॥ भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु ॥

राजा अलर्क से भेंट-

महर्षि ऋचिक दम्पत्ति को दो संतानें हुई। महर्षि जमदाअग्नी तथा सती मदालसा। सती का विवाह अचलपुर के राजा के साथ हुआ था। वह भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु की परम भक्तिनी थीं। उसे सात पुत्र हुए थे, जिनमें अलर्क सबसे छोटा था। एक दिन सती ने अपने सभी पुत्रों को संसार की अनित्यता तथा अनेक दोष दिखाकर भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु की शरण में जाकर 'अनुसरण ग्रहण करने को कहा। सभी पुत्र माता के आज्ञाकारी थे। अत: उन्होंने स्वीकृति दे दी। किन्तु अलर्क न माना। माता अलर्क को छोड़ दूसरे पुत्रों को साथ ले सैहाद्री पर्वत पर भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु की शरण में जाकर धर्माचरण में लीन हो गयी। किन्तु दैवि विचित्रा गति: इस कहावत के अनुसार एक बार काशीराज ने अपनी विशाल सेना लेकर अलर्क पर आक्रमण कर दिया। भाग्य विपरीत होने के कारण राजा अलर्क पराजित हो भागता हुआ वन में जा छिपा। आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मीक इन तापों से तप्त राजा अलर्क अनेक ऋषिमुनियों के आश्रमों में रहा, लेकिन कहीं भी उसे शान्ति प्राप्त नहीं हुई। अन्त में वह भटकता हुआ सैहाद्री पर्वतपर जा पहुंचा। उसी समय भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु ने संतप्त राजा को शिकारी के भेस में दर्शन दिया। दु:खाक्रान्त राजा ने शिकारी को पहचानने का प्रयत्न तक न किया। अन्त में शिकारी ने कहा- 'राजन! सावधान, दूर हटो। इन शब्दों को सुनते ही अलर्क के तीनों ताप शान्त हुए और भगवान की शरण मेँ गयेँ । ____________________________________________________________ महर्षि ऋचिक को अश्व प्रदान - त्रेता युगमें ऋचिक ऋषि नाम के एक अत्यन्त तेजस्वी मुनि थे जिन्होंने अपनी सम्पूर्ण आयु तपस्या में बितायी थी। एक दिन वह ध्यानस्थ बैठे थे इतने में आकाशवाणी हुई कि 'महर्षे! तुम विवाह कर लो। महर्षि के सामने एक समस्या खड़ी हो गयी, सोचा 'में बूढ़ा, भला इस उम्र में मुझसे कौन शादी करेगा। एक दिन सोच-विचार कर महर्षि काशी राजा के पास गये और बोले 'राजन ! आप अपनी कन्या सत्यवती का विवाह मुझसे करा दें महर्षि के बोल सुनकर राजा कांप उठा। मन में सोचने लगा कि इस बुजुर्ग को कन्या कैसे दे दूं। इसकी बात अस्वीकार करने पर यह शाप दे देगा। अन्त में सोच-विचार कर राजा ने कहा- 'महर्षे! आप विराजें। मैं अपनी स्त्री से विमर्श कर आता हूँ। महर्षि बैठ गये। रानी ने कहा- 'घबराते क्यों हो ? उससे कुछ ऐसा शुल्क मांगों जो वह दे न सके। राजा ने बाहर आकर महर्षि से कहा- 'महिर्ष ! हमें आपका प्रस्ताव मंजूर है। लेकिन हमारी कुल-परंपरा के अनुसार हम आपसे कुछ शुल्क लेंगे। यदि आप शुल्क दे सकेंगे तो विवाह हो जाएगा। महर्षि ने कहा- 'राजन! शुल्क क्या देना होगा ? राजा ने कहा- 'पाँच सौ घोड़े जिनका शरीर सफेद हो और एक कान काला। सभी एक से हों। महर्षि ने कहा 'स्वीकार है। ऋचिक ऋषि ने सोचा- मेरा यह संकल्प भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु के अतिरिक्त कहीं भी पूरा नहीं हो सकता। अत: वह सीधे सैह्याद्री पर्वत पर जाकर तपस्या करने लगे। कई दिनों तक तपस्या करने के पश्चात भगवान ने दर्शन देकर वर मांगने के लिये कहा। महर्षि ने अपना पूण-वृत्तान्त सुनाकर भगवान से पाँच सौ शामकर्ण (घोड़े) दिलाने की प्रार्थना की। भगवान ने कहा- 'तुम्हारे श्यामकर्ण मिल जाएंगे। घोड़े तुम्हारे पीछे-पीछे चले आएंगे। अश्वसहित ऋषि को आया देख काशीराज आश्चर्यचकित रह गया। महर्षि ने कहा- 'राजन! शुल्क रूप में घोड़े ले लें और अविलम्ब अपनी कन्या का विवाह मुझ से कर दें। राजा वचनबद्ध था। अत: उसने अपनी कन्या का विवाह ऋषि के साथ कर दिया।

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