Devtabhkati

"श्रीमद्भगवद गिता" के आधार पर जानिये, परमेश्वर और देवताओँ को एक ही मानना सबसे बडी अज्ञानता, और सब भगवानो को एक मानना सबसे बडी मुर्खता... जानिये कैसे ?





"देवता भी मोक्ष की इच्छा करते हैँ"





अगर आप मोक्ष के इच्छुक हैँ तो जान लिजिये की देवी और देवता स्वयं मोक्ष की इच्छा करते हैँ...

और देवता आत्यंतिक मोक्ष नहीँ दे सकते,


"मोक्षमिच्छन्ति देवता:।


[शिवपुराण - ध.सं. 49.5]


अर्थात... "देवता भी मोक्षकी इच्छा करते हैँ"


इस वचन से सिद्द होता हैँ...जो देवता स्वयं मोक्षकी इच्छा करते हैँ, वह अन्य लोगोँको मोक्ष कैसे दे सकते हैँ...?



स्वयं तरीतुमक्षम: कथमसौ परांस्तारयति।


अर्थात... "जो स्वयं तर नहीँ सकता, वह दुसरोँको कैसे तर सकता हैँ...?"


परंतु परब्रह्म परमेश्वर (श्रीकृष्ण) आत्यंतिक मोक्ष देते हैँ...


मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ।

[गिता 8-16]


अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।

[गिता 18-66]



अर्थात... हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता,


संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त करके मोक्ष दूँगा, तू शोक मत कर,



तथा श्रीशंकराचार्यां भी कहते हैँ


ये यदुनंदननिहतास्ते तु न भूय: पुनर्भवं प्रापु:


[प्रबोधसुधाकर - 243]


अर्थात... "यदुनंदन श्रीकृष्ण के हात से जो मारे गये हैँ वह फिर से इस संसारमेँ वापस नहीँ आते"

जिस अर्थ से देवताओँ के प्राप्तिरुप से पुनर्जन्म होँता हैँ और परमेश्वर के प्राप्ति से पुनर्जन्म होँता हीँ नहीँ उस अर्थ से देवता और परमेश्वर भिन्न भिन्न पदार्थ हैँ, यहीँ सिद्द होता हैँ...













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