॥ भगवान श्रीगोविँद प्रभु ॥

भगवान श्री गोविँद प्रभु

श्री गोविँद प्रभु जीवों के कल्याणार्थ महाराष्ट्र में रिद्वपुर के निकट काटसुरा ग्राम में ब्राह्राण अनन्त नायक और माता-नेमाइसा के पुत्र रूप में अवतरित हुए। एक वर्ष की अल्पायु में प्रभु के माता-पिता परलोक सिधार गये, उसके उपरान्त उनका पालन-पोषण मामा और मासी ने किया। सात वर्ष की आयु में भगवान को रिद्वपुर में वेदों का अध्ययन करने के लिए पाठशाला भेजा गया। बाल्यकाल से ही उनकी लीलाएं अदभुत और अलौकिक थी। अदभुत बुद्धि धारण करने के कारण अल्प समय में सारी विधाएं स्वीकार की। बारह वर्ष की आयु में भगवान श्री गोविँद प्रभु द्वारका (गुजरात) में गए। जब भगवान गोमती नदी के तट पर ध्यानस्थ थे तब भगवान श्री चांगदेव राउळ वहां आये। श्रीगोविँद प्रभु ने उनको गुरु धारण कर उनसे ज्ञान शकित स्वीकार की। वहां से श्रीगोविँद प्रभु रिद्वपुर की ओर प्रस्थान कर गये। भगवान श्रीगोविँद प्रभु का शरीर और उनके वस्त्र परिधान आकर्षक नहीं थे। विदेही अवस्था के कारण भगवान वस्त्रों की ओर ध्यन नहीं देते थे। रिद्वपुर के सभी निवासियों की भगवान में अटूट श्रद्धा थी। उस काल में जाति व्यवस्था अपनी चरम सीमा पर थी। परन्तु भगवान के लिए सभी जीव समान हैं। उनके लिए कोई जीव छोटा या बड़ा अपने कर्मोंसे होता है। वह जाति व्यवस्था को नहीं मानते थे। बिना रोक-टोक अछूतों तथा ब्राह्राणों आदि सभी वर्गो के घर में आया-जाया करते थे। भगवान प्रतिदिन 60 योग्य जीवों की मूळ अविद्या दूर कर उन्हें इस नश्वर संसार के आवागमन के चक्र से मुक्त करते थे। श्रीप्रभु के पवित्र तीर्थ स्थान विदर्भ प्रान्त में आज भी विद्यमान हैं। ____________________________________________________________

भगवान श्रीगोविँद प्रभु की लिलायेँ