॥ भगवान श्रीगोविँद प्रभु ॥

द्वारिका-दर्शन- एक बार कारणवश आचार्य को देउलवाड़ा जाना पड़ा, लौटते समय से नृसिंह के एक मंदिर के सामने से गुजरे। वहां द्रविड़ देश से आए हुए विद्वान ब्राहम्ण लक्ष्मींद्र भटट कथावाचक, मोहक भाषा में प्रवचन कर उपसिथत समुदाय को भकितभाव में रमा रहा था। चलते-चलते आचार्य के कानों में कथा के यह शब्द पड़े- ''भक्त तो है, परन्तु भगवान नहीं यह बातें सुनकर आचार्य जी ने जोर से कहा- 'तुम यह क्या कह रहे हो? भक्त है भगवान नहीं। अरे भाई, भगवान तो है परन्तु उनके भक्त नहीं। इसपर लक्ष्मींद्र भटट ने कहा- कहाँ है भगवान? तब आचार्य ने कहा- चलो मेरे साथ श्री क्षेत्र ऋद्धपुर, मैं तुम्हें वहां के भगवान के दर्शन करवाता हूँ। आचार्य के शब्दों का कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि लक्ष्मींद्रभटट ने कथा वहीं समाप्त कर दी और ऋद्धपुर ले चलने की प्रार्थना करने लगा। आचार्य चल पड़े, रास्ते में लक्ष्मींद्रभटट ने अपने मन की बात कही, 'मैं तुम्हारे श्रीगोविंद प्रभु महाराज को ईश्वर का अवतार तभी मानूंगा यदि वे मुझे द्वापर युगीन भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी द्वारिका का यथावत प्रत्यक्ष दर्शन करवा देंगे। अब आचार्य चौके! न मालूम श्रीप्रभु उसकी इस प्रार्थना को स्वीकार भी करते हैं या नहीं। यदि न की, तो यह कथावाचक निरर्थक जग हंसाई करेगा। अनर्गल कहता फिरेगा। मन-ही-मन स्मरण करते आचार्य श्रीप्रभु से यह अनुनय करने लगे कि प्रभो! लाज रखना, डोर आपके हाथ में है। ऋद्धपुर पहुंच आचार्य ने श्रीप्रभु को प्रणाम किया और लक्ष्मींद्रभटट से बोले, 'यह है हमारे श्रीप्रभु ! 'पर, विस्मय! लक्ष्मीद्रभटट प्रणाम को अभी झुकना ही चाहता था कि एकदम पीछे हट गया। हाथ वहीं जुड़े-के-जुडे रह गये, नेत्र विस्फारित! अचंभित चेहरे पर एक भाव आता, एक जाता, सामने आनंद कंद भगवान श्रीकृष्ण रत्नजडित सिंहासन पर विराजमान हैं, सेवक-अनुचर यत्र-तत्र सेवा में तल्लीन हैं, राजमहल में सर्वत्र ईश्वरीय आभा छलक रही है। अगले ही क्षण मोहभंग हुआ। पलक झँपकते संपूर्ण दृश्य लोप हो गया। लक्ष्मींद्रभटट सकते में आकर सोचने लगा- प्रभु की यह कैसी माया है! कितनी अपरमपार लीला है, धन्यधन्य होते श्री चरणों में गिर गया, 'प्रभो! आप ही मेरे कृष्ण कन्हैया हैं, में व्यर्थ अब तक तर्कजाल में भटकता रहा, मुझ अपने शरण ले कृतार्थ करो, दयानिधे! ____________________________________________________________

श्री माहिमभटट का अहं मर्दन- एक दिन पण्डित माहिमभटट् ने श्रीप्रभु से 'श्वेतोपहार स्वीकार करने की विनती की, उनकी स्वीकृति पा भटट उमंगपूर्वक प्रबंध में लग गये। वे मन-ही-मन गर्व से प्रफुल्लित थे कि मैं श्रीप्रभु को भोजन करवा रहा हूँ। कितना भाग्यशाली हूँ कि मेरा द्रव्य शुभ कार्य में व्यय हो रहा है। भोजन का समय होने पर माहिमभटट् 'महाद्वार पर खड़े प्रतीक्षा करने लगे, पर, श्रीप्रभु कहीं दिखायी नहीं दे रहे थे। जाने किधर अंतर्धान हो गये। रात उतर आयी, पर उनका कुछ पता नहीं, भटट प्रतीक्षा में आकुल कभी इधर जाते, कभी उधर जाते, भोजन तो किसी ने छुआ तक नहीं, उसे बेकार जाता देख माहिमभटट् को दु:ख हो रहा था। आचार्य ने उनकी दुविधा भांपी, अचानक पूछा, 'क्यों भटट, श्रीप्रभु को भोजन के लिये आमंत्रित करते समय आपके मन में क्या भाव थे? इस अप्रत्याशित प्रश्न से अचकचा ही गये भटट, झिझकते बोले, और तो कुछ नहीं, बस यही सोच धन्य हो रहा था कि मेरा द्रव्य प्रभु निमित्त सुकर्म में व्यय हो रहा है, यह क्या कम सौभाग्य की बात है कि मै ईश्वरीय प्रेम का अधिकारी बन रहा हूँ! उनकी मनोधारणा जान आचार्य चिंतामग्न हो गये, उनहोंने समझाया, 'भटट, इतना ज्ञान अर्जित करने पर भी आपके मन से 'अहं विलीन नहीं हुआ। संपत्ति वैभव का आडंबर और यह अहं की भावना जब तक नहीं त्यागोगे, ईश्वर को पाना संभव नहीं। ईश्वर तो प्रेम का भूखा होता है, वह पदार्थ नहीं, आपके भाव स्वीकारता है, धन संपत्ति के चमत्कार से उसे भला कैसे खुश किया जा सकता है। स्वयं सोचो, अनित्य वस्तु भी कभी 'नित्य के उपार्जन में, परमसुख की प्राप्ति में कारण बन सकी है? फिर यह क्यों नहीं समझते कि ईश्वर से कुछ भी छिपा नहीं रहता। जाओ, श्रीप्रभु को ढूंढो और उनके श्री चरणों में गिर प्रायशिचत करो। वे आत्र्तदानी हैं, अवश्य क्षमादान दें, आपका भोजन स्वीकार करेंगे? पश्चात्ताप-भाव से आद्र्र हो भटट श्रीप्रभु की खोज में चल निकले अहं की भावना अब उनके मन से धुल चुकी थी। ____________________________________________________________