॥ भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु ॥

वरदान अभिशाप बन गया -

कार्तवीर्य नाम का एक महाप्रतापी राजा था। महिष्मती उसकी राजधानी थी। पूर्वार्जित अशुभ कामो के फलस्वरूप उसे कुष्ठरोग हो गया, जिससे उसके दोनों हाथों की उगलियाँ गलकर गिर गयीं। इसी रोग के कारण उसे राज्य का उत्तराधिकार न प्राप्त हो सका। क्योंकि उसके लिये पुरुषत्व के गुणों से सम्पन्न होना जरूरी था। अत: वह सदा संतप्त रहने लगा। रोग निवृत्ति का उपाय करने के लिए वह कई आश्रमों में घूमकर अन्त में भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु जी के आश्रम में आया। अपने हाथों की प्राप्ति का उपयुक्त स्थान देखकर वह वही भगवान की सेवा में लिप्त रहने लगा। कार्तवीर्य प्रतिदिन भगवान की जटाएं सुगनिधत करने के लिए धूप दिखाता। ऐसे ही एक दिन जटाओं को सुखाने के लिये वह पात्र ढूंढ रहा था, लेकिन ढूंढने के पश्चात भी उसे कहीं धूपारती नहीं मिली। अत: उसने हाथ पर ही प्रखर अगिन रखकर धूप देना आरंभ किया। हाथ जल जाने पर चारों ओर दुर्गन्ध फैल गयी, किन्तु कार्तवीर्य टस का मस नहीं हुआ। भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु जी ने कहा- 'राजन ! यह दुर्गन्ध कहां से आ रही है। सहसा वह अभी तक हाथों पर आग रखे हुए था। ज्यों ही उसने प्रभु की ओर हाथ हाथ बढ़ाकर दुर्गनिध का कारण दिखाया तब भगवान ने कहा- 'अरे! यह क्या? तुमने अपने हाथ जला लिये। मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूँ। बोलो क्या चाहते हो ? कार्तवीर्य ने अपने दोनों हाथ भगवान की ओर बढ़ाकर कहा- 'भगवन ! आपसे क्या छिपा है। आप तो अन्तर्यामी हैं। भगवान ने कहा- 'जाओ ! सहत्र भुजाएं प्राप्त करोगे , अतुल बली होगे। चक्रवर्ती राजा बनकर याचकों के मनोरथ पूर्ण करोगे। जब तक तुम गौ, ब्राह्राण, स्त्री और बाल हतय़ा नहीं करोगे, तब तक तुम्हारी पराजय कभी नहीं होगी। वर प्राप्ति के पश्चात वह सहस्रार्जुन नाम से विख्यात राजा हुआ और सुख पूर्वक राज-वैभव का उपभोग करने लगा। लेकिन भाग्य की गति कुछ और ही होती है। एक दिन सम्राट सहस्रार्जुन शिकार खेलते हुए महर्षि जमदाग्नी के आश्रम में जा पहुँचा। महर्षि द्वारा भोजन आदि सत्कार को पाकर राजा ने पूछा- 'महर्षे! आश्रम में कहीं धुएं का नाम तक नहीं, फिर इस निर्जन वन में आप इतनी उत्तम भोजन सामग्री कैसे बना पाये? महर्षि ने कहा- 'राजन! देवराज इन्द्र ने हमें सुरभि नामक कामधेनु गाय दे रखी है, जो इच्छित भोजन प्रदान करती है। राजा ने का- 'वह कामधेनु आप मुझे देँ दें वह मेरे बड़े काम की वस्तु है। आप केवल दो प्राणी हैं लेकिन मेरी बहुत बड़ी प्रजा है। महर्षि ने कहा- 'राजन! सुरभि तो देवता हैं वह आपके यहाँ नहीं जायेगी। यदि शक्ति रखते हो तो ले जाओ। मेरी इच्छा तो नहीं। सहस्रार्जुन को लोभ ने घेर लिया था। उसने सेना को आदेश दिया- 'सुरभि को ले