॥ भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु ॥

॥ भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु ॥

सैहाद्री पर्वत पर आगमन-

महान तपस्वी महर्षि 'देवल का आश्रम सैहाद्री पर्वत पर था। उसने अपनी शक्ति को परखने के लिये शिव लिंग बनाना आरंभ किया। जब लिंग ऊंचाई पार करते हुए स्वर्ग तक जा भिड़ा तो देवता और महिर्ष भयभीत हो उठे। उन्होंने देवल से प्रार्थना की कि 'आप यह अलौकिक कार्य बंद कर दें। लेकिन देवल नहीं माना। वे लोग देवल के अभियान से सतप्त होकर बद्रिकाश्रम में श्रीदत्तात्रेय प्रभु के पास जा पहुंचे। सब घटना सुनाकर उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि 'महाराज! आप तो जानते हैं कि , देवल कितने अभिमानी हैंं। आपका अवतार जीवों के कल्याण के लिये हैं। क्या आप देवल पर प्रतिबंध नहीं लगाएंगे। इससे तो सृषिट की मर्यादा भंग हो जाएगी। उस अभिमानी का अभिमान मिटाने की क्षमता केवल आप में हैं। कृपया आप कुछ कीजिए। दयालु भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उनके साथ सैह्याद्री के लिये चल पड़े। अभिमान से अन्धे हुए देवल सैहाद्री के लिए चल पड़े और कृष्णावलि ( काले आँवले के पेड़ ) के नीचे देवलऋषि की प्रतीक्षा में दत्तात्रेय आसनासथ हुए । देवलऋषि स्नान करके लौटे , और उस लिंग के सामने बैठकर उन्होंने हाथ में जो रेत थी वह लिंग पर रखी , लिंग और अधिक ऊँचा हो गया और वह अपनी साधना में लीन हो गया । तब श्री दत्तात्रेय ने विशाल रूप धारण कर उस लिंग पर अपना हाथ रखा और वह लिंग धीरे धीरे धरती में समाने लगा ।

स्वसामथ्र्य से निर्मित अपनी कृति को अपने ही आंखों के सामने नष्ट होते देख देवल दौड़कर भगवान के चरणों में जा गिरा और गिड़गिड़ाकर प्रार्थना करने लगा- 'देवदेवेश्वर! क्षमा करें! कृपया मेरी इस कृति का थोड़ा सा तो अवशेष रहने दीजिए।

भगवान ने देवल की प्रार्थना स्वीकार की। वह लिंग आज तक देवदेवेश्वर स्थान में विधमान है। उस समय देवताओं और महिर्षियों ने फूल बरसाकर भगवान का जयजयकार किया। बाद में महर्षि देवल ने भगवान की पूजा की। श्रीदत्तात्रेय महाराज महाराज ने प्रसन्न होकर देवल से कहा- 'महर्षे! मेरा दर्शन तो अमोघ है। अत: आप जो चाहें वर मांग सकते हो। देवल ने कहा- 'कृपा निधान! यदि सचमुच आप मुझपर प्रसन्न है और मेरे अपराधों को क्षमा कर चुके हैं तो मैं आपसे यह वर मांगता हूँ कि- आपका जब तक अवतार रहे, तब तक आप प्रतिदिन रात को निद्रा करने यहां पधारे। बस मेरी इतनी ही इच्छा है। भगवान ने कहा- 'तथास्तु ! तब से लेकर आज तक भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु प्रतिदिन सैह्याद्री पर्वत पर स्थित देवेवेश्वर स्थान पर निद्रा करने आते हैं।

यह तस्वीर देवेवेश्वर स्थान की हैँ जहा आज भी भगवान निद्रा करने आते हैं। रात को बिछे हुये फुले की साज सुबह मानो ऐसी होती हैँ की कोई रात भर सोया हो... ____________________________________________________________ कोल्हापुर में भिक्षा- श्रीदत्तात्रेय प्रभु महाराज बद्रिकाश्रम में प्रतिदिन पुराण सुनते, काशी में स्नान, कोल्हापुर में भिक्षा, पंचालेश्वर में भोजन तथा माहुर में निद्रा करते। यह उनका दैनिक कार्यक्रम है। कहते हैं, गोरखनाथ की झोली में प्रतिदिन कोल्हापुर की एक श्रद्धालु स्त्री भिक्षा डालती और झोली आकाशमार्ग से गोरखनाथ के पास जा पहुंचती। एक दिन भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु ने झोली नीचे उतारकर भिक्षा स्वीकार कर ली। रिक्त झोली को देख गोरख चकित रह गया और वह अपने सामर्थ से जान गया कि यह कार्य तो श्रीदत्तात्रेय प्रभु का है औऱ क्रोध सॆ भरा हुआ वह माहुर पहुँचा। वहाँ श्रीदत्तात्रेय प्रभु से उसका शास्त्रार्थ हुआ औऱ उसमे हार जाने के पशचात् गोरखनाथ ने कहा मैं अदृशय होता हूं , तुम मुझे ढूँढ के निकालना वह मेंढक बन तालाब में छिप गया और पृभु केकड़े का ऱूप धारण कर उसकी टाँग पकड़ उसे तालाब से बाहर ले आए और तब गोरखनाथ ने कहा अब आप छिपें मैं आपको ढूँढता हूँ , श्रीदत्तात्रेय प्रभु महाराज ने तालाब में छलांग लगा जलमय हो गए और वह उऩहें ढूंढ न पाया । अंत में थक कर भगवान से प्रार्थना करने लगा कि अभिमान वश मैं आपको पहचान न पाया , आप निशचय ही ईशवरीय अवतार हैं कृपया मुझे क्षमां करें । श्रीदत्तात्रेय प्रभु महाराज नें प्रकट होकर उसे ज्ञान उपदेश दिया । उसने भगवान से कोल्हापुर में भिक्षा मांगने का अनुनय किया। जिसे भगवान ने सहर्ष स्वीकार कर किया। ____________________________________________________________

श्री शंकराचार्य वर प्रदान-

एक बार बौदॢ और जैन धर्म ने मिलकर वेदों को मानने वाले शंकराचार्य से शासत्रार्थ कर उन्हें हरा कर वेदों का खंडन किया और वेदों को अप्रतिषठित किया । दुखी मन से शंकराचार्य सैहाद्री पर्वत पर जाकर श्रीदत्तात्रेय महाराज की तपस्य़ा में लीन हो गए । तब भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन देकर वर मांगने को कहा तब शंकराचार्य ने भगवान से यह वर मांगा, कि- 'महाराज! मैंने जो दर्शन निर्माण किया है उसे तथा संन्यासियों को इस जगत में मान्यता प्राप्त हो। बस मेरी यही अभिलाषा है। भगवान ने कहा- तथास्तु, भगवान के वर से ही इन्हें सम्मान मिलता है। ______________________________

और लियायेँ पढ़िये...किल्क करेँ.