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सर्वव्यापी परमात्मा का स्वरुप और विष्णुजी के कार्यो मेँ भिन्नता...?




परमात्मा तो निर्दोष होँता हैँ...




निर्दोषं हि समं ब्रह्म


[गिता 5-19]


अर्थात... परमात्मा निर्दोष और सम हैँ...


परन्तु यह बात विष्णुजी पर लागू नहीँ होती,

विष्णुजी निर्दोष बिलकुल भी प्रतित नहीँ होते और सम भी नहीँ हैँ...

तथा किसी भी दृष्टिकोण से सर्वशक्तिमान भी प्रतित नहीँ होते...वह कैसे...?



जालंधर और विष्णुजी मेँ युद्ध चल रहा था तब अचानक विष्णुजी गिर पडे,जालंधर जब विष्णुजी पर प्रहार करने ही वाला था तब लक्ष्मीजी वहा पर आ गयी,

गिर पडे अपने पति को देखकर लक्ष्मीजी रोते रोते जालंधरको कहने लगी


श्रृणुष्व वचनं भ्रातर्जितो विष्णुर्धृतस्त्वया ।

भगिन्या न च वैधव्यं दातुं युक्तं महाबल


[पद्मपुराण उ.खं. अध्याय - 8, श्लोक 84]


अर्थात... "हे भ्रात: विष्णु मेरे पति हैँ, उनको तुम्हने जित लिया, परंतु अब मुझ भगिनीको वेधव्य देणा तुझे उचित नहीँ"


उस वक्त जालंधर ने विष्णुजी को मुक्त कर दिया, तब विष्णुजी ने जालंधर से प्रसन्न होकर कुछ वरदान मांगने को कहा, उस वक्त जालंधर ने वर मांगा की आप सहपरिवार क्षिरसागर मेँ रहने के लिये जायेँ...

तथास्तु बोलकर तभी से विष्णुजी क्षिरसागर मेँ निवास करने लगेँ (इस घटना से पहले विष्णुजी क्षिरसागर मेँ नही थे...?)


जिस जालंधर ने विष्णुजी को मुक्त किया उसी की पत्नी वृंदा के पतिव्रता धर्म को विष्णुजी मायावी वेष धर कर भंग कर दिया...

इससे ये सिध्द होता हैँ की विष्णुजी सर्वशक्तिमान तो नही हैँ, क्यो एक राक्षस के कैद मेँ चले गये थे तथा सम भी नहीँ हैँ क्योकी अपने उपर उपकार करनेवाले की पत्नीको कपट करके व्यभिचार करना यह तो समता नहीँ प्रतित होती...


तथा, वृंदा ने विष्णुजी को शाप दे दिया


अहं मोहं यथा नीता त्वया मायातपस्विना । तथा तव वधूं मायातपस्वी कोऽपि नेष्यति ॥


[पद्मपुराण उ.खं. अध्याय - 16, श्लोक 55]


अर्थात... "जिस प्रकार तुम्हने तपस्वी बनकर मुझे फसाया हैँ, उस प्रकार तुम्हारी पत्नीको भी मायावी तपस्वी लेकर जायेगा" (उपर्युक्त शापसे ही सिताहरण हुआ था...!)


इत्युक्त्वा सा तदा वृन्दा प्राविशध्दव्यवाहनम्‌ । विष्णुना वार्यमाणापि तस्यामासक्तचेतसा ॥

ताते हरिस्तामनुसंस्मरन्मुहुर्वृन्दाचिताभस्मरजोऽवगुण्ठित : । तत्रैव तस्थौ सुरसिद्धसंघै: प्रबोध्यमानोऽपि ययौ न शान्तिम्‌ ॥


[पद्मपुराण उ.खं. अध्याय - 105, श्लोक 31 और 32]


अर्थात... बादमेँ वृंदाके स्थान मेँ आसक्त रहने के कारण विष्णुजीने बहुत समझाया परंतु वह अग्नी मेँ प्रवेश कर गयी और भस्म हो गयी ।

विष्णुजी बार बार उसकी याद करके उसका भस्म शरीय को लगाकर उसकी चिता के पास बैठे रहे, देवताओँने बहोत समझाया पर उनको शांति नहीँ मिल रही थी, इसिलिये देवताओँने लक्ष्मी, गौरी और सावित्री जी को विनती की, उन तिनोँ देवियोँने तीन बीज देकर कहा की, विष्णुजी जहां पर बैठे हैँ वहा पर उनके सामने यह तिन बिज लगा दो...

तब देवताओँने वैसा ही किया, उसके बाद तिन बीजोँ से मालती, आवली और तुलसी यह तिन वनस्पती उत्पन्न हो गयी



स्रीरुपीणीर्वनस्पतीर्द्दष्टाव विष्णुस्तदा नृप । उत्तस्थौ संभ्रमाद्‌वृन्दारुपातिशयमोहित: ॥॥ दृष्टाश्र्च तेन ता रागात्कामासक्तेन चेतसा ॥


[पद्मपुराण उ.खं. अध्याय - 107, श्लोक 3]


अर्थात... उन स्रीरुपी वनस्पती को देख कर वृंदाके रुपसे अतिशय मोहित हुयें, कामासक्त विष्णुजी वृंदा के दु:ख भुलकर वैकुठ को चले गये ।



ये सब जान कर आपको हैराणी हो रही होगी परंतु यही वही पुराण हैँ जिसे विष्णुजी का पुरा चरित्र बखान होता हैँ, और विष्णुजी के दस अवतार भी इसी मेँ मिलते हैँ...

उसमेँ बताये गये कथाओँ की माने तो देवताओँको भी शापसे पतन भोगना पडता हैँ...

जिन देवताओँको शापके दुख भोगना पडता हैँ वह परमेश्वर कैसे हो सकता हैँ इसिलिये परमेश्वर विष्णुजी नहीँ हो सकते क्योँकी...


न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।


[गिता 4-14 और 9-9]


अर्थात... हे अर्जुन! हेँ अर्जुन ! कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते...

उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते...





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