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देवता भक्त होते हैँ वेश्या की तरह...





अनन्य भक्ति अर्थात मिश्र भक्ति खंडन





कुछ लोग यह कह कर पल्ला झाडते हैँ की "सब भगवान एक हैँ" परन्तु किसी भी देवता की भक्ति अगर परमेश्वर भक्ति होती तो भगवान श्रीकृष्णने यहाँ पर ऐसा क्यो कहा होँता...


मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥


[गिता 14-26]


अर्थात... जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग # द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता हैँ

(# केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं)


तथा, भगवान आगे कहते हैँ की एक परमेश्वर की भक्ति को ही "ज्ञान" कहते हैँ और देवता भक्ति को "अज्ञान" कहते हैँ


मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥


[गिता 13 -10]


अर्थात... मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति # तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना तथा अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान हैँ और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान हैं - ऐसा मेरा मत हैँ

(#केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना 'अव्यभिचारिणी' भक्ति है)


इस वचन से "अव्यभिचारीणी" भक्ति की प्रशंसा की गई हैँ, भगवान के आशय को समझा जाये तो, भक्ति हमेशा "अव्यभिचारणी" हीँ रहनी चाहिये...

अपने पति के सिवाय दुसरे पुरुष पर प्रेम रखने वाली स्त्री को "व्यभीचारीणी" कहा जाता हैँ...

कोई भी स्री जिस प्रकार "अव्यभिचारीणी" होनी चाहियेँ, उसी प्रकार भक्ति भी "अव्यभिचारीणी" होनी चाहिये अर्थात एक परमेश्वर की ही होणी चाहीये,

[एक भक्तिर्विशिष्यते (गिता 7-17)]



जो लोग सभी देवताओँकी भक्ति करते हैँ उनकी भक्ति "व्यभिचारिणी भक्ति" होती हैँ...

संत ज्ञानेश्वर ने गिता के संस्कृत श्लोको को कविताओँ मेँ रुपांतरित करके "ज्ञानेश्वरी" का निर्माण किया तब इस विषय पर जो कविता की पंक्तिया लिखी तो उनके अनुसार " अनेक देवताओँ के पुजन करने वाले लोग "वेश्या" की उपमा देकर अज्ञानका मुर्तिमंत अवतार बोलते हैँ...


'तेवीँचि नाहीँ एकसरु । निर्वाहो जया ॥814॥

माझी मूर्ति निफजवी । ते घराचे कोँनीँ बैसवी । आपण देवोदेवी । यात्रा जाये ॥815॥

नित्य आराधन माझेँ । काजी कुळदैवता भजे । पर्वविशेषेँ कीजे । पुजा आना ॥816॥

माझेँ अधिष्ठान घरीँ । आणि वोवसे आनाचे करी । पितृकार्यावसरीँ । पितरांचा होय ॥817॥

एकादशिच्या दिवसीँ । जेतुला पाडु आम्हांसी । तेतुला नागांसी । पंचमीच्या दिवशीँ ॥818॥

चौथ मोटकी पाहे । आणी गणेशाचाचि होये । चावदसी म्हणे माये। तुझाच वो दुर्गे ॥819॥

पाठी सोमवार पावे । आणि बेलेँसी लिंगा धांवे । ऐसा एकलाचि आवघे । जोगावी जो ॥821॥

ऐसा अंखड भजन करी । उभा नोहे क्षणभरी । अवघेन गांव द्वारीँ । #अहेव जैसी ॥822॥

ऐसेनि जो भक्तु । देखसी सैरा धांवतु । जाण अज्ञानाचा मुर्तु । अवतार तो ॥823॥


[ज्ञानेश्वरी अध्याय 13 ओवी 814 से 823]


अर्थात... " उस को एकनिष्ठ (अनन्य) भक्ति करना पंसद नहीँ; 814

मेरी (श्रीकृष्णकी) मुर्ति तयार करके उसको घर के एक कोने मे स्थापन करके स्वयं अनेक देवताओँ के यात्राओँ को जाता हैँ; 815

रोज मेरी (श्रीकृष्ण) की पुजा करता हैँ, और कार्य प्राप्ति के लिए कुलदेवता को पुजता हैँ, और एखाद पर्वनी आनेपर तिसरेही देवता की पुजा करता हैँ; 816

मैँ (श्रीकृष्ण) घर मेँ रहने पर भी दुसरे देवताओँको मनोकामना (मन्नत) मागंता हैँ, आराधना करता हैँ, और श्राध्दकाल मेँ पितरोँकी पुजा करता हैँ; 817

एकादशी के दिन जैसी मेरी (श्रीकृष्णकी) भक्ति करता हैँ, वैसी नागपंचमी के दिन नाग को पुजता हैँ; 818

चतुर्थी के दिन गणेश की पुर्ण भक्ति करता हैँ, और चतुर्दशी के दिन देविकी पुजा करके 'हे अंबे, मै तेरा हुँ' ऐसी प्राथना करता हैँ; 819

सामने सोमवार आने पर बेलपत्तियाँ लेकर शंकर को अर्पण करने के लिए जाता हैँ, और इसप्रकार जो पुरुष अकेला ही सभी देवताओँकी सेवा करता हैँ; 821

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