॥ भगवान श्रीचक्रपाणी प्रभु ॥

भगवान श्रीचक्रपाणी प्रभु

श्री चक्रपाणि पुना के पास फलटन में ब्राह्राण जनक नायक तथा माता जानकी देवी के पुत्र रूप में अवतरित हुए। बाल्यकाल में उनका विवाह कमला देवी से कर दिया गया। वयस्क हो जाने पर पिता जनक नायक बहू को घर ले आये, परन्तु भगवान हमेशा विरक्त रहते थे। माता-पिता के परलोक पश्चात कार्तिक मास में श्री चक्रपाणि अपनी पत्नी को निशिचन्त कर द्वारका की यात्रा पर चल पड़े। एक दिन यात्रियों के साथ वह सह्याद्री पर्वत के निकट मेरुवाला तालाब पर ठहरे। दूसरे दिन सब भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु के पवित्र तीर्थ स्थानों को नमस्कार करने गये तो व्याघ्र वेश में भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु दहाड़ते हुए प्रकट हुए, अन्य सब यात्री भयवश भाग गये। व्याघ्र ने अपना पंजा श्री चक्रपाणि जी के मस्तक पर रखा और इस प्रकार श्री चक्रपाणि ने श्री दत्तात्रेय प्रभु से ज्ञान शकित स्वीकार की। नव मास उपरान्त भगवान श्री चक्रपाणी प्रभु सह्याद्री का निवास त्याग द्वारका चले गये। द्वारका में भगवान ने अनेक अदभुत चमत्कारी लीलाओं से जीवों का कल्याण किया। शके 1143, वृषभ संवत्सर, भाद्रपद शुक्ल द्वितीया शुक्रवार (तारीख 20.09.1221) कामख्या देवी के हठ के कारण अपना मायापुर त्याग कर अपना अवतार कार्य समाप्त किया। ____________________________________________________________ व्याघ्र वेशधारी भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु जी से ज्ञानशकित स्वीकार करना:- कातिक मास में जन समूह माहौर जाने के लिए प्रवृत्त हुआ तो श्रीचक्रपाणी महाराज भी उसके साथ हो लिए। क्रम-क्रम से सभी लोग माहौर पहुंचे। सभी ने वहां स्नान किया। स्नान के पश्चात सभी लोग घाट पर जाने लगे तो भगवान भी उनके साथ चल पड़े। सर्वतीर्थ में सभी के साथ पुन: स्नान किया। श्री चक्रपाणी प्रभु के केश गीले होने के कारण खुले थे। गले में धोती का पल्ला तथा कंधे पर कम्बल था। देवगिरी की ओर जाता हुआ आधा जनसमूह आपके आगे था और आधा पीछे, बीच में आप चल रहे थे। ऐसे समय झाड़ी में से व्याघ्र वेशधारण किये भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु वहाँ प्रकट हो गये और उन्होंने द्वारावतीकार श्री चक्रपाणि महाराज के सिर पर अपना दाहिना श्री चरण रखा। व्याघ्र वेशधारी श्रीदत्तात्रेय प्रभु ने आपके मुख से मुख लगाकर ज्ञानशकित का संचार किया। उनसे आपने उभय शकित स्वीकार की और पर शकित अच्छादित कर अवरशकित प्रकट की। दोनों अवतारों की इस अदभुत लीला को उपसिथत जनसमूह ने देखा। डरके मारे शेर-शेर चिल्लाता हुआ पीछे का जनसमूह पीछे और आगे का जनसमूह आगे भाग खड़ा हुआ। दोनों अवतारों की कुछ क्षणों तक ऐसे ही भेंट रही, पश्चात भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु अदृश्य हो गये। द्वारावती का जनसमूह जब तक वापिस नहीं लौटा तब तक आप वहीं रहे। ग्राम में निवास करना, मेरुवाला तालाब पर स्नान तथा देव-देवेश्वरी निद्रा करना, यह आपका दैनिक कार्यक्रम था। इस प्रकार आप नवमास तक वहां रहे और उसके बाद वहां से द्वारावती प्रस्थान कर गए। ____________________________________________________________ कामख्या के निमित्त देह त्यागना- काउली नामक ग्राम में एक हठयोगिनी रहा करती थी। जिसका नाम था कामाख्या। उसने अनेक सिद्ध साधक पुरुषों को अपने सौंदर्य तथा हाव भाव से मोहित कर तप से परावृत्त किया था। श्री चक्रपाणि महाराज के सामर्थ की प्रसिद्धी सुन, वह वहां भी आ पहुंची, अपने रूप तथा हाव-भाव से महाराज को भी आकर्षित करना चाहा । श्री चक्रपाणि महाराज की ब्रह्राचर्य की प्रवृत्ती थी अत वह उसके चंगुल में नहीं फंसे। गुफा के अन्दर महाराज विराजमान थे, वह अन्दर प्रवेश करना चाहती थी, किन्तु महाराज के द्वारा भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु की डाली गई शपथ के कारण वह भीतर प्रवेश न कर सकी। उसने अनेक प्रकार की स्तुति, प्रार्थना तथा हाव-भाव से महाराज को आकर्षित करना चाहा, किन्तु सब व्यर्थ। भगवान श्रीचक्रपाणी प्रभु जरा भी उससे विचलित नहीं हुए। लगातार सात दिन इसी प्रकार वह द्वार पर बैठी रही। अन्त में सातवें दिन श्री चक्रपाणी महाराज ने योग सामथ्र्य से अपना मायापुर त्याग दिया। सातवें दिन अन्दर प्रवेश कर उसने देखा तो श्री चक्रपाणि महाराज शरीर छोड़ चुके थे। महाराज की प्रशंसा करते हुए उसने कहा, अनेकों साधक पुरुषों को मैंने अपने वश में कर लिया था किन्तु यह पुरुष सामथ्र्यवान थे इसलिए शरीर त्यागकर चले गये। भगवान श्री चक्रपाणी महाराज ने कामाख्या-निमित्त पुर त्याग शके 1143 वृषभ संवत्सर, भाद्रपद शुक्ल द्वितीया शुक्रवार (ता. 20.8.1221) को किया। इस प्रकार जीवों के भाग्यों के अनुसार भगवान श्री चक्रपाणी महाराज ने अनेकों जीवों को विधा तथा अनंतों को ईश्वरीय मार्ग प्रदान कर मायापुर का त्याग किया। ____________________________________________________________