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देवताओँ को परमेश्वर समझकर पुजना अविधिपूर्वक अर्थात्‌ अज्ञानपूर्वक...





मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं





भगवान श्रीकृष्ण आगे 9 वे अध्याय मे कहते है की,

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्‌ ॥


अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥


यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः । पभूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌ ॥


गिता अध्याय 9, श्लोक 23 से 25.

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अर्थात, हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात्‌ अज्ञानपूर्वक है॥9-23॥


क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से गिरते हैं अर्थात्‌ पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं ॥9-24॥


हे अर्जुन! देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसीलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता। ॥9-25॥



इससे यही सिद्ध होता हैँ की, भुत पितर भक्ती, देवता भक्ती और परमेश्वर भक्ती अलग अलग है, और अन्य देवताओँ को पुजने से हमेँ परमेश्वर प्राप्ती नहीँ हो सकती।





तथा पांडव गिता मे भी कहा गया हैँ...


वासुदेवं परित्यज्य योऽन्यदेवमुपासते। तृषितो जान्हवीतीरे कूपं खनति दुर्मति:


[पांडव गिता 105]


अर्थात... "श्रीकृष्ण को छोडकर जो अन्य देवताओँ की उपासना करता हैँ, वह गंगा किनारे बैठकर पाणी के लिये कुहा खोदनेवाले तृषपावंत के समान दुर्मति हैँ"













इन प्रमाणे से सिद्द हो चुका हैँ की देवता और परमेश्वर अलग अलग हैँ तथा देवताओँको पुजने से हमेँ परमेश्वर की प्राप्ति नहीँ होगी फिर भी और बहोत सारे प्रमाण आपका अगले पेज पर इंतजार कर रहे हैँ...







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