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शिवजी और "परब्रह्म परमेश्वर" भगवान श्रीकृष्ण के आचार और विचार भी नहीँ मिलते हैँ





मोहिनी रुप को तक नहीँ पहचान पाये शिवशंकर...





आप सब जानते हीँ होँगे की शिवजी ने विष्णुजी के एक "मोहिनी" रुप को नहीँ पहचान सके और काम वासना तृप्त करने के लिये भाग गये मोहीनी के पिछे,...



फिर भी अपनी जानकारी के लिये, पढिये भागवतके कुछ श्लोक...



वे मोहनीको निहारने और उसकी चितवनके रसमेँ डुबकर इतने विहल हो गये कि उन्हे अपने आपकी भी सुधि न रही ।...॥22॥

मोहिनी ने शंकरजीका विवेक छीन लिया । वे उसके हाव-भावोँसे कामातुर हो गये और भवानीके (पार्वतीजी) सामने ही लज्जा छोड़कर उसकी ओर चल पडे ॥25॥

शकंरजी की इद्रियाँ अपने वशमेँ नहीँ रहीँ, वे कामवश हो गये थे; अत हथिनीके पीछे हाथीकी तरह उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे ॥27॥

शकंरजी भी उन मोहिनीवेषधारी अद्भुतकर्मा विष्णुजीके पीछे-पीछे दौड़ने लगे । मानो उनके शत्रु कामदेवने इस समय उनपर विजय प्राप्त कर ली हैँ ॥31॥

कामुक हथिनीके पीछे दौड़नेवाले मदोन्मत हाथीके समान वे मोहिनीके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। यद्यपि शकंरजी का वीर्य अमोघ है, फिर भी मोहिनीकी मायासे वह स्खलित हो गया ॥32॥


[श्रीमद्भागवत कथा महापुराण अष्टम स्कन्ध, 12 अध्याय, श्लोक 17 से 37 ]



और दुसरी तरफ भगवान श्रीकृष्ण काम के निरोध के विषय मेँ कहते हैँ की...


पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्‌ ॥

और

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌ ॥



हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल ॥3-41॥

और

हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल ॥3-43॥


{गिता अध्याय 3, श्लोक 41 और 43 }



एक मोहिनी रुप को न पहचान पाने वाले महादेव के इस प्रसंग को उनके भक्त उनकी लिला कह कर टाल देते हैँ परंतु विर्य जमिन पर गिरने की बात भी क्या लिला हो सकती हैँ...? और ऐसी लिला करने का शिवजी का क्या प्रयोजन था...?

इससे यह प्रतित होता हैँ की शिवजी परमेश्वर नहीँ बल्की देवता हैँ...





तथा शिवजी के क्रोध मेँ गणपती अपना सिर तथा कामदेव अपना शिरीर गवा बैठे,

तथा भृगृ ऋषी के जरासे बहकाने पर क्रोधित हो गये,

शिवजी मे काम वासना और क्रोध दोनो मौजुद परंन्तु भगवान श्रीकृष्ण नेँ कहा हैँ की


त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥


[गिता अध्याय 16, श्लोक 21.]


काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को 'नरक के द्वार' कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए ॥16-21॥



तो आप ही तय किजीये की शिव और भगवान श्री कृष्ण के आचरण और विचार मेँ कितना फरक हैँ...







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