॥ भगवान श्रीचक्रधर स्वामी ॥

भक्त के भगवान - सेवा दास्य से 'ईश्वर प्राप्ति

उन दिनों स्वामी का डोमेग्राम में निवास था। कुछ भक्त उनके निकट बैठे ज्ञानवार्ता श्रवण कर रहे थे, एकाएक स्वामी ने पूछा, 'नागदेव कहा है, वह नहीं दिखायी दे रहा? दादोस समीप बैठे थे, उन्होंने जवाब दिया, 'जब मैं इधर आ रहा था तो वह कुटिया में लेटा था, स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा। स्वामी ने दादोस से कहा कि उसे बुला लायें दादोस गये और नागदेव को साथ ले आये, स्वामी ने देखा, नागदेव कुछ सुस्त-सा है, पूछा, ''क्या, स्वास्थ्य ठीक नहीं है क्या ? हमें तो निधिवासा भेजना था, तुम से कुछ आवश्यक वस्तुएँ मंगवानी थीं, तुम्हारे सिवा उन्हें और कोई ला नहीं सकेगा। नागदेव भीतर-ही-भीतर बेचैनी अनुभव कर रहा था, उसे रह-रहकर लगता, सारा बदन अंगार बनता जा रहा है, पर स्वामी की वाणी सुनते ही जेसे एकदम चेहरे पर चमक आ गयी, मंद स्वर में बोला, 'आपकी कृपा बनी रहे, मेरे स्वास्थ्य को भला क्या होना है ! स्वामी, मैं बिल्कुल ठीक हूँ, चिंता न करें, आज्ञा दें, क्या-क्या लाना है? स्वामी ने एक उड़ती दृषिट नागदेव पर डाली, फिर बाइसा से बोले, 'बाई, नागदेव को भीतर से बीस दाम लाकर दो और जो कुछ लाना है वह भी बता दों कम ज्यादा खर्ची के लिये चाहो तो एक दाम अतिरिक्त दे देना। बाइसा ने तत्काल आज्ञा का पालन किया और वस्तुएँ बताने लगी। इस पर नागदेव थोड़ा संकोच में पड़ गया कि ज्वर के आसार नज़र आ ही रहे हैं, कहीं रास्ते में तेज बुखार चढ़ गया तो इनमें से एक भी वस्तु याद नहीं रहेगी, अपने में ही डूब बुदबुदाया, 'यह सब चीजें याद भी रह पायेंगी? स्वामी उसके असमंजस को भांप गये। बोले 'तुम उसकी चिंता मत करो, हाट में चीजों पर दृषिट पड़ते ही तुम्हें सब स्मरण हो आयेगा। चलते अनुभव हुआ नागदेव को कि सारा बदन झुरझुरा रहा है, लगा, कहीं गिर न पड़े, नमस्कार कर ज्योंही बाहर निकलने को था कि स्वामी की आवाज आयी, 'सुबह से तुमने कुछ खाया नहीं, वापिस लौटते देर हो जायेगी, कुछ खाते जाओ। पर नागदेव ने कुछ भी खाने के प्रति अनिच्छा व्यक्त की। वामन मतिविलस नामक एक किशोर नेवासा में विधाभ्यास करता था, वह इन दिनों स्वामी के पास आया हुआ था। नागदेव को उधर ही जाते देख उसका मन भी चलने को हो आया, जब वह स्वामी से आज्ञा लेने पहुंचा तो उन्होंने बाइसा से कहा, 'बाई, नागदेव निराहार ही चला गया है, वामन के हाथ उसके लिये कुछ खाने को भिजवा दो, यह दे देगा। वामन भोजन-सामग्री लेकर नागदेव की राह चल पड़ा, नागदेव किस तरह स्वयं को संभालता हुआ चला जा रहा था, ज्वार से आंखें खुल नहीं रही थीं, मानों उन पर मनों बोझ आ पड़ा हो, सिर अलग फट रहा था, पर वह थमा नहीं, चलता रहा, जैसे कोई अलौकिक शकित सहारा दिये ले चल रही हो। वह हर कदम के साथ नामस्मरण किये जा रहा था। धूप खूब तेज थी। अत्याधिक पसीना आने लगा। इतना अधिक कि कपड़े तर हो आये, लगा