॥ ब्रम्हविद्या ॥

भगवान श्रीकृष्ण

ने "गिता" मे "ज्ञान" के महीमा वर्णन करते हुये कहा हैँ ।

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है॥4-38॥

जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है॥4-39॥

विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है॥4-40॥

तथा भगवान कहते हैँ की ज्ञान मनुष्य को मैँ ही प्रदान करता हुँ...

मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान्‌ भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं ॥10-8॥

निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं ॥10-9॥

उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह

तत्त्वज्ञानरूप योग

देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥10-10॥

हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ ॥10-11॥

उसी प्रकार कली युग मेँ भी

भगवान सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामी

ने भी श्रीक्षेत्र डोमेग्राम (जिला - अहमदनगर,MH) मेँ म्हइंभट्ट को निम्मत बना कर तत्वज्ञानरुप योग दिया ।

स्वामीजी का ठहराव डोमेग्राम मेँ था । एक दिन की बात हैँ जब म्हइंभट्ट नामक एक ब्राम्हण अपने शास्त्रज्ञान से अहंकार से चुर थे । उन्होने सभी शास्त्रोका अभ्यास कर लेने का अहंकार था । एक दिन म्हइंभट्ट और गणपत आपयो शास्त्र चर्चा कर रहे थे और उन्होने ही म्हइंभट्ट को श्रीचक्रधर स्वामी के बारे मेँ समझाया की उनके पास आप हर सवाल का जवाब हैँ, पर अहंकार मेँ चुर म्हइंभट्टजी ने स्वामीजी को साधारण एक संत समझ लिया । तथा चल पडे डोमेग्राम की ओर, रास्ते मेँ वे सोचने लगे की उनसे मैँ ये सवाल पुछुंगा, ओ सवाल पुछुंगा, उन्हे इस प्रकार हराऊंगा आदी, यह सभी बाते भगवानजी डोमेग्राम मेँ बैठे बैठे सर्वज्ञ रुप देख रहे थे ।

म्हइंभट्ट ने स्वामीजी को कायाप्रणीत नमस्कार किया और म्हइंभट्ट कोई सवाल पुछे उसके पहले ही स्वामीनेँ उनसे पुछा -

"अत्यंतीक संसृती छेद होए ऐसी काइ प्रतीती आत ?"

अर्थात की जिवत्मा जन्ममृत्यूरुप बंधनो से छुटता हैँ, ऐसी कोई प्रतीती (साधन) आपको पता हैँ क्या ? इस म्हइंभट्ट ने कहा "आप मुझे पुछते हैँ तो साधु होकर क्या करते हैँ ? म्हइंभट्ट के इस कथन पर भगवान ने उन्हे फिर वही सवाल पुछा । इस बार म्हइंभट्ट ने जवाब दिया की "कर्म करना चाहिये, कर्म करने से अंतःकरण शुध्द होता हैँ, शुध्द अंतःकरण से वैराग्य उत्पन्न होता है, तथा वैराग्य से ज्ञान उत्पन्न होता हैँ और ज्ञान से मोक्ष मिलता हैँ"

इस पर श्रीस्वामी सर्वज्ञजी ने कहा " कर्मोमेँसे नित्य कर्म तो प्रतिदिनके चरितार्थ के चलाने के लिये जो हिँसा होती हैँ, उसके दुःखोँके प्ररिहारार्थी मेँ चले, गये तथा कामिक कर्म तो जिस कामना द्वारा कि गयी उसमे चले गये, तो फिर कौन से कर्म बचे ? तो फिर अंतःकरण शुध्द कैसे होगा ? और वैराग्य कैसे उत्पन्न होगा ? तथा ज्ञान कैसे उत्पन्न होगा ? और मोक्ष कैसे प्राप्त होगा ? और अविद्या जनित विकार से मनुष्यो को मोक्ष कैसे मिल सकता हैँ ?

तब म्हइंभट्ट ने विंनती की, की मुझ इस बारमेँ कुछ पता नहीँ हैँ, क्रिपा करके मुझे आप ही बताईए ।

तब

भगवान सर्वज्ञ श्रीचक्रधर स्वामीजी

ने तत्वज्ञान रुप योग प्रदान किया । भगवान श्रीकृष्ण जो ज्ञान अर्जुन को नहीँ बता पाये वह ज्ञान कलीयुग अवतार लेकर बताया उसी को ब्रम्हविद्या कहते हैँ ।

भगवान म्हइंभट्ट को कहते हैँ की

" सृष्टिमध्ये कव्हणेँ करणेँ मुंचिजे ना एकेँ परमेश्वरेविन : तोचि परमेश्वरु निर्वेवू निराकारु असे : परी कृपावशेँ सावेवू साकारु होए : अवतरे आपुले सन्निधाध दे : तेँ दास्य मोचक "

आगे जारी हैँ...