो !

तो अब क्या करे ??? किताब लिखने वालों की आयु 68 वर्ष होने भी संभव नही, आयु बढ़ानी पड़ेगी ! माना किताब लिखने वाले बाबे की लीलाओं के समय (सन 1858 से आगे तक) थे 20 वर्ष के,

अर्थात बाबे की और किताब लिखने वालों की आयु सन 1858 में 20वर्ष (एक बराबर) थी !

क्यू की कम से कम 20 वर्ष आयु लेनी ही पड़ेगी तभी उन्होंने 1858 में लीलाए देखि होंगी व समझी होंगी !

1. 1858 में 20 वर्ष के तो सन 1926 में हुए —-> 88 वर्ष के (कम से कम ) बाबा खुद ही 80 वर्ष में मर गये तो 88 वर्ष का व्यक्ति क्या जीवित होगा ?? यदि होगा तोभी 88 वर्ष की आयु में ये किताब लिखा जाना संभव ही नही, 88 वर्ष का व्यक्ति चार पाई पकड़ लेता है ! फिर में कह चूका हु की ये किताब लिखने का काम करने वाले चतुर जवान लोग थे ! लगभग 40 से 60 वर्ष के बिच के !

और इन आयु का व्यक्ति 1858 में पैदा भी नही हुआ !!…………………..झूठ नं 8

ये किताब पूरी एक महाधोखा है !

ये राजू के जन्म के पश्चात लिखी गई और कोरे झूठ ही झूठ है इसमें !

एक और झूठ : फ़क़ीर से साधू बनाने का प्रयास :– निम्न तस्वीर में बिच वाला साईं नही है ! बिच वाले व्यक्ति की तस्वीर , दाये-बाये (असली साईं) की जगह लेने का प्रयास कर रही है ! यदि ध्यान नही दिया गया तो असली साईं की तस्वीर बिच वाली तस्वीर से बदल दी जाएगी । क्योकि बिच वाले की सूरत भोली है !…………………………..झूठ नं 9 “Recently there appeared on some websites what was claimed to be a recently discovered photo of Shirdi Sai Baba.It is clearly a photo of that much revered Indian ‘saint’.”

बिच वाले बाबा के माथे पर बंधा कपडा भी नकली है ! गौर से देखें :- photo shop से एडिट किया हुआ है !

मेने नही किया है इस साईट पर उपलब्ध है :– http://robertpriddy.wordpress.com/2008/07/04/undiscovered-photo-of-shirdi-sai-baba/

जब इन व्याकरणिक व आनुशासनिक नियमोँ से इतना से इतना खिलवाड़ है, तो साईँ केझूठे पाखंडवादी चमत्कारोँ की बात ही कुछ और है! कितने शर्म की बात है कि आधुनिक विज्ञान के गुणोत्तर प्रगतिशिलता के बावजूद लोग साईँ जैसे महापाखंडियोँ के वशिभूत हो जा रहे हैँ॥ क्या इस भूमि की सनातनी संताने इतनी बुद्धिहीन हो गयी है कि जिसकी भी काल्पनिक महिमा के गपोड़े सुन ले उसी को भगवान और महान मानकर भेडॉ की तरह उसके पीछे चल देती है ? इसमे हमारा नहीं आपका ही फायदा है …. श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क होता है, श्रद्धालु बनो ….

भगवान को चुनो …

साई पूजना सचमुच भक्ति या अन्धविश्वास की पराकाष्ठा??????

5 Jul 2015





यह पोस्ट केवल कट्टर हिन्दुत्व का दम्भ भरने वाले उन लोगों से एक प्रश्न हैं जो साई को पूजते हैं और खुद को कट्टर हिन्दुवादी भी कहलाना पसन्द करते हैं. कृप्या वही लोग इस पोस्ट का हिस्सा बनें.]]

सबसे पहले कट्टरवाद तो वही है जो सिर्फ़ अपने ईश्वर, धर्म और संस्कारों में विश्वास रखे. जैसे कि मुस्लिम. मुस्लिम सम्प्रदाय को हमारे हिन्दु भगवा वस्त्रों, तिलक, मंदिरों की घंटियों, पूजा ध्वनियों इत्यादि सभी चीजों से नफ़रत है. ऐसी कोई हिन्दु वस्तु नही जिसे वे सम्मान की दृष्टि से देखें. और हम हिन्दु सुबह उठते ही एक ऐसे बाबा को पूजते हैं जो केवल मुल्ला वस्त्र ही धारण करता था. जो हमेशा मुल्ला टोपी धारण करता था. कुल मिलाकर उसके आचरण या पहनावे में कुछ भी हिन्दु था. तो हम कट्टर हिन्दुवादी कैसे हो सकते हैं?????

क्या हमारे हिन्दु धर्म के किसी एक संत का नाम मेरे कट्टर हिन्दु मित्र बता सकते हैं जिसे मुसलमानों ने स्वीकार किया हो????

साई जिसका सबसे बड़ा संदेश यही था – “सबका मालिक एक” लेकिन कौन आज तक नही पता चला. मेरे अनुसार उनका इशारा अल्लाह की तरफ़ होगा क्योकि उनका पहनावा-आचरण व्यवहार सब मुस्लिम ही था और वह रहते भी मस्जिद में ही थे तो अनुमान यही कहता है.

अब उनके संदेश को दूसरे तरीके से समझने की कोशिश करते हैं. – “सबका मालिक एक” मतलब हिन्दु, मुस्लिम, क्रिश्चिन इत्यादि सभी धर्मों के मालिक एक ही है तो ये धर्म के बीच लड़ाई क्यों?????

सभी लोग भाई-बधुत्व के साथ प्यार से रहो. सभी धर्मो को पूजो. क्योंकि आपके साई के अनुसार सभी धर्मो का मालिक एक है. यदि अब भी आपकी कट्टरता सभी धर्मो को मानने को नही कहती तो आप साई का अनुसरण नही कर रहे. तो क्यों मानते हैं साई को???????

कोई उन्हें

भगवान श्रीकृष्ण

का अवतार मानता है, कोई राम का तो कोई शिव का. मतलब वो हिन्दु भगवान के अवतार थे. तो मस्जिद में क्या करते थे? मन्दिर में क्या परेशानी थी उन्हें? मतलब साफ़ है कि वो भी सेकूलर थे.

(लेकिन मेरा मानना है कि वो सिर्फ़ मुस्लिम धर्म ही मानते थे) सभी धर्मो को मानते थे. तो आप क्यों हिन्दुत्व का ड़ंका पीटते हैं? उनके आदर्शो पर क्यों नही चलते????

बन जाईये सेकूलर जैसा की आपके साई ने सिखाया है- “सबका मालिक एक” और अगर आपका भी मानना है कि सबका मालिक एक तो आप कट्टर धार्मिक नही है. हमारे किसी भी हिन्दु देवी-देवता ने जब भी इस पृथ्वी पर अवतार लिया लोगों को पाप और आतंक से मुक्ति दिलाई. बिना पाप का सर्वनाश किये पृथ्वी नही छोड़ी. जब पृथ्वी चारों ओर से सुरक्षित हो गई तब उन्होंने अपने धाम को प्रस्थान किया. साई ने जब पृथ्वी पर जन्म लिया तो पूरा भारत उस समय अंग्रेज़ो के डंडे खा रहा था. भारत माता गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी थी. हजारो गोमातायें रोज कटती रही. ये बचाना तो दूर उनके खिलाफ़ कभी एक शब्द तक नही बोला. आखिर क्यों ????

