॥ भगवान श्रीचक्रपाणी प्रभु ॥

"चक्रपाणी उर्फ चांगदेव राऊळ का जन्म" ______________________________ शके 1050 (इ.स. 1128) मेँ सातारा जिले के फलटण इस गाव के जनक नायक पिता जनकाईसा माता दांपत्य की संतान, तापी नदी के पुर्व संगम मेँ बसे कराडे ब्राम्हण के घर चांगदेव के नवस का तथा चाकण के चक्रपाणी देवता के नवस का, चांगदेव उर्फ चक्रपाणी नाम से एक बालक का जन्म हुआ। वर्ण से ब्राम्हण रहने के कारण वेद तथा उपनिषदोँका अभ्यास सुलभ था, तभी से ब्रम्हचर्या की प्रवृत्ती और दुसरोँ को भी शास्त्र बताने का कार्य शुरु था। उमर के 27 वे साल (इ.स.1155) मेँ इच्छा नहीँ रहने पर भी माता पिता के आग्रह पर चाकण के मामा कमलनायक की पुत्री से विवाह हो गया। लेकीन रोज का नित्यक्रम निच्शित रहने के कारण उसी प्रकार रहने लगे, पत्नी को उसके पिता के घर भेज दिया, और खुद सुबह स्नान संध्या के बाद माता के हाथ से दुध पीना और गांव मेँ भ्रमण करना, वेधशाला चलाना, बानगंगा नदी के खडकपर बैठकर ध्यान करणा, उसके बाद पाखपाने मढ के मुर्तीपुजा करना, और वहा के दो खांब के मध्य मेँ बैठ कर शास्त्र निरोपण करना लोँगोँ के मनोरथ पुर्ण करना ऐसा उनका दररोज का नित्यक्रम चालू ही था की उनकी माता का निधन हो गया, पिता जनकनायक को दुख हुआ, पिता ने बहु को घर लाने का आग्रह किया लेकीन चक्रपाणी अवतार ने नाईलाज से हां कर दी, पत्नी फिर से घर आ गयी लेकीन श्रीचक्रपाणी अवतार ने ब्रह्मचर्य प्रवृत्ती का भंग नहीँ किया, थोडे दिनो बाद जनकनायक का भी निधन हो गया, अंतक्रिया होने बाद एक साल तक पत्नी के साथ रहे लेकिन पत्नी से उदासीन प्रवृत्ती रहने के कारण गृहस्थाश्रम का त्याग करना आवश्यक लगा। ऐसी स्थिती मेँ माहुर की यात्रा आ गयी, और यात्रा निमत्त जाने का आग्रह करने लगे, लेकिन पत्नी ने साथ आने का आग्रह कीया, गाव के बाहर सिमा के द्वार तक आने के बाद पत्नी को समझाने लगे, और उसके आखोँ मेँ देखकर उस "स्थिती" दे दी, उससे वो घर आ गयी लेकीन "स्थिती" के कारण श्रीचक्रपाणी उसे हमेशा उसके पास है ऐसाही लगता था।

ज्ञान शक्ती स्वीकार - ______________________________

इधर श्रीचक्रपाणी माहुर को आ गये, शके 1080 (इ.स.1158) उमर के 30 वे वर्ष माहुर मेँ श्री दत्तात्रेय प्रभु से मिलने के लिये, क्योकी भगवान को अवतार शक्ती स्वीकार कार्य करना था। लोग माहुर के गड (शिखर) पर चढणे लगे, श्री चक्रपाणी भी यात्रीओँ के पीछे अंतर रखकर चढ रहे थे, तभी अचानक एक जाली मेँ से श्रीदत्तात्रेय प्रभु बाघ के रुप मेँ आरोगना करके आ गये, यात्रीगण इधर उधर भागने लगे पर श्रीचक्रपाणी महाराज वही एक खडक पर बैँठ गये, और श्रीचक्रपाणी अवतार ने श्री दत्तात्रेय प्रभु के (बाघ) सामने बैठ कर नमस्कार कीया, तभी बाघने ( श्रीदत्तात्रेय प्रभु ) श्रीचक्रपाणी प्रभु के सर पर पंजा रखकर उभय शक्ती प्रदान की,

श्रीचक्रपाणी राऊळ ने ज्ञान शक्ती का स्वीकार किया उसमेँ "पराशक्ती" के आच्छादन करके अवर शक्ती के कार्य सुरु कीये,

कामाख्या निमित्त देहत्याग - ______________________________

शके 1143 (1221) वृषभ संवस्तर, भाद्रपद शुध्द द्वितीया शुक्रवार 26-08-1221 इस दिन दोपहर 12 बजे श्रीचक्रपाणी अवतार ने कामाख्या को निमित्त करके अपने अवतार कार्य समाप्त करके प्रयाण किया और हरिपाल के मृत शरीर मेँ प्रवेश किया और आगे चल के इनका नाम श्री चक्रधर स्वामी हो गया, याने 93 साल तक चक्रपाणी उर्फ चांगदेव राऊळ नामसे अवतार कार्य रहा। तस्वीर मेँ द्वारावती की वहीँ पाताल गुफा है जहा श्री चक्रपाणी महाराज ने देहत्याग कीया था। यहा पर प्राचिन गुफा के अवशेष हैँ और मंदीर पुजारी रोहीतभाई वायडा ने यहां पर बहोत जीर्नोउध्धार कीया है.

इस स्थान का पता कुछ इस तरह है

गुजरात की राजधानी गांधीनगर से लगभग 481 KM दुर और सुरत से 693 KM दुरी पर स्तिथ द्वारका चार धामो मेँ सेँ एक,

श्रीचक्रनारायण मंदीर, रनछोड धर्मशाला के पास, समुन्द्र के किनारे के पास, गोमती द्वारका 361335 (गुजरात सौराष्ट्र)

रोहीत वायडा 9924772591

भगवान श्रीचक्रपाणी प्रभु की लिलायें