चलो। अविवेक सभी दु:खों का कारण होता है और अविवेकी राजा देवता शक्ति से अनभिज्ञ था। गाय पर बल प्रयोग चल न सकां और उसके मलमूत्र से असंख्य योध्दा उत्पन्न हुए और राजा की सेना को रक्त रंजित करने लगे , क्रोधवश राजा नें गाय पर तीर से प्रहार किया , गर्भवती होने के कारण वह और उसके शिशु दोंनों की हत्य़ा हुई महाऋषी जमदाग्नी के प्रतिकार स्वरूप उन पर भी राजा ने तीर से प्रहार किया परन्तु सती रेणुका पति की रक्षा के लिए दौड़ पड़ी, किन्तु क्रोधपूर्वक छोड़े गये तीर दोनों को बींध गये और वे दोनों तत्काल धाराशायी हो गये। राजा चला गया। क्षतविक्षत रेणुका ने अपने पुत्र परशुराम का स्मरण किया। वह महादेव के पास विद्या अध्ययन कर रहा था। महादेव ने कहा- 'वीरवर! आपको माता बुला रही हैं। आश्रम में आकर परशुराम ने जो दृश्य देखा उससे वह स्तब्ध रह गया। सती रेणुका ने कहा- 'पुत्र! आपके पिता परलोक सिधार गये हैं। मैं भी उसी मार्ग पर हूँ। केवल तुम्हारी प्रतीक्षा थी। सैह्याद्री पर ले जाकर भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु जी के आचार्यत्व में विधिपूर्वक संस्कार सम्पन्न कर दो। परशुराम ने कहा- 'माता! मैं भगवान को कैसे पहचानूँगा ? माता ने कहा- 'जिस पुरुष का साक्षात्कार होने पर तुम्हारी बहंगी की लकड़ी में हरी-हरी पत्तियाँ उग आंऐगी, उसे ही भगवान समझना। इतना कहकर रेणुका ने प्राण त्याग दिये। परशुराम अपने पितरों के शरीर सैंह्याद्री पर ले गया। वहाँ शिकारी के रूप में भगवान ने उन्हें दर्शन दिये। उसने देखा कि बहंगी में हरी पत्तियां फूट पड़ी हैं। तुरंत उसने बहंगी को कंधे से उतार दिया और प्रणाम करने के लिये शिकारी के चरणों में झुक गया। शिकारी ने कहा- 'अरेरे! ब्राह्राण होकर यह क्या कर रहे हो ? मैं हिंस्र हूँ। तुम मुझ अपवित्रा के चरण कैसे छूने लगे हो ? परशुराम ने कहा- 'भगवान! माता के कहने के अनुसार मैंने आपके इस रूप में भी पहचान लिया है। कृपया आप मेरी माता की अनितम अभिलाषा पूर्ण करें। भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु ने परशुराम की प्रार्थना पर उसके माता-पिता का संस्कार विधिवत कोरी भूमी में सम्पन्न करवाया। इस कार्य की पूर्ति के लिये भगवान ने परशुराम को सर्वतीर्थ का जल लाने को कहा। उसने बान द्वारा पानी निकालकर उसमें चरण प्रक्षालन के लिये भगवान से प्रार्थना की और कहा- 'प्रभो! इन चरणों में सभी तीर्थ विधमान है। भगवान ने अपने श्रीचरणों में उस पानी को पवित्र कर दिया। वह सर्व तीर्थ नामक तालाब आज भी माहुर में विधमान है।

तथा श्रीदत्तात्रेय प्रभु ने यदुराज को उध्दव गिता का अमुल्य ज्ञान देकर अनंत जिवोँ उद्दार आज भी चालु हैँ। अगर आप माहुर जिला नांदेड महाराष्ट्र मेँ जाकर उसी तालाब मेँ जाकर तपश्चर्या करते हैँ, तो भगवान आपको जरुर दर्शन देंगे । ____________________________________________________________