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"परब्रह्म परमेश्वर" का अवतार हैँ भगवान श्रीकृष्ण, विष्णुजी का नहीँ, विष्णुजी देवता हैँ परमेश्वर नहीँ... जानिये कैसे ?





परमेश्वर नहीँ हैँ किसी के आधीन...





सर्वप्यापी परमेश्वर न तो किसी के आधीन हैँ और ना हीँ किसी के पराधीन होँता हैँ... परंतु विष्णुजी तो स्वंय को परमेश्वर के आधीन मानकर अपने आपको पराधीन कहते हैँ, तो विष्णुजी को परमेश्वर कैसे माना जा सकता हैँ...?



तो पढियेँ ये सबसे बडा प्रमाण...



वयं मायावृता: कामं न स्मरामो जगद्गुरुम् । परमं पुरषं शान्तं सच्चिदानन्दमव्ययम्‌॥2॥

अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शिवोऽस्मीति मोहिता:। न जानीमो वयं धात: परंवस्तु सनातनम॥3॥

यन्मायामोहितश्र्चाहं सदा वर्ते परात्मन:। परवान् दारुपाञ्चाली मायिकस्य यथा वशे॥4॥


[देवीभागवत 4.19]


अर्थात विष्णुजी ब्रम्हदेव से कहते हैँ...

"हम मायासेँ व्याप्त होनेँ के कारण शांत, सच्चिदानन्दघन और अव्यय ऐसा जो परमपुरुष जगदगुरु हैँ, वह हमसे सचमेँ स्मरण होता हीँ नहीँ,

मैँ विष्णु, मैँ ब्रम्हदेव, मैँ शिव ऐसा हम लोँगोँ को मोह हो चुका हैँ, तथा उस कारण से परमात्मारुप सनातन वस्तुका ज्ञान, हे विधाता हमेँ होता ही नहीँ, परमात्मा की मायासेँ मैँ सर्वदा मोहित रहने के कारण कपडे की गुडिँया जिस प्रकार तांत्रिक-मांत्रिको के आधीन रहती हैँ उसी प्रकार मैँ पराधीन हुँ"


अंह परवान्‌ परात्मन: वशे वर्ते

मैँ सर्वदा परमात्मा के आधीन हुँ...

जिस प्रकार विष्णुजी परमात्मा न होकर विष्णुजी जिनके आधीन हैँ वही परमात्मा हैँ, और वह विष्णुजी से निराला हैँ यह सिध्द होता हैँ ।





जबकी श्रीकृष्ण सर्वशक्तीमान परमेश्वर के अवतार हैँ ।


गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥ गिता अध्याय 9, श्लोक 18. Geeta Link


अर्थात हे अर्जुन, होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान #और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ॥

(#प्रलयकाल में संपूर्ण भूत सूक्ष्म रूप से जिसमें लय होते हैं उसका नाम 'निधान' है)



मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।


[गिता 7-7]


अर्थात... हे धनज्जय ! मुझसे भिन्न दुसरा कोई भी परम कारण नहीँ हैँ...


एक तरफ भगवान श्रीकृष्णजी का कहना की मै पोषन कर्ता, उत्पादक, संहारक, हितचिंतक, रक्षक, साक्षी, आश्रयस्थान, निधान, अविनाशी, मुलकारण, मोक्षदाता परमेश्वर हुँ तथा मुझसे भिन्न दुसरा कोई भी परम कारण नहीँ हैँ।

बल्की विष्णुजी अपने आपको परमेश्वर का आधीन बतला रहेँ हैँ....

तो आप ही बतायेँ की विष्णुजी कैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर होँ सकते हैँ

हमनेँ आगे और प्रमाणो मेँ खुलासा किया हैँ...

अब आपके मन मेँ ये सवाल बार बार उठ रहा होगा की, की भगवान ने गिता के दसवे अध्याय मेँ ये भला ये क्यु कहा की

"अदिती के बाराह पुत्रो मेँ विष्णु मै हुं" और "शस्त्रधारीओ मेँ राम मैँ हुं" तथा "रुद्रो मेँ शंकर मैँ हुं"... जानने के लिये यहां किल्क करे।







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