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एक मोहिनी रुप देखने के लिये शिवजी विष्णुजी को "सर्वशक्तिमान" कहते हैँ...?





तो कैसे शिव हो सकते परमेश्वर...





महादेवजीने विष्णुजी से कहा -


समस्त देवोँके आराध्य-देव ! आप विश्वव्यापी, जगदिश्वर एवं जगत्स्वरुप हैँ । समस्त चराचर पदार्थोके मुल कारण, ईश्वर और आत्मा भी आप ही हैँ ॥4॥

इस जगत् के आदि, मध्य और अन्त आपसे ही होते है; परन्तु आप आदी, मध्य और अन्तसे रहित हैँ ।

आपके अविनशी स्वरुपमेँ द्रष्टा, दृश्य, भोक्ता और भोग्यका भेदभाव नहीँ हैँ ।

वास्तवमेँ आप सत्य, चिन्मात्र ब्रह्म ही हैँ ॥5॥

कल्याणकामी महात्मालोग इस लोक और परलोक दोनोँकी आसत्की एवं समस्त कामनाओँका परीत्याग करके आपके चरणकमलोँकी ही आराधना करते हैँ॥6॥

आप अमृतस्वरुप, समस्त प्राकूत गुणोँसे रहित, शोककी छायासे भी दुर, स्वयं परीपूर्ण ब्रम्ह है । आप केवल आनन्दस्वरुप हैँ, आप निर्विकार हैँ। आपसे विश्वकी उत्पति, स्थिति और प्रलयके परम कारण हैँ। आप समस्त जीवोँको शुभाशुभ कर्मका फल देनेवाले स्वामी हैँ। परन्तु यह बात सबकी अपेक्षासे कही जाती हैँ; वास्तवमेँ आप सबकी अपेक्षासे रहित, अनपेक्ष हैँ॥7॥

हे स्वामीन ! कार्य और कारण, द्वैत और अद्वैत-जो कुछ हैँ, वह सब एकमात्र आप ही हैँ; ठीक वैसे ही जैसे आभूषणोँको रुपमेँ स्थित सुवर्ण और मुल सुवर्ण मेँ कोई अन्तर नहीँ हैँ।

......॥8॥......॥9॥.....॥10॥

हे प्रभो ! आप सर्वात्मक एवं ज्ञानस्वरुप हैँ। इसीलिये वायुके समान आकाशमेँ अदृश्य रहकर भी आप सम्पुर्ण चराचर जगत् मेँ सदा-सर्वदा विद्यमान रहते हैँ।...॥11॥

हे प्रभोँ ! आप गुणोँको स्वीकार करके लीला करनेके लिये बहुत से अवतार ग्रहण करते हैँ, तब मैँ उसको दर्शन करता ही हुँ। अब मैँ आपके उस अवतारका भी दर्शन करना चाहता हुँ, जो आपने स्रीरुपमेँ ग्रहण किया था ॥12॥

जिससे दैत्योको मोहित करके आपने देवताओँको अमृत पिलाया।

हे स्वामिन् ! उसीको देखनेके लिये हम आये हैँ। हमारे मनमेँ उसके दर्शनका बडा कौतुहल हैँ ॥13॥



[श्रीमदभगवत कथा महापुराण अष्टम स्कन्ध, 12 अध्याय श्लोक खुद पड लो...]



तो आप मेँ विचार करने की शक्ति होगी... तो बताओँ की शिवजीको विष्णुजी की इतनी प्रशंसा करनी पडी तो शिव कैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर हो सकते हैँ...



शिवजी तो विष्णुजी को "वास्तवमेँ आप सत्य, चिन्मात्र ब्रह्म ही हैँ" ॥5॥ कहते है...

और शिवभक्त शिव को परमेश्वर बताते हैँ कितना विरोधाभास हैँ भक्तोँ और भगवान की सोच मेँ...

तथा शिवजी "सर्वशक्तिमान परमेश्वर" न पहचान कर विष्णुजी को परमेश्वर कहते हैँ परन्तु विष्णुजी स्वयं को परमेश्वर नहीं मानते और अपने आप को परमेश्वर के अधीन मानते हैँ...जानिये यहाँ किल्क करके...







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