*

पेज 6 से आगे...

जिस प्रकार गांव की #वेश्या अपनी प्रिती दिखाकर सब के मन को आकर्षीत करती हैँ, उसी प्रकार जो एक क्षण के लिए भी स्वस्थ न बैठकर विषयप्राप्ती के लिए सर्वदेवताओँको पुजता हैँ; 822

इस प्रकार जो देवाताओँकी भक्ति करता हुआ चार दिशाओँको भागता हैँ वह अज्ञान का अवतार हैँ; 823



अब सवाल उठता हैँ की सब लोग देवताओँ को पुजते हैँ तो क्या वे मुर्ख हैँ...?

जी नहीँ, वे मुर्ख नहीँ अल्पमेधसाम अर्थात अल्पबुद्धी (गिता 7-23) अर्थात अज्ञानी हैं...

तथा भगवान कहते हैँ की ज्ञानी भक्त मुझेँ पंसद अर्थात प्रिय हैँ और ऐसा भक्त हजारो मेँ एक हैँ...


मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ॥


[गिता 7-3]


अर्थात... हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता हैँ


तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥


[गिता 7-17]


अर्थात... उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय हैँ



तथा भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ मुझको अर्थात परमेश्वर को अनन्य भक्ति से हीँ प्राप्त किया जा सकता हैँ...


अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥


[गिता 8-14]


अर्थात... हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ, अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ


पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।

यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्‌ ॥


[गिता 8-22]


अर्थात... हे पार्थ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है


तथा अनन्य भक्ति की व्याख्या श्रीशंकराचार्यँजीने ऐसी की हैँ...


"भगवतोऽन्यत्र पृथङ्‌न कदाचिदपि या भवति सा त्वनन्या भक्ति:"


[गिताशांकरभाष्य 11-54]


अर्थात... "जो परमेश्वर से अन्यत्र - पृथक्‌ कभी भी किसी की भी ना हो वह अनन्यभक्ति हैँ" (अर्थात सिर्फ परमेश्वरकी)


सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥


[गिता 9-14]


अर्थात... वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं



भगवान कहते है की अनन्य अर्थात सिर्फ मेरी परमेश्वर की भक्ति से ही मैँ उस भक्त का योगक्षेम स्वयं करता हुँ


अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌


[गिता 9-22]


अर्थात... जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ

(भगवत्‌स्वरूप की प्राप्ति का नाम 'योग' है और भगवत्‌प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम 'क्षेम' है)



अगले पेज पर जारी हैँ...







अगला प्रमाण अगले पेज पर...अगला पेज



Back Page



पेज :- 5 6 [7] 8 9