जबकि हमारे जितने भी हिन्दु संत सन्यासी हुये सभी ने कुरीतियों के खिलाफ़ आवाज उठाई. उसे समाप्त करने के लिये अपने सुखों की भी परवाह नही की. देश और समाज के लिये जीये और देश और समाज के लिये ही प्राण त्याग दिये.

साई ने समाज से कौन सी कुरीति को दूर किया. क्या किया देश और समाज के लिये??????

आखिर क्यों देश को गुलामी के हालत में छोड़ गये????? अब यदि आप कट्टर हिन्दुवादी हैं तो हिन्दु धर्म ग्रंथो को भी पूजते व मानते होंगे?

स्कन्द पुराण के षष्ठम् अध्याय में स्पष्ट लिखा है कि कलयुग को समाप्त करने के लिये भगवान श्रीविष्णु अपना 10वां व आखिरी ”कल्कि अवतार” लेंगे.

लेकिन किसी भी हिन्दु धार्मिक ग्रंथ में साई का जिक्र नही है????

(अगर है तो कृप्या एक प्रति मुझे भी उपलब्ध कराने की कृपा करें ) ग्रंथ लिखने वाले ऋषि मुनि यदि साई के बाद के घटनाक्रमों का उल्लेख पुराणों में कर सकते थे तो साई का क्यों नही????

मतलब साफ़ है कि साई का अवतारवाद से कोई वास्ता नही था और ना ही वह कोई संत था. संत वही होता है जो लोगो को भगवान से जोड़े , संत वो होता है जो जनता को भक्तिमार्ग की और ले जाये, संत वो होता है जो समाज मे व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए पहल करे.

इस साई नाम के मुस्लिम फकीर ने जीवन में कभी भी हमारे राम या कृष्ण का नाम तक नहीं लिया और हम इस साई की काल्पनिक महिमा की कहानियो को पढ़ के इसे भगवान मान रहे हो.

कितनी विचित्र मानसिकता है हम हिन्दुओं की. मेरे अनुसार तो यह एक भयानक मूर्खता है.

इससे पता चलता है कि महान ज्ञानी ऋषि मुनियो के वंशज आज मूर्ख और कलुषित बुद्धि के हो गए है कि उन्हे भगवान और एक साधारण से मुस्लिम फकीर में फर्क नहीं आता…..

साईं के कुछ मुर्ख भक्त है जो साईं कटुवे को शिव राम या कृष्ण ने जोड़ रहे है और अपने सनातन धर्म का मखोल उड़ा कर पूरी दुनिया में सनातन धर्म को बदनाम कर रहे है, ऐसे साईं भक्तो को मेरा खुला चैलेंज, हिम्मत है तो साईं को हिन्दू साबित करे भगवान की बात तो बहुत दूर की है, ऐसे साईं भक्तो को मेरी सलाह, क्या ये साईं राम शिव से बड़ा हो गया,

क्या साईं की पूजा करने वालो को ये पता है की सनातन धर्म में किस विग्रह की पूजा होती है किसकी नहीं??

क्या साईं भक्ति को पता है की सनातन धर्म में विग्रह स्थापना का क्या विधान है??

क्या सनातन धर्म भगवान् की तरह गुरु की पूजा करने की अनुमति देता है, जैसे की कुछ लोग इसे सिर्फ गुरु बता रहे है. साईं भक्तो को सलाह की वो अपनी आखे खोले और इस साईं की पूजा को बंद करके सनातन धर्म के असली स्वरुप को पहचाने,

जय श्रीकृष्ण…….

शिर्डी साईं भगवान या एक और निर्मल बाबा

4 Jul 2015

एक फिल्म आई थी अमर अकबर अन्थोनी, बहुत ही बढ़िया थी, उसमे एक गाना था जिसके बाद एक पाखंडी बहुत प्रसिद्ध हो गया था, फिल्म में गाना चलता है, गाना चलते हुए एक वृद्ध महिला अपने प्राण बचने के लिए भागती है और भागते भागते एक मंदिर में पहुच जाती है, जहा एक मुसलमान साईं की भक्ति करता है,

वैसे एक बात सोचने लायक है, ज़िन्दगी भर भगवान राम और कृष्ण को पानी पी पी कर गाली देने वाले मुसलमान आखिर साईं सम कैसे बोल लेते है, जो अपनी माँ के सगे नहीं होते वो साईं को अपना कैसे मान लेते है, जो हर मूर्ति पूजा करने वाले को मार डालने की बात को अल्लाह का हुकम कहते है वो ऐसे फकीर को क्यों मानते है, समझदार समझ गया है और बेवकूफ यही कहेगा की हिन्दू मुसलमान को मत लड़ाओ, अब ऐसे लोगो को फिर इतिहास बता कर मैं अपना समय ख़राब करूँगा, पर ऐसा नहीं होगा क्युकी आज की ये पोस्ट साईं के चमत्कारों का भंडा फोड़ने और खुद को हिन्दू और साईं भक्त साथ कहने वालो का असली सेकुलर चेहरा दिखने के लिए है,

तो मित्रो वो वृद्ध महिला जो अंधी होती है, उसकी आँखों में एक ज्योति साईं की आँखों से निकल कर समां जाती है और उसे दिखना शुरू हो जाता है,

ऐसे बहुत से चमत्कार है जिसे साईं भक्त देख कर चकित हो जाता है और अनायास ही साईं को अपना भगवान मान लेता है, तो पहला भांडा फूटता है साईं के सिरिअल का, सिरिअल में एक सीन आता है की कुछ लोग एक गड्ढा खोदते है और खोदते समय उसमे से चार दिए निकलते है, लोग उसे देख कर साईं का जयकारा लगते है और मन ही मन साईं की स्तुति करने लगते है,

ऐसा ही एक चमत्कार है साईं के द्वारा दिवाली के दिन पानी से दिए जलना, मैंने तो आज तक माता ज्वाला जी के यहाँ ही पानी में जोत देखि है, जो ५०० सालो से वही विराजित है, तो साईं भक्ति करने वाले अंध भक्त बताये की कहा गये वो दिए जो साईं ने पानी से जलाये थे,

पानी ख़तम हो गया था या सोडियम,, जी हाँ ये चमत्कार तो हमने भी किये थे दसवी क्लास में साइंस के प्रक्टिकल में, तो क्या मैँ भी भगवान् हो गया,

अब आगे चलते है साईं की भभूती पर, बहुत से लोग कहते है की साईं की भभूती से लोग ठीक होते है, तो मित्रो ऐसी एक भभूती तो सत्य साईं भी निकलता था, उसे भी लोग भगवान मानते थे पर भंडा फूटने के बाद उसने ये चमत्कार छोड़ दिया,

ऐसा ही एक चमत्कार है गरम खाने के बर्तन में हाथ डाल देना, तो अन्धो अगर साईं ने कोई लेप किया हो तो क्या ऐसे में उसके हाथ जले होंगे,

मैं दावे से कह सकता हु की साईं के समय में यदि फोटो कैमरा के साथ विडिओ कैमरा भी आ जाता तो आज ये पाखंड दिखने वाले के इतने भक्त न होते, और न ही साईं के नाम पर पैसा कमाने के लिए धर्म के ठेकेदार धर्म को हानि न पहुचाते,

