॥ भगवान श्रीचक्रधर स्वामी ॥

धन्य हो आया नागदेव कि उसका श्रम सार्थक हुआ है। सहसा मुटटी में भींचे दाम का स्मरण हो आया। संकुचाते हथेली आगे खोल बोला, 'महाराज, यह एक दाम मेरे पास बच गया है, इसका क्या लाना था? स्वामी बोले, 'नागदेव, उसका कुछ भी नहीं लाना था, वह तो आवश्यकता पड़ने पर व्यय के लिये तुम्हें दिया था फिर अन्य भक्तों की ओर मुड़ कहने लगे, 'देखा, इसे कहते हैं सेवाभाव, ज्वराक्रांत होने पर भी नागदेव हमारी आज्ञा पालन करने से नहीं चूका, अवज्ञा की भावना मन में लाये बिना वह इतनी दूर गया और कष्ट सहकर सारा सामान ले आया। सेवादास्य से ही जीव ईश्वरीय प्रेम अर्जित कर सकता है। ____________________________________________________________

भगवान श्रीचक्रधर जी के दर्षन का फल

दो विधवा मां बेटीं प्रतिदिन भगवान के दर्षन को आतीं और प्रणाम कर चुपचाप वापस चली जातीं। एक दिन उन्होंने स्वप्न में देखा कि एक ब्राह्राण आकर कहने लगा माता जी! मैं पूर्वजन्म में एक धनाढय ब्राह्राण था परन्तु अपने किसी पापकर्म के कारण मुझे बैल योनी की प्राप्ति हुई। अब मैं कुछ समय से एक दलदल में फंसा पड़ा हूँ। आप बड़ी धर्मात्मा हैं, यदि भगवान श्रीचक्रधर जी के एक बार दर्षन करने का फल आप मुझे दें तो मैं इस दुखद योनि से मुक्त हो जाऊँ। इतना कहकर वह ब्राह्राण उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा, किन्तु नींद उचट जाने से वह उत्तर न दे सकीं और उठकर सीधी भगवान के पास आई, एवं स्वप्न की सारी घटना सुनाकर कर्तव्याकर्तव्य पूछने लगीं। भगवान ने कहा तो क्या आपने ब्राह्राण के कथनानुसार उसे फल दिया? जिसके उत्तर में उन्होंने कहा नहीं महाराज! हम तो नींद से उठते ही आपकी सेवा में चली आई हैं, अब आप जैसी आज्ञा करोगे वैसा किया जायेगा। भगवान ने कहा एक दर्षन का फल देकर उसे कृतार्थ करो यही हमारा कहना है। इस पर उन सित्रयों ने कहा भगवन तो क्या हमारा उतना पुण्य कम नहीं हो जायेगा? भगवान ने कहा माता! परमार्थ करते समय ऐसी संकुचित दृशिट नहीं रखनी चाहिये। अपना सर्वस्व गंवा कर भी यदि किसी का भला हो सके तो करना ही मनुश्य का कर्तव्य है। क्या हरिष्चंद्र, दधीचि, षिबि और मोरèवज आदि महापुरुशों की परोपकार के लिये षरीर तक अर्पण कर देने की कथायें आपने नहीं सुनी? आपका तो इसमें कुछ जाता भी नहीं। जिस तरह दीये से दीया लगालो तो पहले दीये का कुछ भी नहीं बिगड़ता, ठीक इसी तरह उसको एक दर्षन का पुण्य देने पर भी आपकी हानि नहीं होती, जाओ! और षीघ्र जाकर उसे दुख मुक्त करो। आज्ञानुसार दोनों मां बेटी स्नान कर तेली के घर गई और हाथ में पानी लेकर बैल के पास खड़ी हो गई। एवं ''यह लो भगवान श्रीचक्रधर जी के एक दफा दर्षन करने का फल ऐसा कहकर पानी उसकेशरीरपर डाल दिया। पानी पड़ते ही बैल ने प्राण छोड़ दिये और परत्र फल भोगने के लिये इस दुखमय संसार से विदा हो गया। यह घटना देखकर वह तेली तथा ग्रामनिवासी बड़े प्रभावित हुए और उस दिन से सब लोग प्रतिदिन भगवान के दर्षन को आने लगे। ____________________________________________________________

