॥ भगवान श्रीचक्रपाणी प्रभु ॥

॥ भगवान श्रीचक्रपाणी प्रभु ॥

सांड को जीवित करना- गांव का एक सांड प्रति दिन मंदिरकी पिंडी पर से पानफूल फल खा जाया करता। एक दिन जब वह पान, फूल, फल खाकर बाहर निकलने लगा तो बीच द्वार के गिर कर वहीं मर गया। बीच द्वार पर वह पड़ा होने के कारण लोग लिंग पर पत्रपुष्प चढ़ा नहीं पा रहे थे। सभी ने बहुत प्रयत्न किया किन्तु वे सांड को वहां से हिला न सके। उस समय गंगा तट पर चक्रपाणी भगवान विद्यमान थे। पुजारी तथा महाजनों ने मिलकर चक्रपाणी भगवान से प्रार्थना की, भगवन! सांड की बीच द्वार में ही मृत्यु हो गई है। मार्ग अवरुद्ध हो जाने के कारण लोग लिंग पर पत्र-पुष्प चढ़ने आ जा नहीं सकते हैं । उनकी खातिर प्रार्थना सुन दयालु भगवान वहां जा पहुंचे। मृत सांड पर भगवान ने दो चार कंकड़ पत्थर फेंके। पत्थरों की पड़ने की देरी थी कि सांड झट वहां से उठ खड़ा हो गया और आंगन में आकर गिर पड़ा। इस अविश्वसनीय घटना को देख सभी आश्चर्य चकित हो भगवान के गुणानुवाद गाने लगे। ____________________________________________________________

पांच सौ पात्रों के भोजन का श्रेय देना- एक ब्राह्राण अपनी पत्नी सहित जनसमूह के साथ सहस्त्र ब्राह्राणों को भोजन कराने के लिए द्वारिका को चल पड़ा। मार्ग में सभी को चोर-डाकुओं ने घेर कर लूट लिया। वहां से वे द्वारिका की ओर चल पड़े रात को वे एक ग्राम में सोये थे कि स्वप्न में, ग्राम, अधिष्ठात्री देवता ने आकर कहा, 'यहां एक ईश्वरीय पुरुष रहते हैं, उन्हें तुम भोजन कराओ। उनसे तुम्हें सहस्त्र भोजन का फल यहीं प्राप्त हो जायेगा। प्रात: उठकर ब्राह्राण ने श्री चक्रपाणी महाराज को भोजनार्थ आमंत्रित किया। पत्नी ने भोजन बनाया। ब्राह्राण ने श्री चक्रपाणी महाराज के पास जा प्रणाम कर, भोजन के लिए चलने की प्रार्थना की। श्रीचक्रपाणी महाराज उसकी प्रार्थना स्वीकार कर उसके साथ हो लिए। घर पहुंचने पर महाराज की सीधी-सादी वेशभूषा देख ब्राह्राणी ने ब्राह्राण से कहा, 'क्या सारे गांव में तुम्हें यही एक साधु मिला, और कोई नहीं था। ब्राह्राण ने पत्नी की बातों की ओर ध्यान न दे चक्रपाणी महाराज के गरम जल से चरण धोये। आसन पर विराजमान कर सामने भोजन के लिये पत्रावली रख भोजन परोसा और महाराज से भोजन की प्रार्थना की। वह रोटी परोसता तो चक्रपाणी भगवान दाल खाते, वह दाल परोसता तो वे चावल खाते, वह चावल परोसता तो वे भाजी खाते, सर्व-सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक भोजन करते देख, उस ब्राहम्णी के मन में विपरित भावना आयी और वह सोचने लगी अगर यह अकेला ही दस-पंद्रह व्यकितयों का भोजन कर चुका है फिर भी और परोसने के लिए मना नही करता अगर ऐसा ही चलता रहा तो हो गया हमारा सहस्त्र भोजन। उसी समय चक्रपाणी भगवान विपरीत भोजन कर अपने स्थान पर लौट आये। स्वामी के प्रयाण पश्चात जब ब्राह्राण ने पत्रावली उठाई तो वह पांच सौ ही निकली। पत्नी पर कुपित हो ब्राह्राण ने पत्नी सेे कहा, अरी पापिन! यदि तुम उन पर श्रद्धा रखती तो मेरा सहस्त्र भोजन यहीं परिपूर्ण होता। तुम्हारी विपरीत कल्पना से मैं पांच सौ पात्रों के भोजन के पुण्य से वंचित रहा।

चांपेल स्वीकार- एक दिन एक व्यापारी देव-प्रतिमा के लिए दो घड़े भरकर चांपेल (चंपा के फूलों का इत्र) ले आया। चक्रपाणी महाराज ने मंदिर में पहुंच दोनों घड़े उठाकर अपने सिर पर उडेल लिए और वहीं एक ओर आसन लगाकर बैठ गये। उसी समय मंदिर का पुजारी वहां आ पहुंचा। उसने चांपेल के विषय में भगवान से पूछा तो चक्रपाणी भगवान ने अपनी नाभी पर अंगुली रख दी। देखते ही देखते तत्काल नाभी से चांपेल की धार लगातार बरसने लग पड़ी और दोनों घड़े पुन: भर गये। यह देख पुजारी तथा सभी लोग आश्चर्य चकित हो भगवान का गुणानुवाद करने लगे। ____________________________________________________________

श्राद्ध के दिन खीर स्वीकार- एक दिन किसी व्यकित के घर श्राद्ध था। ब्राह्राणों से पहले ही चक्रपाणी महाराज यहां आकर खीर खा जायेंगे, वह सोच गृहस्वामी ने खीर को एक ओर छिपाकर रख दिया और दरवाजा बंद कर सांकल लगा दी। चक्रपाणी भगवान ने उसके मन की बात जान ली और उत्पवन कर उसके घर में घुस गये। खीर खाकर बर्तनों को ढककर रख दिया। प्रभु लीला से वे बर्तन सोने के हो गये। गृहस्वामी ने जब वहां देखा तो हैरान हो गया। उसने यह जान लिया कि अवश्य ही भगवान यहां आये थे, क्योंकि उनके बिना ऐसा अदभुत कार्य कोई नहीं कर सकता। ____________________________________________________________

सारंगधर-तीर्थ में लगी आग सारंगधर-तीर्थ का पुजारी सारंगधर तीर्थ की आरती उतार रहा था, तीर्थ की छत (चाँदोवा) आग की लपटों से जल उठी। श्री चक्रपाणी महाराज जी के सानिध्य में गांव के प्रतिषिठत महाजन बैठे थे। एकदम भगवान ने उठकर हंसते हुए ताली बजाई। ताली बजाते ही चक्रपाणी महाराज के हाथ काले हो गये। यह देख उपसिथत महाजनों ने पूछा, 'भगवन! आपने यह क्या किया? आपके हाथ काले कैसे हो गये? प्रत्युत्तर में महाराज ने कहा, भक्तगतण! सारंगधर-तीर्थ का पुजारी सारंगधरतीर्थ की आरती उतार रहा था, उसी समय तम्बू की छत आग की लपटों से जल उठी। उसे हमने ऐसा करके बुझा दिया है। महाजनों ने यह सत्य है या नहीं, इसकी जांच करवाने के लिए दिन तथा वही मास लिखकर सारंगधर-तीर्थ भेजा। वहां से उत्तर आया कि उस दिन भगवान यहीं पर थे। तीर्थ की छत को आग लगी और भगवान ने उसे बुझाया। यह सुन सभी को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। ____________________________________________________________ भगवान श्रीचक्रपाणी प्रभु के बारेँ अधिक जाने...