॥ भगवान श्री हंस अवतार ॥

॥ भगवान श्री हंस अवतार ॥

यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानि भवति भारत

अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम

कितनी सृषिटयाँ बीती, कितने ही युग गए, परमेश्वर भी युग-युग में अवतरित हुए, किन्तु उनमें से श्री दत्तात्रेय , श्री कृष्ण चक्रवर्ती , श्री चांगदेव राउल , श्री गोविन्द प्रभु और श्रीचक्रधर ये पांच प्रमुख अवतार का विवरण उपलब्ध हैं। इन्हें ही जय कृष्णीयों के पंच कृष्ण कहा जाता हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने गिता में कहा है कि सृषिट के आरम्भ में मैंने विवस्वान को ज्ञान दिया था। जिस ज्ञान पर आचरण करके जीव मुक्त हो जाते हैं वही ज्ञान विवस्वान ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को दिया। सतयुग अर्थात कृतयुग में हंस अवतार ने ब्रह्रा को दिया था और त्रेतायुग में भगवान श्री दत्तात्रेय ने यदुराजा को (अवधुत गिता) दिया और द्वापारयुग में वही ज्ञान फिर से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया। कलियुग में सर्वज्ञ श्री चक्रधर प्रभु ने वही ज्ञान नागदेव तथा बहुत से भक्तों को दिया, जिसे ब्रह्मविद्या नाम से जाना जाता है।

श्रीहंस अवतार

"ऐसी विरिचीची करुणा । परिसोनी कैवल्यराणा॥ होवोनि हंसपक्षी जाणा। अवतार धर त्या समयी॥"

[ सिंधात बोध & श्रीमदभागवत कथासार एकादश स्कन्ध, अध्याय 13, श्लोक 18 से 31]

भगवान श्रीकृष्ण ने उध्दव को कहा की मैँने ही कृत युग मेँ हंस के रुप मेँ अवतार लेकर प्रजापति ब्रम्हा के मानस पुत्र सनाकादिक को ज्ञान दिया और उनका उद्दार किया, ये बात भगवान गिता के 3 रे अध्याय के 20 वे श्लोक मेँ भी कही हैँ।

एक बार सनकादि महर्षियों ने पितामह श्रीब्रह्माजी से प्रश्न किया कि- पितामह ! मोक्षदाता परमेश्वर कौन हैँ ? परमेश्वर का परमधाम कौनसा हैँ ? तथा हमे मोक्ष कैसे मिल सकता हैँ ? यह गम्भीर प्रश्न जब ब्रह्मा जी के समक्ष आया तब ब्रह्मजी ने भगवान्‌ का ध्यान किया. इस प्रकार ब्रह्माजी की विनीत प्रार्थना पर कार्तिक शुक्ला नवमी को स्वयं निराकार परमेश्वर ने हंस रुप में अवतार लिया. और जिस प्रकार हंस नीर-क्षीर (जल और दूध) को पृथक्‌ करने में समर्थ हैं, उसी प्रकार आपने भी नीर-क्षीर विभागवत्‌ चित्त और गुणत्रय का पूर्ण विवेचन कर परमेश्वर के दिव्य तत्व के साथ-साथ ब्रह्मविद्या का सनकादि महर्षियों को सदुपदेष कर, उनके सन्देह की निवृत्ति की. निराकार परमेश्वर ने हंस रुप में ही सनकादी को ज्ञान प्रदान किया था ।

परंतु भागवत मेँ सुखदेव जी ने भगवान श्री हंस अवतार को विष्णुजी का अवतार समझ लिया ।

क्योँ की "हे अर्जुन, मेरी उत्पत्ति को अर्थात लीलासे प्रकट होने को न देवता लोग जानते है और न महर्षिजन भी जानते है, क्योकी मै सब प्रकार से देवताओँका और महर्षिओँका भी आदी अंत और मध्य मै हूँ" । तो इससे यह प्रतीत होता है की भगवान श्रीकृष्ण के अवतार लेने को देवतागण और महान महान ऋषी भी नहीँ जान पाते तो सुखदेव जी का कहना ही क्या ?