*

परमधाम मेँ मोक्ष...





तद्धाम परमं मम





हिँदु धर्म भले ही भगवान श्रीकृष्ण को विष्णुजी का अवतार मानकर वैकुठ को मोक्ष का धाम कहता हो पर सच तो कुछ और हैँ...

...यह हैँ की भगवान ने अपने श्रीमद्‌भगवद गिता मेँ परमधाम के बार सात बार कहां परन्तु एक बार भी वैकुंठ और क्षिराब्दी का नाम नहीँ लिया यह भी एक बडा सबुत हैँ श्रीकृष्ण और श्रीविष्णु के अलग अलग होने का...


मूढाः पदमव्ययं तत्‌ ॥


[गिता 15-5]


अर्थात... विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं


न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥


[गिता अध्याय 15, श्लोक 6]


अर्थात... हे अर्जुन ! जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है


यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।


[गिता 8-11]


अर्थात... वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाशी कहते हैं


मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌ ।

नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥


[गिता 8-15]


अर्थात... परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते


आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन । मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥


[गिता 8-16]


अर्थात... हे अर्जुन! ब्रह्मलोक सहीत सभी लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं


तथा भगवान अपने परमधाम की व्याख्या करते हुये कहते हैँ...


अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌ । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥


[गिता 8-21]


अर्थात... हे अर्जुन! अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है


तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥


[गिता 18-62]


अर्थात... हे भारत! तू सब प्रकार से मुझ परमेश्वर की ही शरण # में जा। मुझ परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा

(#लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है)





"वैकुंठ" और 'श्रीकृष्ण' के "परमधाम" मेँ क्या है अतंर...? जानने के लिये...यहां किल्क करे।





असल मेँ "विष्णु" कितने हैँ ? और कौनसे हैँ उनके स्थान ? जानने के लिये...यहां किल्क करे।





अगर "श्रीविष्णु" और"श्रीकृष्ण" अलग अलग हैँ, तो भगवान ने गिता मेँ मैँ ही 'राम' या 'विष्णु' हुं ऐसा क्योँ कहा है ? जानने के लिये...यहां किल्क करे।





Back Page



पेज :- 9 10 [11]