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'वैकुंठ' और 'क्षिराब्दी' च्युतिमंत अर्थात अपुनरावृत्ती को लौटने वाली स्थान है, वहां पर नहीँ है मोक्ष ।





"मोक्ष" - जहां जाने के बाद लोग पृथ्वीलोक पर वापस नहीँ आते... ऐसा वह श्रीकृष्ण का "परमधाम"





हिंदु के अनुसार क्षिराब्दी अथवा वैँकुठ मेँ ही मोक्ष मिल सकता हैँ परन्तु ऐसा नही हैँ वैँकुठ अथवा क्षिराब्दी यह दो अलग अलग स्थान हैँ और वहां पर मोक्ष संभव नहीँ हैँ...

आगे भागवत की तिन कथाए दी गयी हैँ उन्हे स्वयं पढ कर आपको पता चलेगा की क्षिराब्दी अथवा वैँकुठ मेँ मोक्ष कदापी नहीँ मिल सकता...


{1} देवर्षी नारद महाराज युद्दिष्टिर से बोले - " एक दिन ब्रम्हा के मानसपुत्र सनाकादी ऋषी तिनो लोँको मे स्वच्छन्द विचरण करते हुए वैकुन्ठ मेँ जा पहुचेँ,

द्वारपाल जय विजय ने उन्हे साधारण बालक समझकर जाने नहीँ दिया तब उन्होँनो क्रोध मेँ आकर शाप दे दिया की " तुम लोगोँ को शीघ्र ही यहांसे पापमयी आसुरयोनी मेँ जन्म मिलेगा",

उनके शाप से जय विजय वैकुंठ से निचे गिरने लगे, तब उन्ह ऋषीओँ ने कहा की "तिन जन्म मेँ इस शाप को भोगकर तुमलोग फिर इसी वैकुन्ठ मेँ आ जावोगे"

वे बाद मेँ हिरण्याक्ष और हिरण्याक्षिपु के रुप मेँ जन्मे बाद मेँ रावण और कुभंकरण तथा द्वापर मेँ शिशुपाल और वक्रदन्त के रुप मे जन्मे...


[श्रीमद्भागवत कथासार, दशम स्कन्द, अध्याय 1, श्लोक 35 से 46]



{2} जब भगवान श्रीकृष्णजी का जन्म हुआ तो उनका बालरुप देखकर श्रीविष्णुजी ने क्षिराब्धी मेँ बैठे बैठे ही नमस्कार कर लिया तब उसी वक्त श्री लक्ष्मीजी ने पुछा "हे स्वामी आपने किसे नमस्कार किया है" ?

तब विष्णुजी ने कहा

"देवी लक्ष्मी मैने जिनको नमस्कार कीया है उनका वर्णन सुनिये,

देवादीदेव निर्गुण निरामय निराकार परमेश्वर ने गोकुल मेँ जन्म लिया है, उनके बालरुप को देखकर मैने उन्हे नमस्कार किया है, उनके रुप के सामने मेरा ये रुप कुछ भी नहीँ हैँ।"

भगवान के उस रुप का वर्णन सुनकर लक्ष्मीजी श्रीकृष्णजी का ओ रुप देखने की आकांक्षा करने लगी तब और हठ करने लगी, तब विष्णुजी ने एक योजना बनायी और मथुरा के एक ब्राम्हण के पुत्र को आकाश मार्ग से अपने धाम क्षिराब्धी को लाने लगे, जन्म के तुरन्त एक के बाद एक बच्चे उडकर आकाश की और जाने लगे तब उस ब्राम्हण ने सातवे पुत्र के वक्त भगवान श्रीकृष्णजी से विनती की उस वक्त भगवान बडे होकर द्वारका के राजा बन गये थे । फिर अर्जुन को लेकर चल पडे क्षिराब्धी की ओर..................

तब भगवान श्रीकृष्णजी को देखकर लक्ष्मीजी अपनी सुध बुध खोकर श्रीकृष्ण के साथ जाने लगी पर विष्णुजी के कहने पर रुक गयी फिर उसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ब्राम्हण के सात पुत्रो को लेकर आये।


[श्रीमद्भागवत कथासार, दशम स्कन्द (उत्तरार्ध) अध्याय 89, श्लोक 31 से 66]


अब आप ही बताइये क्या विष्णुजी का अवतार श्रीकृष्णजी हो सकते है ?


देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः


[गिता अध्याय 11, श्लोक 52]


देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं



{3} अब महर्षि भृगुजी भगवान विष्णुके निवास्थान वैकुंठ गयेँ, उस समय भगवान विष्णु लक्ष्मीजीके गोदमेँ अपना सिर रखकर लेटे हुए थे । भृगुजीने जाकर उनके वक्षस्थल पर एक लात कसकर मार दी...


[श्रीमद्भागवत कथासार, दशम स्कन्द (उत्तरार्ध) अध्याय 89, श्लोक 7 से 8]



{4/5} तथा कैलास से भृगृ और सत्यलोक से रैवत राजा तथा उनकी पुत्री रेवती (बलराम की पत्नी) भी वापस आ गये..



यहा भागवत के कुछ कथाये ली गयी हैँ परन्तु ऐसी बहोत कथाये हैँ जिनसे ये साबित होता है की श्रीकृष्ण विष्णुजी के अवतार बिलकुल भी नहीं हैं ।

क्योँकी, विष्णुजी के द्वारपाल जय और विजय को सनाकादीक के शाप से मृत्युलोक मेँ जन्म लेना पडा और तो और ब्राम्हण के सात पुत्र लाने गये अर्जुन भी सहशरीर वापस आ गये, तथा भृगुऋषी सहशरीर गये और लाथ मारकर वापस आ गये...


इससे यह प्रतित होता हैँ की, 'वैकुंठ' और 'क्षिराब्दी' च्युतिमंत अर्थात अधोगती को लौटने वाली स्थान है, इसके संर्दभ मे भगवान श्रीकृष्णजी ने कहा है की,


"क्षीणे पुण्ये मर्त्य लोक विशंति"


[गिता 9-21]


अर्थात... पुण्य है तब तक देवता फल देते है और पुण्य समाप्त होते ही अपने फल से निकाल कर मृत्युलोक मेँ जन्म करा देते है।





अगले प्रमाण मेँ जानेँगे भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम के बारे मेँ...





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