॥ ब्रम्हविद्या ॥

अर्थात की " सपुर्ण सृष्टि मेँ सेँ ऐसी कौन हैँ जो जिवोँकी अविद्या छेद करके उसे मोक्ष दे सके ? सिर्फ एक परमेश्वर । वही निर्वेव निराकार परमेश्वर । परंतु वह परमेश्वर कृपा करता है, और साकार रुप मेँ प्रकट होता और लोगोँ के समुख्ख अवतरीत होता हैँ तथा अपने सन्निधान देता हैँ । उन्ही के दास्य (सेवा) करने से हमेँ मोक्ष मिल सकता है। [गिता 4-6,7,8,]

फिर म्हइंभट्ट ने पुछा -

म्हइंभट्ट :- "तो फिर दास्य किसके करने चाहिये ? "

स्वामी :- "जैसे द्वापारी श्रीकृष्णचक्रवर्ती गोसावीयांचे चरण शरण : "

म्हइंभट्ट : - "उन्होने तो द्वापर युग के अंत मेँ ही परमधाम को प्रस्थान किया था तो फिर दास्य किसके करने चाहियेँ ? "

स्वामी :- "जैसे सह्याद्रीँ श्रीदत्तात्रेय प्रभु गोसावीयांचे चरण शरण : "

म्हइंभट्ट : - उनका दर्शन तो अमोघ हैँ, और वे अपना दर्शन ऐसे ही नहीँ देते, तो फिर दास्य किसके करने चाहियेँ ? "

स्वामी :- "जैसे द्वारावतीए श्रीचांगदेव राऊळ गोसावीयांचे चरण शरण : "

म्हइंभट्ट : - उन्होने तो कामाख्या के निम्मित देह त्याग किया हैँ, तो फिर दास्य किसके करने चाहियेँ ? "

स्वामी :- "जैसे ऋध्दपुरी श्रीगुंडम राऊळ गोसावीयांचे चरण शरण : "

म्हइंभट्ट : - वे तो किसी को अपनी सेवा दास्य नहीँ करने देते और वे क्या मुझे अपनी सेवा करने देगेँ ? तो फिर दास्य किसके करने चाहियेँ ? "

स्वामी :- (भगवान ने अपनी मांडी पर करकमल थपटकर कहा) " जैसे हे,प्रतिष्ठानीं श्रीचांगदेव राऊळ गोसावीयांचे चरण शरण : "

उसी वक्त

प्रतिष्ठानी (पैठण,MH) जैसे हे, यह सुनकर म्हइंभट्ट को यह एहसास हो गया की स्वामी ही परमेश्वर का अवतार हैँ । स्वामीजी का मुक्काम डोमेग्राम दस माह तक था पर स्वामीजी ने प्रतिष्ठान अर्थात पैठण का ही नाम क्यो लिया बल्की डोमेग्राम का नाम भी ले सकते थे और डोमेग्रामी कह सकते थे ?

परंतु भगवान सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी ने यह बात पहले जान ली थी की, 'म्हइंभट्ट ने शास्त्र मेँ पहले ही पढ लिया था की आगे चल कर पैठण मेँ परमेश्वर अवतार लेने वाले हैँ ।'

इसलिये, म्हइंभट्ट को यह एहसास कराने के लिये भगवान ने प्रतिष्ठान कहा हैँ ।