यही नहीं बहुत से भक्त कहते है की साईं की पूजा करके ये मिला वो मिला, कृपा हो गयी सुख मिल गया,

तो कृपा तो हमारे निर्मल बाबा भी बाँट रहे है, उनको क्यों बेकार में बदनाम कर रहे है, वो भी तो कमाना चाहते है, उसके पेट पर क्यों लात मारी है,

इसका ये मतलब नहीं की मैं निर्मल बाबा का भक्त हुं ।

मैं हर उस पाखंड के खिलाफ हु जिसके कारण आज सनातन धर्म की दुर्गति हो रही है,

साईं के मंदिरों के नाम पर हजारो करोड़ो भक्तो को बेवकूफ बना कर उन्हें लूटा जा रहा है, जिसे देखो साईं साईं, ये देश राम का है कृष्ण का है, इन पाखंडी बाबाओ का देश नहीं है, वो सिर्फ इस देश को लूटना चाहते है, कृपा का धंधा बहुत जोरो पर है,

इसलिए सभी मित्रो से विनती है की ऐसे पाखंडियो को समझे, और किसी के कहने पर भगवान् न बनाये, चलते फिरते भगवान बनाने की इस प्रथा को बंद करे, सति प्रथा ख़तम हो गयी, पर्दा प्रथा भी दम तोड़ रही है, दुनिया चाँद पर पहुच गयी है और आप ऐसे पाखंडियो को भगवान् कह कर अपने कुल और नाम को मिटटी में मिला रहे है, खुद समझे और दुसरो को भी समझाए उसी बात पर साईं की एक और असलियत आपको बताता हु, आज मैंने रास्ते में साईं की एक पालकी देखि, साईं की पालकी के आगे पीछे, लोग बदहवास नाच गा रहे थे, जैसे इससे पड़ा महात्मा परमातम कोई नहीं है, वही दूसरी और जगन्नाथजी की भी रथ यात्रा निकल रही थी, भक्त उनके के रथ को खीच रहे है थे और आपने पापो का प्रायश्चित कर रहे थे दोनों यात्राओं में एक भिन्नता थी, साईं की पालकी को सड़क खड़े लोग प्रणाम भी कर रहे थे और पालकी के पास जाकर पैसे चढ़ा रहे थे जबकि जगन्नाथ जी की पालकी पर दूर से प्रणाम जैसे किनारा करने का मन हो, अब यही से शुरू होता है साईं और अन्य सनातनी भगवानो में श्रद्धा का अंतर, पहले शुरू करता हु

तिरुपति से – फरवरी महीने में मैंने पंजाब केसरी की एक खबर पढ़ी थी की साईं की चरण पादुका को तिरुपति देस्थानम ने मंदिर परिसर में आने से रोका, हुआ ये की साईं ट्रस्ट साईं की चरण पादुका को तिरुपति देवस्थानम ले जाना चाहता था ताकि वह के साईं भक्तो को उनके दर्शन करने का अभाग्य मिले, पर तिरुपति देवस्थानम ने ये कह कर मन कर दिया की साईं को चाहे लाखो लोग भगवान् माने पर असल में वो एक आम इंसान ही था और जिस व्यक्ति का वेद पुराणों में वर्णन न हो उसे किसी और के कहने पर भगवान कैसे मान लिया जाए,,

अब श्रीराम की महिमा

– श्री राम का जनम और उनकी जीवन कथा सभी जानते है, उन्होंने बहुत से राक्षसों का वध किया और धरती को उनके बोझ से मुक्त किया, पुरे चित्रकूट और दंडक वन में राक्षसों का भय था जो श्रीराम ने समाप्त किया और फिर रावण को मार कर तीनो लोको में शांति स्थापित करके धर्म पताका फहराई,

अब भगवान कृष्ण –

कृष्ण भगवान् ने भी ऐसे ही न जाने कितने राक्षसों को मार कर धर्म की रक्षा की, तड़का को मारा, बाणासुर के अत्याचार को ख़तम किया, कंस का संहार किया और महाभारत के युद्ध में धर्म की और से लड़ते हुए धर्म की रक्षा की यहाँ तक की धर्म के लिए उनका अपना वंश भी ख़त्म हो गया ।

पर क्या इनमे कही साईं का नाम है??? नहीं



आगे जारी हैँ...



शिर्डी साईं मांसाहारी

4 Jul 2015

आज मैं शिर्डी साईं के सारे राज का पर्दाफाश कर रहा हु, कृपया ध्यान जरुर दे की सभी सबूत शिर्डी से प्रकाशित साईं सत्चरित्रसे लिए गये है,

इसलिए इनमे से किसी भी प्रमाण को पहले जांच ले और उसके बाद सही होने पर ही कुछ वाद विवाद करे, यदि कोई साईं भक्त आहत है और मेरे दिए हुए प्रमाण से संतुष्ट है नहीं तो वह कानुनी करवाई कर सकता है, जय श्री कृष्ण,

आज मैं आप सभी के सामने वो सच रख रहा हु जिसे जान कर सभी साईं भक्तो के पैरो टेल जमीन खिसक जाएगी, बहुत से साईं मित्र यही कहते थे की मेरे पास कोई ठोस सबूत नहीं है की साईं मुस्लमान है, कुछ लोग कहते थे की साईं ब्राह्मण है, पर उनके पास इस बात का कोई सबूत या प्रमाण नहीं होता था, कुछ अन्य भक्त कहते थे की साईं केवल हिन्दू ग्रंथो का पाठ करते थे और उनके गुरु भी हिन्दू थे, लेकिन मेरे साईं के मांसाहारी होने की बात पर कुछ ये भी कहते थे की साईं ने कभी मांस को हाथ तक नहीं लगाया, पर आज इन सभी तथ्यों को झुतना सिद्ध करके मैं दिखाना चाहता हु की साईं सच में माँसाहारी था,

[गिता मे भगवान श्रीकृष्ण ने माँसाहारी खाना खाने वाले को पापी और नरक मेँ जाने वाले कहा हैँ । जानने के लिये यहां किल्क करे... ]

यही नहीं साईं ने एक बकरे को भी काटने का प्रयत्न किया थावो भी बकरीईद के दिन, हद तो तब हो गयी जब एक ब्राह्मण को साईं ने मांस खिलाने के लिए बाध्य किया, ये सब मैं अपनी तरफ से नहीं बल्कि शिर्डी के साईं संस्थान से प्रकाशित साईं सत्चरित्र के माध्यम से कह रहा हु, पाठको से विनती है की इसे पढ़े और पढने के बाद मनन व् चिंतन करे की क्या ऐसा पाखंडी, यवनी, धूर्त, कपटी, सनातन धर्म में कोई इश्वर या अवतार हो सकता है, जैसा की विगत १५ वर्षो से दुस्प्रचारित किया जा रहा है, शिर्डी में ही साईं की समाधि है जो चाँद बाबा के नाम से है, ये चाँद बाबा असल में चाँद मियां उर्फ़ साईं बाबा ही थे, अब ये दफनाये गये है तो दफ़नाने के बाद ये सालो तक जमीन में ही दफ़न रहेंगे, जमीन में दफ़न होंगे तो सड़ेंगे ही, और सड़ेंगे तो कीड़े ही पड़ेंगे, तो मेरे भाइयो बहनों जो साईं भक्त है वो सोचे की जब ये भगवान् होकर कीड़ो से अपनी रक्षा नहीं कर सकता तो आप लोगो को भव् सागर कैसे पार कराएगा, गीता में भी भगवान् कृष्ण ने कहा है,की दफनाये गये मुर्दा आदमी को जो सकाम भाव से पूजता है वो भी प्रेत योनी में भक्त रहता है और वो भी जो दफनाया जाता है, तो मेरे भाइयो बहनों, प्रेत को पूज कर आप भी प्रेत ही बनोगे, इसलिए छोड़ो साईं भक्ति और केवल भगवान श्रीकृष्ण को पूजे, सनातन धर्म ही सबसे उत्तम है

प्रमाण के लिए निचे साईं सत्चरित्र की पुस्तकों के पृष्ठ सख्या सहित दिए हुए है जिनसे ये साबित होता है की साईं न केवल मुसलमान था बल्कि वह मांसाहारी और धर्मद्रोही भी था,

साँई बाबा माँसाहार का प्रयोग करते थे व स्वयं जीव हत्या करते थे ?

