॥ भगवान श्रीचक्रधर स्वामी ॥

'राक्षसे! इन सब लोगों ने हमें प्रणाम किया है, परंतु तुमने प्रणाम क्यों नहीं किया? रामदेव का उत्तर था, 'महाराज! मैं केवल अपने ईश्ठ महादेव को अथवा उसे दिखाने वालेव्यक्तिको ही नमस्कार करता हूँ, और किसी को नहीं। भगवान ने कहा, 'ठीक है, लेकिन हम भी तुमसे नमस्कार करवाकर ही रहेंगे! स्वामी यह कहकर चुप हो गये और कुछ देर तक सोचते रहे, फिर वे एकाएक बोले, 'अच्छा बतलाओ, तुम अपने महादेव को पहचानते हो कि वह कैसे है ? रामदेव का उत्तर था- 'महाराज! महादेव गौरवर्ण, त्रिनेत्र और पाँच मुख वाले हैं, उनमेें वामभाग में पार्वती बैठी रहती हैं, वे रुण्डमुंडों की माला पहिने रहते हैं और पिंगल रंग की उनकी जटायें हैं। स्वामी ने आकाष की ओर देखकर कहा- 'रामदेव! उधर देखो, तुम्हारे महादेव आकाष मार्ग से नीचे चले आ रहे हैं। भगवान के कथनानुसार जब रामदेव ने ऊपर देखा, तो उसने बिल्कुल उसी रूप में महादेव को आते देखा, जिसका वर्णन उसने अभी-अभी किया था, ध्यानपूर्वक देख लेने पर उसने साश्टांग प्रणाम किया, लेकिन जब वह उठकर खड़ा हो गया, तो उसने वहाँ पर केवल श्रीचक्रधर स्वामी को खड़े देखा और कुछ नहीं था, इस चमत्कार से उसकी बुद्धि कुछ देर तक संभ्रमित रही, जब वह सोचने लायक हुआ, तो अपनी गलती पर पछताने लगा, सारा रहस्य उसके आगे खुल गया। वह स्वामी की समर्थता और दिव्यता को भलीभांति समझ गया, तत्काल उठकर भगवान के श्रीचरणों में उसने नमस्कार किया और कहा- 'महाराज! आप ही महादेव हैं, उस दिन से वह प्रतिदिन भगवान को नमस्कार करने आने लगा। ______________________________

माली को प्राणदान

एक दिन वाड़ेगांव निवासी एक माली सर्पदंष से मर गया। नानाविध उपचार करने पर भी जब कुछ फायदा न हुआ तो लोग निराषाजनित क्रोध से कहने लगे इसे खड़कुली में एक ईशवरीय पुरुश आये हुए हैं उनके पास ले जाकर डाल दो। कुछ सिद्धि रखते होंगे तो आप ही जीवित कर देंगे, नहीं तो मर तो गया ही है। इस प्रकार विचार कर उस मृत मनुष्य को उठाकर भगवान के निवास स्थान पर ले आये और एक तरफ रखकर वापस चले गये। कुछ देर बाद नागदेव जी और लखुदेवबा भिक्षा को चले तो लाष देख कर कहने लगे लोग भगवान की परीक्षा लेना चाहते हैं, अस्तु अवष्य ही महाराज इसे जीवित करेंगें। अनन्तर आउसादेवी किसी काम के लिये उधर आई तो माली की स्त्री गिड़गिड़ा कर उनसे कहने लगी, माता जी! दुहाई है भगवान की! मेरे पति को प्राणदान दिलाइये। मेरे नन्हें-नन्हें बच्चे भूख से व्याकुल हो रहे हैं, इसके बिना उनका पालन करने वाला कोई नहीं है। मालिन का आर्तनाद सुनकर आउसादेवी का दिल दहल गया और वह दौड़ी-दौड़ी भगवान के पास गई और विनीत भाव से कहने लगीं महाराज! एक अनाथा अबला आपकी षरण में आई हुई आक्रंदन कर रही है, और प्रिय पति की लाष के पास बैठी आपका स्मरण कर रही है। भगवन उस दीना का उद्धार कीजिये। भक्तवत्सल भगवान उठकर वहां गये जहां वह स्त्री षव के पास बैठी मुक्तकंठ से आक्रोष कर रही थी, भगवान को देखकर वह और भी ज़ोर-जोर से रोने लगी तथा माली को जीवित करने की प्रार्थना करने लगी। भगवान ने उस स्त्री को सांत्वना दी और कृपादृश्टयावलोकन से माली को जीवनदान दिया, जिससे दोनों स्त्री-पुरुश महाराज का गुणगान करने लगे। ग्रामवासियों को इस घटना का पता लगा तो महाराज की अलौकिक लीलाओं पर मुग्ध होते हुए सब लोग वहां आये और भगवान का जय जयकार करते हुए पुर्नजीवित माली को आष्चर्यचकित दृशिट से देखने लगे। अंत में भगवान की पूजा अर्चना कर सब लोग अपने-अपने घर की ओर चल दिये, और महाराज भक्तजनों को धर्मनिरूपण करने लगे। ______________________________