परमात्मा की निश्काम भकित

एक दिन महदाइसा ने भगवान से कहा महाराज! पूर्व अवस्था में जब मैं एकादषी, मासोपवास, कृष्चान्द्रायण वगैरा सकाम कर्मोंमें दिन रात लगी रहती थी तब तो लोग मुझे बड़ी अच्छी और धार्मिक कहकर मेरी सराहना किया करते थे और अब जबकि मैंने सब काम्यकर्मोंका त्याग कर दिया है तो लोग तिरस्कार पूर्वक मुझे कुलकलंकिनी तथा भ्रश्टा आदि कहकर मेरा उपहास करने लग गये हैं इसका क्या कारण है ? क्या परमात्मा की निश्काम भकित करने का यही फल हे ? भगवान ने कहा वत्स! सत्यमार्ग के यात्राी को इन मूखो± की टीका-टिप्पणी की तनिक भी परवाह नहीं करनी चाहिए। इन अज्ञानी मनुश्यों की भूल पर हम तुम्हें एक छोटासा दृश्टान्त सुनाते हैं सुनो- एक दिन एक महात्मा किसी किसान के घर रात्री में विश्राम के लिए पधारे। किसान और उसकी पत्नी दोनों ने महात्मा जी का आदर सत्कार किया। प्रसन्न होकर महात्मा जी ने उस किसान से कहा-तुम्हारे घर में जितनी भी लोहे की वस्तुंए हैं वह सब लाकर मेरे पलंग के नीचे रख दो। महात्मा जी के कहे अनुसार उस किसान ने खेती के उपयोग में आने वाले सभी औजार भी वहां रख दिए। रात्री में महात्मा जी ने अपने पारस से सब औजारों को छुआ, उन्हें सोने का बना दिया। हमेषा कि तरह वह किसान सूर्योदय से पूर्व अपने खेत मेे काम करने गया। हल चलाते समय उसके नीचे का हिस्सा जो लोहे का था, सोने का बन जाने के कारण मुड़ गया उसके बाद उसने बाकी औजारों से भी कार्य करना चाहा, परन्तु सभी सोने के बन जाने के कारण, खेती के कार्य हेतु व्यर्थ थे। अन्त में वह परेषान हो वापिस घर लोट आया और सब औजार आंगन में पटक कर अपनी पत्नी से कहने लगा- अरी दुर्भाग्यनी! कल जिस महात्मा को हमने आश्रय दिया उसने हमारे साथ शडयंत्र किया और मेरे सारे औजार बेकार कर दिए, मेरा सोने जैसा दिन बेकार कर दिया। किसान की पत्नी ने आंगन में आकर देखा तब तक सूर्योदय हो चुका था, औजारों को सोने का बना देख वह हर्श से कहने लगी- महात्मा जी ने हमारे साथ शडयंत्र नहीं किया बलिक हमारा भाग्योदय किया है। तुम्हें आनंद मनाना चाहिये, उल्टे मूर्खतावष दुख कर रह हो ? ठीक इसी तरह यह अज्ञान लोग असलीयत को न जान कर तुम्हारा उपहास कर रहे हैं। यर्थाथता का ज्ञान होते ही यह लोग अपनी भूल पर आप लजिजत होंगे। ____________________________________________________________

रामदेव का ईश्ठ महादेव को नमस्कार

एक दिन संध्या के समय भगवान सत्यादेवी के आंगन में खड़े थे, उस समय कुछ महाजन भी स्वामी के दर्षनों को आये थे, सबने तो भगवान को नमस्कार किया, किन्तु रामदेव भगवान के सपीप ही खड़े रहे और उन्होंने नमस्कार नहीं किया, भगवान ने पूछा, 'राक्षसे! इन सब लोगों ने हमें प्रणाम किया है, परंतु तुमने प्रणाम क्यों नहीं किया?

आगे जारी हैँ..