(1) मस्जिद मेँ एक बकरा बलि देने के लिए लाया गया। वह अत्यन्त दुर्बल और मरने वाला था। बाबा ने उनसे चाकू लाकर बकरा काटने को कहा। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 23. पृष्ठ 161.

(2) तब बाबा ने काकासाहेब से कहा कि मैँ स्वयं ही बलि चढ़ाने का कार्य करूँगा। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 23. पृष्ठ 162.

(3) फकीरोँ के साथ वो आमिष(मांस) और मछली का सेवन करते थे। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 5. व 7.

(4) कभी वे मीठे चावल बनाते और कभी मांसमिश्रित चावल अर्थात् नमकीन पुलाव। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 38. पृष्ठ 269.

(5) एक एकादशी के दिन उन्होँने दादा कलेकर को कुछ रूपये माँस खरीद लाने को दिये। दादा पूरे कर्मकाण्डी थे और प्रायः सभी नियमोँ का जीवन मेँ पालन किया करते थे। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 32. पृष्ठः 270.

(6) ऐसे ही एक अवसर पर उन्होने दादा से कहा कि देखो तो नमकीन पुलाव कैसा पका है? दादा ने योँ ही मुँहदेखी कह दिया कि अच्छा है। तब बाबा कहने लगे कि तुमने न अपनी आँखोँ से ही देखा है और न ही जिह्वा से स्वाद लिया, फिर तुमने यह कैसे कह दिया कि उत्तम बना है? थोड़ा ढक्कन हटाकर तो देखो। बाबा ने दादा की बाँह पकड़ी और बलपूर्वक बर्तन मेँ डालकर बोले -”अपना कट्टरपन छोड़ो और थोड़ा चखकर देखो”। -:अध्याय 38. पृष्ठ 270.

प्रश्न:-

{1} क्या साँई की नजर मेँ हलाली मेँ प्रयुक्त जीव ,जीव नहीँ कहे जाते?

{2} क्या एक संत या महापुरूष द्वारा क्षणभंगुर जिह्वा के स्वाद के लिए बेजुबान नीरीह जीवोँ का मारा जाना उचित होगा?

{3} सनातन धर्म के अनुसार जीवहत्या पाप है। तो क्या साँई पापी नहीँ?

{4} एक पापी जिसको स्वयं क्षणभंगुर जिह्वा के स्वाद की तृष्णा थी, क्या वो आपको मोक्ष का स्वाद चखा पायेगा?

इसके उलट

भगवान श्रीकृष्ण

के अनुसार जो व्यक्ती मांसाहार का सेवन करता हैँ, वो तामसी और पापी व्यक्ती अधोगती अर्थात नरक को प्राप्त होता हैँ।

{5} तो क्या ऐसे नीचकर्म करने वाले को आप अपना आराध्य या ईश्वर कहना चाहेँगे?

साईं ने मुसलिम बनाने के लिए क़त्ल भी किये और बलात्कार भी किये, जिसके सभी प्रमाण महाराष्ट्र के किसी भी थाने में जाकर पता लगा सकते है पर ध्यान रहे वो सब आप चाँद मिया १८८० के केस में देख सकते है, साईं नाम मत लेना वरना पोलिसे वाले मरते हुए कोर्ट तक ले जायेंगे,

साई के मुस्लिम होने का प्रमाण जानने के लिये यहां किल्क करे... तथा हमारा ये Blog पढेँ... साईं बाबा एक मुस्लिम संत यदि आप भी साईं के इस षड्यंत्र को समझ चुके है और चाहते है की अपने सनातनी भाई - बहनों को इस षड्यंत्र से अवगत करा लेँ तो ज्यादा शेयर करे...

जय श्रीकृष्ण...

शिर्डी साईं एक इस्लामिक षड्यंत्र (समाधी पुजा से नरक की प्राप्ती - गिता)

4 Jul 2015

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ की, जो लोग 'गुरुओ' की 'समाधी' पुजा करते है उन तामसी और पापी व्यक्तीओँ को अधोगती अर्थात नरक को प्राप्त होना पडता हैँ । ऐसे लोग तो महान अपवित्र और घोर नरको मे पडते हैँ ।

जी हां, जो हम कह रहे हैँ वह

भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमदभगवत् गिताजी मेँ कहेँ हुयेँ वचनो के अनुसार हीँ कह रहे हैँ,

आईये जानते

भगवान श्रीकृष्ण के वचन,

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥

(गिता 17-4)

हे अर्जुन ! सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं ॥17-4॥

[यहां पर "भुतगण" शब्द का अर्थ 'भुत प्रेत पुजा' या "समाधी" पुजा जिसे इस्लाम मेँ 'मजार' कहां जाता हैँ, इस प्रकार किया गया हैँ । ]

तथा तामस लोक कौनसी गती को प्राप्त होते हैँ, ये समझाते हुये भगवान गिता के 14 वे अध्याय के 18 वे श्लोक मेँ कहते हैँ।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

(गिता 14-18)

अर्थात हे अर्जुन !सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं ॥18॥

तथा श्रीमदभागवत् मेँ भी कहा गया हैँ,

पशुं विधिनालभ्य प्रेतभूतगणान् यजन ।


नरकानवशो जंतुर्गत्वा यात्युल्बणं तम: ॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 11, अध्याय 10, श्लोक 28]

अगर मनुष्य प्राणियोँको सताने लगे और विधी - विरद्ध पशुओँकी बलि देकर भुत और प्रेतोंकी उपासना मेँ लग जाय, तब तो वह पशुओंसे भी गया - बीता होकर अवश्य हीँ नरक मेँ जाता हैँ । उसे अन्त मेँ घोर अन्धकार स्वार्थ और परमार्थ से रहित अज्ञानमेँ ही भटकना पड़ता हैँ॥

इसिलिये साई समाधी को पुजन से आपको सिर्फ

नरक प्राप्ती होगी...

भगवान को पुजो... साई को छोडो मुर्ख हिन..बुद्दी..दुओ....