भक्त डूब कैसे सकता है?

एक दिन भगवान प्रात: कालीन पूजा-अर्चना के अनंतर भक्तों सहित वन-विहार के लिये गंगातट पर चले आये और भांडेभेदन स्थान के सामने आकर खड़े हो गये, तब गंगा में बाढ़ आयी हुई थी, गंगाप्रवाह की ओर दृशिटनिक्षेप करके भगवान ने नाथोबा तथा नागदेव से पूछा-'क्या तुम दोनों इस समय गंगा के इस प्रवाह को तैरकर पार जा सकते हो? उन दोनों ने उत्तर में कहा-'भगवन! हमारे लिये यह कोई नयी बात नहीं है, हम इसे सहज ही पार कर सकते हैं, भगवान ने मुस्कराकर कहा- 'यदि ऐसा है तो आज हमें भी अपनी तैराकी दिखाओ, भगवान के इस कथन के साथ ही वे दोनों प्रवाह में कूद गये ओर तैरते हुए पार जा पहुँचे, किन्तु भगवान ने उन्हें दम लेने न दिया और उसी अवस्था मे वस्त्र हिलाते हुए वापस आने के लिये उन्हें आवाज़ लगा दी, वे दोनों वैसी ही अवस्था में लौट पड़े, बीच मँझधार में पहुँचने पर नाथोबा थक जाने के कारण हाथपांव मारने की शक्ति खिे बैठा और लगातार पानी के तीव्र बहाव में बहने लगा। नाथोबा को मरणासन्न जान किनारे पर खड़े भक्त ज़ोर से चिल्ला उठे- 'महाराज! आपका सेवक नाथोबा पानी में डूबा जा रहा है, कृपया उसे बचाइये, उसकी रक्षा कीजिये, नहीं तो वह डूब जायेगा! भक्तों की इस करुण पुकार से करुणाकर का âदय पसीज उठा, वे झटसे उठकर गंगातट पर जा पहुँचे, अपने भä को डूबते देख दयामय प्रभु ने ऊँचे स्वर में पुकारकर कहा- 'नाथोबा! घबराओ मत, वहीं पर खड़े हो जाओ भगवान द्वारा आष्वासन पाकर नाथोबा ने खड़े होने की कोषिष की और और वह अथाह पानी को केवल घुटनों तक रहा देख भगवान के ऐष्वर्य के आगे नत-मस्तक हो गया। उसने वहीं से अपने दोनों हाथ जोड़कर भगवान को बारबार नमस्कार किया और उनकी गुणमहिमा गायी। भगवान की आज्ञा पाकर नागदेव उसे सहारा देकर इस पार ले आया, उसने भगवान के श्रीचरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम किया तो भगवान ने पूछा- 'नाथोबा! जान पड़ता है तुमने बहुत ही कश्ट सहा है, अब कैसे हो ? कोई दु:ख हो तो कहा। नाथोबा बोला, 'भगवान! मैंने तो आपकी कृपा से जन्मजन्मांतरों के कष्ट से छुटकारा पा लिया है, आपकी इस तुच्छ दास पर इसी तरह कृपादृशिट बनी रहे, मै इससे अधिक और कुछ नहीं चाहता। ______________________________

आगे जारी हैँ...