जैसे ज्वर में कमी आ रही है,शरीर खुलना शुरू हो गया। कर्णेश्वर मंदिर के सामने पेड़ की घनी छाया देखकर नागदेव वहाँ जा बैठा, सामने ही एक बावड़ी थी, उसे देख दिल ललचाया कि मुंह हाथ धो लें, पसीने से देह वैसे भी चिपचिपा-सी आयी थी, बावड़ी में उतर हाथ मुंह धोया, शीतल जल के स्पर्श से किचित राहत मिली। अब उसका मन कुछ खाने को हो आया। भूख चमक उठी थी, सोचने लगा- स्वामी ने तो खाने को कहा भी था, मैं ही न माना, क्या करूं अब? अभी इसी उधेड़बुन में था नागदेव को दूर से वामन आता दिखा, वामन ने आते ही ने पोटली बढ़ा दी, 'स्वामी ने भोजन भेजा है। नागदेव हैरान! भोजन भेजा है! मन खुशी से तरंगित हो उठा, स्वामी की मुझ पर इतनी कृपा! कितना èयान रहता है उन्हें मेरा! बाजार पहुंच नागदेव जो वस्तु खरीदता, वामन को पकड़ाता जाता। जब सब सामान खरीद चुका तो अतिरिक्त दिया गया, एक दाम शेष बच रहा, सोचने लगा, इस की कौन-सी वस्तु क्रय करनी शेष रहती है ? पर, बहुत सोचने पर भी कुछ याद न आया। सामान उठाकर वामन कर्णेश्वर मनिदर तक छोड़ गया। उसके बाद नागदेव अकेला डोमेग्राम की ओर चल पड़ा। छह-सात कोस का लंबा फासला! मार्ग पैदल तय करते अंधेरा घिर आया। वापिस लौटते-लौटते रात उतर आयी, इसी से रास्ता सूझ नहीं रहा था, सिर पर सामान का भारी बोझ, तिस पर ज्वरजनित दुर्बलता, उसे बार-बार भ्रम हो जाता कि कहीं भटक तो नहीं गया हूँ, आसपास कोई दिखाई भी तो नहीं दे रहा, जिससे पूछा जा सके। घबराहट में आवाज लगायी-'मुझे डोमेग्राम का रास्ता बताओ! हे प्रभो! शायद मैं भटक गया हूं। उधर स्वामी नागदेव की राह देख रहे थे। आसन पर बैठे अचानक वे व्याकुल हो उठेे, जैसे उन्होंने कोई पुकार सुनी हो, एकाएक वे नाथोबा से बोले, 'हमारा भक्त परेशान है, वह अंधेरे में रास्ता भटक गया है, सहायता के लिये हमें पुकार रहा है। जाओ, छत पर जाकर आवाज लगाओ, वह इससे सही दिशा जान जायेगा। सुना नाथोबा ने तो बगलें झांगने लगा, स्वामी किस के विषय में कह रहे हैं? हमें तो कोई पुकार सुनायी नहीं दी, सकुचाता-सा बोला, 'महाराज, कौन भटक गया है, आप किसे आवाज लगाने के लिये कह रहे हैं? 'बाहर नागदेव भटक रहा है, उसे आवाज लगाओ स्वामी बोले ऊपर जा नाथोबा ने आवाज लगायी, जिसे सुन नागदेव का धैर्य बंधा। वह देगांव की ओर मुड़ रहा था, इस आवाज ने उसे सही दिशा बता दी। स्वामी के निकट पहुंचने नागदेव ने सिर की गठरी एक ओर रखी और प्रणाम कर वहीं बैठ गया। थकान से सांस अवश्य चढ़़ी हुई थी, पर चेहरे की संतुषिट और चित्त का उत्साह यह स्पष्ट बता रहा था कि स्वामी की आज्ञापालन कर आने से वह भीतर-ही-भीतर फूला नहीं समा रहा था। बाइसा ने गठरी खोली, वस्तुएँ निकाल देखीं, तो बहुत खुश हो आयी। स्वामी से बोली, 'नागदेव सब चीजें बढिया और साफ सुथरी लाया है। इस पर स्वामी गर्व मिश्रित प्रसन्न्ता से नागदेव को देखने लगे। धन्य हो आया नागदेव कि उसका श्रम सार्थक हुआ है।

आगे जारी हैँ...