मुस्लिम वेशभूषा में साईं

एक मुस्लिम संत जो की हजारों करोडो पढ़े लिखे और अमिर लोगो, लेकिन मुर्ख हिन्दुओ के द्वारा पूजा जाता है | लाखो पढ़े लिखे हिंदू एक ऐसे मुस्लिम संत के अंध भक्त होकर पूजते है जिसे हम शिरडी के साईं बाबा के नाम से जानते है|

वो संत जो खुद एक मस्जिद में रहता था, सबके सामने कुरान पढता था और एक ही संदेश देता था की मुझे मरने के बाद दफना देना,, ना की जला देना, पर अधिकतर मुर्ख लोग उसे समझ नहीं पाए और उसे अपने भगवानो से ऊपर दर्जा देकर एक ऐसे मुर्दे को पूजते है जो स्वयं एक मुसलमान है…

सिर्फ यही नहीं यह पाखंडी खुद को हिंदू देवी देवताओं का अंश बताता था स्वयं में नारायण, शिव, श्रीकृष्ण और राम जैसे हजारों देवी देवताओं के रूप में खुद की पूजा करवाता था पर हिंदू मुस्लिम एकता की बात जरुर करता था|

ये एक पूरी तरह से एकतरफा कार्य है जिसमे सारा बलिदान केवल हिन्दुओ को ही देना पड़ता है जैसे की साईं राम, इस्लाम ग्रहण करना, मुस्लिम लड़के द्वारा हिंदू लड़की से शादी करना, और हिन्दुओ केबड़े धार्मिक स्थलों में मुसलमानों को ऊँचे पड़ देना आदि, और मुर्ख हिंदू इन बातो को मान भी लेता है बिना ये सोचे की परधर्म में जीना और उससे अपनाने पर लोक परलोक कही भी ठिकाना नहीं मिलता |

साईं का केवल एक ही उद्देश्य था जो किसी समय अजमेर के मुस्लिम संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिस्ती ने आरम्भ किया था| साईं का कार्य केवल उस परम्परा का निर्वहन करते हुए हिंदू को और मुर्ख बना कर इस्लाम के और समीप लाकर उनका मतांतरण कराना था| आज भी ९०० सालो की इस्लामी गुलामी के बाद हिंदू धर्म कुछ कमजोर अवश्य हुआ है और इसे दूर करने के लिए ऐसे पाखंडियोँ के पाखंड और षड्यंत्र को मिटाने की आवश्यकता है|

सनातनी ईश्वर भगवान श्रीकृष्ण को पीछे धकेलकर साईं को आगे लाने का षड्यंत्र हैँ।

बाबा शब्द फारसी और इस्लामी संस्कृति का एक शब्द है जिसका हिंदी या संस्कृत में कोई उल्लेख नहीं है परन्तु इसे दुस्प्रचारित किया गया की ये शब्द संस्कृत का है|

बाबा एक सूफी संत को मिलने वाली पदवी या नाम है जो मलेशिया के मुस्लिम संतो को मिलती है जब उन्हें कोई इस्लामिक सम्मान मिलता है|

बाबा शब्द असल में दादा (पिता के पिता) का ही दूसरा अर्थ है, बाद में ये उस व्यक्ति के लिए प्रयोग में होने लगा जो किसी सनातन संस्कृति को खतम करके इस्लामी सत्ता का ध्वज किसी देश में फहराता है| इसलिए एक तरह से साईं बाबा देश में इस्लामी ध्वज फहराने के लिए पूरी तरह से इस्लामी कठमुल्लो द्वारा प्रचारित किये जा रहे है|



आगे जारी हैँ...



साई भक्तो के लिए दस प्रश्न

4 Jul 2015

साई भक्तो के लिए दस प्रश्न – अगर किसी भी साई भक्त के पास इन दस प्रश्नो का उत्तर है तो में भी साई का भक्त बनूँगा...

चाहे कोई भी हो … . कोई फालतू की बहस नहीं …. कुतर्क नहीं ……. जिसके पास सभी प्रश्नो का सार्थक जवाब हो उत्तर दे ….. कोई सुझाव नहीं चाहिए …….. और अगर इनके उत्तर नहीं है …… या इन्हे पढ़ने के बाद शर्म आए …….. तो भगवान कि और बढ़ो….. कल्याण होगा…

1 – साई को अगर ईश्वर मान बैठे हो अथवा ईश्वर का अवतार मान बैठे हो तो क्यो? आप हिन्दू है तो सनातन संस्कृति के किसी भी धर्मग्रंथ में साई महाराज का नाम तक नहीं है।तो धर्मग्रंथो को झूठा साबित करते हुये किस आधार पर साई को भगवान मान लिया ?

और धर्मग्रंथ कहते है कि कलयुग में दो अवतार होने है ….

एक बुद्ध का हो चुका दूसरा कल्कि नाम से अंतिम चरण में होगा……. ।

2 – अगर साई को संत मानकर पूजा करते हो तो क्यो? क्या जो सिर्फ अच्छा उपदेश दे दे या कुछ चमत्कार दिखा दे वो संत हो जाता है ? साई महाराज कभी गोहत्या पर बोले?, साई महाराज ने उस समय उपस्थित कौन सी सामाजिक बुराई को खत्म किया या करने का प्रयास किया ? ये तो संत का सबसे बड़ा कर्तव्य होता है । और फिर संत ही पूजने है तो कमी थी क्या ? फकीर ही मिला ?

3 - अगर सिर्फ दूसरों से सुनकर साई के भक्त बन गए हो तो क्यो? क्या अपने धर्मग्रंथो पर या अपने भगवान पर विश्वास नहीं रहा ?

4 – अगर मनोकामना पूर्ति के लिए साई के भक्त बन गए हो तो तुम्हारी कौन सी ऐसी मनोकामना है जो कि भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण , या श्री विष्णु जी, या शिव जी, या राम जी पूरी नहीं कर सकते सिर्फ साई ही कर सकता है?

तुम्हारी ऐसी कौन सी मनोकामना है जो कि वैष्णो देवी, या हरिद्वार या वृन्दावन, या काशी शीश झुकाने से पूर्ण नहीं होगी ..वो सिर्फ शिरडी जाकर माथा टेकने से ही पूरी होगी।

5 – तुम्हारे पूर्वज सुबह और शाम ….. श्री राम , या कृष्ण या शिव शिव ही बोलते थे….. फिर तुम क्यो सिर्फ प्रचार को सुनकर ,बुद्धि को भ्रम में डालकर साई साई चिल्लाने लगे हो?

6 – अगर भगवान कि पूजा करनी है तो इतने प्यारे,दयालु ,कृपालु भगवान है न तुम्हारे पास फिर साई क्यो ? अगर संतो की पुजा करनी है तो साई से महान ,ऋषि मुनि है न ….. साई ही क्यो ?

7 - मुस्लिम अपने धर्म के पक्के होते है ……अल्लाह के अलावा किसी और की और मुंह भी नहीं करते …..

जब कोई अपना बाप नहीं बदल सकता ….

अथवा अपने बाप कि जगह पर किसी और को नहीं देख सकता तो तुम साई को अपने भगवान कि जगह पर देखकर क्यो दुखी या क्रोधित नहीं होते ????

8 - अगर सनातन धर्मी हो तो सनातन धर्म में तो काही साई है ही नहीं …..

तो आप खुद को सनातन धर्मी कहलाना पसंद करोगे या धर्मनिरपेक्षी साई भक्त ????

9 – आप खुद को श्रीकृष्ण भक्त कहलाने में कम गौरव महसूस करते है क्या जो साई भक्त होने का बिल्ला टाँगे फिरते हो….

क्या राम और कृष्ण से प्रेम का क्षय हो गया है …. ?

10 – ॐ साई राम ……..ॐ हमेशा मंत्रो से पहले ही लगाया जाता है अथवा ईश्वर के नाम से पहले …..साई के नाम के पहले ॐ लगाने का अधिकार कहा से पाया? जय साई राम ……….

श्री मे शक्ति माता निहित है ….

श्री शक्तिरूपेण शब्द है …….

जो कि अक्सर भगवान जी के नाम के साथ संयुक्त किया जाता है …….

तो जय श्री राम में से …..

श्री तत्व को हटाकर ……

साई लिख देने में तुम्हें गौरव महसूस होना चाहिए या शर्म आनी चाहिये?

ये जो नीचे फोटो है ……

ऐसे फोटो आजकल चोराहों पर लगाकार …

भगवान का खुलेआम अपमान और हिन्दुओ को मूर्ख बनाया जा रहा है ?

मुस्लिम साई के चक्कर में नहीं पड़ते …. धर्म के पक्के है ….. सिर्फ अल्लाह …….

हिन्दू प्रजाति ही हमेशा मूर्ख क्यो बनती है ……

जय श्रीकृष्ण……

साईं बाबा एक मुस्लिम संत

4 Jul 2015

मुस्लिम धर्म मेँ संत फकीर कहा जाता हैँ तो फिर साई भी फकीर यानी मुस्लिम संत थे । संत वही होता है जो लोगो को भगवान से जोड़े , संत वो होता है जो जनता को

भक्तिमार्ग की और ले जाये ,

संत वो होता है जो समाज मे व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए पहल करे …

इस साई नाम के मुस्लिम पाखंडी फकीर ने जीवन भर तुम्हारे राम या कृष्ण का नाम तक नहीं लिया ,

और तुम इस साई की काल्पनिक महिमा की कहानियो को पढ़ के इसे भगवान मान रहे हो …

कितनी भयावह मूर्खता है ये ….

महान ज्ञानी ऋषि मुनियो के वंशज आज इतने मूर्ख और

कलुषित बुद्धि के हो गए है कि उन्हे भगवान और एक साधारण से मुस्लिम फकीर में फर्क नहीं आता ?

जब आज तक कभी कोई मुस्लिम तुम्हारे शिव जी की शिवलिंग पर दूध या जल चढ़ाने नहीं आया , कभी तुम्हारे हनुमान जी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाने नहीं आया , कभी तुम्हारे विष्णु जी पर तुलसी-दल या

असंख्यों मंदिरो में स्थापित मूर्तियो पर पुष्प चढ़ाने नहीं आया

तो तुम किस मुंह से सडी हुयी लाशों के ऊपर बनी कब्रों,दरगाहों और मजारों पर चादर चढ़ाने पहुच जाते हो ?

शरम नहीं आती … वो तुम्हारे भगवान को गालिया देते है , निंदा करते है , और दिन मे एक दो नहीं पाँच पाँच बार मस्जिद से साफ साफ चिल्लाते है कि एकमात्र ईश्वर अल्लाह है और कोई है ही नहीं

… तो तुम्हें सुनाई नहीं देता क्या ये , या फिर तुम्हारी ऐसी कौन सी इच्छा है जो कि हमारे परमकृपालु, दयालु ,भक्तवत्सल भगवान पूरी कर ही नहीं सकते ,

उसे या तो सड़े हुये मुर्दे की हड्डिया पूरा कर सकती है , या फिर शिरडी मे जन्मा एक मुस्लिम फकीर साई

आखिर जाते क्यो हो? जब तुम्हारी प्यास भगवान रूपी ,गंगाजल से नहीं बुझ रही , तो दरगाह और साई रूपी कुए के पानी से कैसे बुझ जाएगी ?

गंगाजल को छोडकर कीचड़ की और भागने वाले कितने महामूर्ख होते है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन अंधभक्तों को दुनिया भर के तर्क ,तथ्य ,प्रमाण तक दे दिये , यहा तक कि श्री कृष्ण भगवान द्वारा , गीता माता में इसी विषय पर कहा गया एक श्लोक तक दिखा दिया … पर इन धूर्तों की बुद्धि , कलयुग के पाप ने इतनी कुंठित,और प्रदूषित कर दी है कि इन्हे समझ ही नहीं आता …

गीता में श्री कृष्ण भगवान जी ने साफ साफ कहा है कि जो जिसे पूजता है वो उसे ही प्राप्त होता है … यानि मरे हुये व्यक्तियों को सकाम भाव से पूजने वाला पिशाच योनि को प्राप्त होता है …

ये स्वयं श्री कृष्ण ने कहा , तो भी इन मूर्खो मे इतनी भी बुद्धि नहीं बची कि समझ जाये कि साई को पूजने वाले ,

मृत्युपर्यंत पिशाच बनकर ही भटकेंगे ……..

तुम चाहे कितना भी साई साई चिल्लाओ गला फाड़ फाड़ के,चाहे दरगाहों पर जाकर कितनी भी चादर चढालों , तुम श्री भगवान को तो क्या उनकी कृपा का एक अंश भी प्राप्त नहीं कर सकते ……

ये सत्य है ……..

साई ने ऐसा क्या कर दिया था जो कि तुम्हारा गला नहीं दुखता उसकी महिमा गाते गाते ?

अरे पूरा भारत उस समय अंग्रेज़ो के डंडे खा रहा था , साई ने बचाया था क्या ? अगर वो भगवान था या संत था तो उसने गुलामी की बेड़ियो में जकड़ी भारत माता को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए क्या किया था?

उस समय

भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय सर्वदेवमई गोमाताए काटी जाती थी उनके ऊपर साई कभी क्यो नहीं बोला?

भगवान श्रीकृष्ण थे , जब कंस के अनुचर गोमाताओ को ले जाने लगे तो , मार कर परलोग पाहुचा दिया था और एक ये साई था कि हजारो गोमाताए रोज कटती रही ये बचाना तो दूर उनके ऊपर कभी बोला तक नहीं ? काहे का भगवान या संत था ये ?

क्या इस भूमि की सनातनी संताने इतनी बुद्धिहीन हो गयी है कि जिसकी भी काल्पनिक महिमा के गपोड़े सुन ले उसी को भगवान और महान मानकर भेडॉ की तरह उसके पीछे चल देती है ?

इसमे हमारा नहीं आपका ही फायदा है …. श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क होता है, श्रद्धालु बनो …. भगवान को चुनो , कृष्ण के बनो …. साई के बनाकर सिर्फ भूत प्रेत बनाकर ही भटकोगे ….. जय श्री कृष्ण ………

सदी का सबसे बड़ा पाखंड – शिर्डी साईं

4 Jul 2015

साई बाबा की मार्केटिंग करने वालो ने या उनके अजेंटों ने या सीधे शब्दो मे कहे तो उनके दलालो ने काफी कुछ लिख रखा है।

साई बाबा की चमत्कारिक काल्पनिक कहानियो व गपोड़ों को लेकर बड़ी बड़ी किताबे रच डाली है।

स्तुति, मंत्र, चालीसा, आरती, भजन, व्रत कथा सब कुछ बना डाला… साई को अवतार बनाकर, भगवान बनाकर, और कही कही भगवान से भी बड़ा बना डाला है… किसी भी दलाल ने आज तक ये बताने का श्रम नहीं किया कि साई किस आधार पर भगवान या भगवान का अवतार है ?

जब भगवान का अवतार है तो हिन्दूधर्मग्रंथो के आ धार पर ही तो तय होगा न कि अवतार है या नहीं? भगवान श्रीकृष्ण जी द्वारा कही गयी गीता जी में श्री कृष्ण ने अवतार लेने के कारण और कर्मो का वर्णन करते हुये कहते हैँ कि —

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि यूगे यूगे ॥

अर्थात, साधू पुरुषो के उद्धार के लिए, पापकर्म करने वालो का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मे युग-युग मे प्रकट हुआ करता हू।

भगवान श्रीकृष्ण जी द्वारा कहे गए इस श्लोक के आधार पर देखते है कि साई कितने पानी में है —

(1) साई अवतार ने किन साधु पुरुषों का उद्धार किया ?

(2) तथा साई अवतार ने कौन से पाप कर्म करने वालों का विनाश किया ?

(3) और साई अवतार ने कौन से धर्म की स्थापना की ?

साई ने पानी के दिये लगाये । लेकिन यह तो भक्तिभाव में कही गई बाते हैं, इनमें तथ्य कहां है? इतिहास अलौकिक बातों से नहीं बनता। ऐसी बातें करने वालों को झूठा माना जाता है और ऐसे ही लोग तो धर्म की प्रतिष्ठा गिराते हैं।

[A] परित्राणाय साधूनां (साधु पुरुषो के उद्धार के लिए ) – यदि ये कटोरे वाला साई भगवान का अवतार था तो इसने कौन से सज्जनों का उद्धार किया था? जब कि इसके पूरे जीवनकाल मे ये शिरडी नाम के पचास-सौ घरो की बाड़ी (गाँव) से बाहर भी न निकला था..और इसके मरने के बाद उस गाँव के लगभग आधे लोग भी बेचारे रोगादि प्रकोपों से पीड़ित होके मरे थे…यानि विश्व भर के सज्जन तो क्या अपने गाँव के ही सज्जनों का उद्धार नहीं कर पाया था….

उस समय ब्रिटिश शाशन था, बेचारे बेबस भारतीय अंग्रेज़ो के जूते, कोड़े, डंडे, लाते खाते गए और साई महाराज शिरडी मे बैठकर छोटे-मोटे जादू दिखाते रहे, किसी का दुख दूर नहीं बल्कि खुद का भी नहीं कर पाये आधे से ज्यादा जीवन रोगग्रस्त होकर व्यतीत किया और अंत मे भी बीमारी से ही मरे ।

[B] विनाशाय च दुष्कृताम ( दुष्टो के विनाश के लिए) – साई बाबा के समय मे दुष्ट कर्म करने वाले अंग्रेज़ थे जो भारतीयो का शोषण करते थे, जूतियो के नीचे पीसते थे , दूसरे गोहत्यारे थे, तीसरे जो किसी न किसी तरह पाप किया करते थे, साई बाबा ने न तो किसी अंग्रेज़ के कंकड़ी-या पत्थर भी मारा, न ही किसी गोहत्यारे के चुटकी भी काटी, न ही किसी भी पाप करने वाले को डांटा-फटकारा। अरे बाबा तो चमत्कारी थे न पर अफसोस इनके चमत्कारो से एक भी दुष्ट अंग्रेज़ को दस्त न लगे, किसी भी पापी का पेट खराब न हुआ….

यानि दुष्टो का विनाश तो दूर की बात दुष्टो के आस-पास भी न भटके।

[C] धर्मसंस्थापनार्थाय ( धर्म की स्थापना के लिए ) – जब साई ने न तो सज्जनों का उद्धार ही किया, और न ही दुष्टो को दंड ही दिया तो धर्म की स्थापना का तो सवाल ही पैदा नहीं होता..

क्यो कि सज्जनों के उद्धार, और दुष्टो के संहार के बिना धर्म-स्थापना नहीं हुआ करती। ये आदमी मात्र एक छोटे से गाँव मे ही जादू-टोने दिखाता रहा पूरे जीवन भर…

मस्जिद के खण्डहर मे जाने कौन से गड़े मुर्दे को पूजता रहा…। मतलब इसने भीख मांगने, बाजीगरी दिखाने, निठल्ले बैठकर हिन्दुओ को इस्लाम की ओर ले जाने के अलावा ,

उन्हे मूर्ख बनाने के अलावा कोई काम नहीं किया….

कोई भी धार्मिक, राजनैतिक या सामाजिक उपलब्धि नहीं..

जब भगवान अवतार लेते है तो सम्पूर्ण पृथ्वी उनके यश से उनकी गाथाओ से अलंकृत हो जाती है… उनके जीवनकाल मे ही उनका यश शिखर पर होता है….

और इस साई को इसके जीवन काल मे शिरडी और आस पास के इलाके के अलावा और कोई जानता ही नहीं था…

या यू कहे लगभग सौ दौ सौ सालो तक इसे सिर्फ शिरडी क्षेत्र के ही लोग जानते थे….

आजकल की जो नयी नस्ल साईराम साईराम करती रहती है वो अपने माता-पिता से पुछे कि आज से पंद्रह-बीस वर्ष पहले तक उन्होने साई का नाम भी सुना था क्या? साई कोई कीट था पतंग था या कोई जन्तु … किसी ने भी नहीं सुना था ….

भगवान श्रीकृष्ण के वचनो के आधार पर ये सिद्ध हुआ कि साई कोई भगवान या अवतार नहीं था…इसे पढ़कर भी जो साई को भगवान या अवतार मानेगा या ऐसा मानकर साई की पूजा करेगा , वो सीधे सीधे भगवान श्रीकृष्ण का निरादर, और भगवान श्रीकृष्ण वाणी का अपमान कर रहा है….

श्रीकृष्ण का निरादर एवं उनकी वाणी के अपमान का मतलब है सीधे सीधे ईशद्रोह….

तो साई भक्तो निर्णय कर लो तुम्हें श्री कृष्ण का आश्रय चाहिए या साई के चोले मे घुसकर अपना पतन की ओर बढ़ोगे……….. जय जय श्रीकृष्ण

जिसमे थोड़ी सी भी अक्ल होगी उसे समझ मे आएगा कि ये लेख धार्मिक तौर पर स्पष्ट रूप से सिद्ध कर रहा है कि साई कोई भगवान या अवतार नहीं था…

अगले लेख मे सिद्ध करेंगे कि साई कोई संत या साधु या महापुरुष भी नहीं था…

सभी धर्मप्रेमी हिन्दू भाइयो से निवेदन है कि इस लेख को अपने नाम से कोई भी कही भी पोस्ट या कमेंट के रूप में कर सकता है….

अगर आपके एक कमेंट या पोस्ट से एक साईभक्त मुर्दे की पूजा छोडकर भगवान की और लौटता है तो आप पुण्य के भागी है……. जय श्रीकृष्ण



आगे जारी हैँ...



शिरडी साई : वैदिक धर्म के लिए एक अभिशाप ? साई का पुरा सच...

3 Jul 2015

{सर्वाधिकार सुरक्षित:- प्रस्तुत लेख का मंन्तव्य साँई के प्रति आलोचना का नही बल्कि उनके प्रति स्पष्ट जानकारी प्राप्त करने का है। लेख मेँ दिये गये प्रमाणोँ की पुष्टि व सत्यापन “साँई सत्चरित्र” से करेँ, जो लगभग प्रत्येक साईँ मन्दिरोँ मेँ उपलब्ध है। चूँकि भारतवर्ष मेँ हिन्दू पौराणिक लोग अवतारवाद मेँ ईश्वर को साकार रूप मेँ स्वीकार करते हैँ। अतएव यहाँ पौराणिक तर्कोँ के द्वारा भी सत्य का विश्लेषण किया गया है।}

आज आर्यावर्त मेँ तथाकथित भगवानोँ का एक दौर चल पड़ा है। यह संसार अंधविश्वास और तुच्छ ख्याति- सफलता के पीछे भागने वालोँ से भरा हुआ है। “यह विश्वगुरू आर्यावर्त का पतन ही है कि आज परमेश्वर की उपासना की अपेक्षा लोग गुरूओँ, पीरोँ और कब्रोँ पर सिर पटकना ज्यादा पसन्द करते हैँ।”

आजकल सर्वत्र साँई बाबा की धूम है, कहीँ साँई चौकी, साँई संध्या और साँई पालकी मेँ मुस्लिम कव्वाल साँई भक्तोँ के साथ साँई जागरण करने मेँ लगे हैँ। मन्दिरोँ मेँ साँई की मूर्ति सनातन काल के देवी देवताओँ के साथ सजी है। मुस्लिम तान्त्रिकोँ ने भी अपने काले इल्म का आधार साँई बाबा को बना रखा है व उनकी सक्रियता सर्वत्र देखी जा सकती है। इन सबके बीच साँई बाबा को कोई विष्णु का ,कोई शिव का तथा कोई दत्तात्रेय का अवतार बतलाता है।

परन्तु साँई बाबा कौन थे? उनका आचरण व व्यवहार कैसा था? इन सबके लिए हमेँ निर्भर होना पड़ता है “साँई सत्चरित्र” पर!

जी हाँ ,दोस्तोँ! कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीँ जो रामायण व महाभारत का नाम न जानता हो? ये दोनोँ महाग्रन्थ क्रमशः

श्रीराम और श्रीकृष्ण के उज्ज्वल चरित्र को उत्कर्षित करते हैँ, उसी प्रकार साईँ के जीवनचरित्र की एकमात्र प्रामाणिक उपलब्ध पुस्तक है- “साँईँ सत्चरित्र”॥ इस पुस्तक के अध्ययन से साईँ के जिस पवित्र चरित्र का अनुदर्शन होता है, क्या आप उसे जानते हैँ?

चाहे चीलम पीने की बात हो, चाहे स्त्रियोँ को अपशब्द कहने की? चाहे माँसाहार की बात हो, या चाहे धर्मद्रोह, देशद्रोह व इस्लामी कट्टरपन की…. इन सबकी दौड़ मेँ शायद ही कोई साँई से आगे निकल पाये। यकीन नहीँ होता न? तो आइये चलकर देखते हैँ… इसके लिए शिरडी साँई के विषय मेँ व्याप्त भ्रान्तियोँ की क्रमबध्द समीक्षा करना चाहेँगे।…

[A] क्या साँईं ईश्वर या कोई अवतारी पुरूष है?

साईं बाबा का जीवन काल 1835 से 1918 तक था , उनके जीवन काल के मध्य हुई घटनाये जो मन में शंकाएं पैदा करती हैं की क्या वो सच में भगवान थे , क्या वो सच में लोगो का दुःख दूर कर सकते है?

प्रश्नः

{1} भारतभूमि पर जब-जब धर्म की हानि हुई है और अधर्म मेँ वृध्दि हुई है, तब-तब परमेश्वर साकाररूप मेँ अवतार ग्रहण करते हैँ और तबतक धरती नहीँ छोड़ते, जबतक सम्पूर्ण पृथ्वी अधर्महीन नहीँ हो जाती। लेकिन साईँ के जीवनकाल मेँ पूरा भारत गुलामी की बेड़ियोँ मे जकड़ा हुआ था, मात्र अंग्रेजोँ के अत्याचारोँ से मुक्ति न दिला सका तो साईँ अवतार कैसे?

{2} राष्ट्रधर्म कहता है कि राष्ट्रोत्थान व आपातकाल मेँ प्रत्येक व्यक्ति का ये कर्तव्य होना चाहिए कि वे राष्ट्र को पूर्णतया आतंकमुक्त करने के लिए सदैव प्रयासरत रहेँ, परन्तु गुलामी के समय साईँ किसी परतन्त्रता विरोधक आन्दोलन तो दूर, न जाने कहाँ छिप कर बैठा था,जबकि उसके अनुयायियोँ की संख्या की भी कमी नहीँ थी, तो क्या ये देश से गद्दारी के लक्षण नहीँ है?

{3} यदि साँईँ चमत्कारी था तो देश की गुलामी के समय कहाँ छुपकर बैठा था?

{4} भारत का सबसे बड़ा अकाल साईं बाबा के जीवन के दौरान पड़ा

>(a) 1866 में ओड़िसा के अकाल में लगभग ढाई लाख भूंख से मर गए

>(b) 1873 -74 में बिहार के अकाल में लगभग एक लाख लोग प्रभावित हुए ….भूख के कारण लोगो में इंसानियत ख़त्म हो गयी थी|

>(c ) 1875 -1902 में भारत का सबसे बड़ा अकाल पड़ा जिसमें लगभग 6 लाख लोग मरे गएँ| साईं बाबा ने इन लाखो लोगो को अकाल से क्यूँ पीड़ित होने दिया यदि वो भगवान या चमत्कारी थे? क्यूँ इन लाखो लोगो को भूंख से तड़प -तड़प कर मरने दिया?

{5} साईं बाबा के जीवन काल के दौरान बड़े भूकंप आये जिनमें हजारो लोग मरे गए

(a) १८९७ जून शिलांग में

(b) १९०५ अप्रैल काँगड़ा में

(c) १९१८ जुलाई श्री मंगल असाम में साईं बाबा भगवान होते हुए भी इन भूकम्पों को क्यूँ नहीं रोक पाए?…क्यूँ हजारो को असमय मारने दिया ?

[B] साँई बाबा माँसाहार का प्रयोग करते थे व स्वयं जीव हत्या करते थे ?

(1) मस्जिद मेँ एक बकरा बलि देने के लिए लाया गया। वह अत्यन्त दुर्बल और मरने वाला था। बाबा ने उनसे चाकू लाकर बकरा काटने को कहा। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 23. पृष्ठ 161.

(2) तब बाबा ने काकासाहेब से कहा कि मैँ स्वयं ही बलि चढ़ाने का कार्य करूँगा। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 23. पृष्ठ 162.

(3) फकीरोँ के साथ वो आमिष(मांस) और मछली का सेवन करते थे। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 5. व 7.

(4) कभी वे मीठे चावल बनाते और कभी मांसमिश्रित चावल अर्थात् नमकीन पुलाव। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 38. पृष्ठ 269.

(5) एक एकादशी के दिन उन्होँने दादा कलेकर को कुछ रूपये माँस खरीद लाने को दिये। दादा पूरे कर्मकाण्डी थे और प्रायः सभी नियमोँ का जीवन मेँ पालन किया करते थे। -: साँईँ सत्चरित्र, अध्याय 32. पृष्ठः 270.

आगे जारी हैँ....

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