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>> जिस प्रकार तुमने *मुझको देखा हैँ, इस प्रकार रुपवाला *मै न वेदोँसे... (11-53)

>> *मैँ प्रत्यक्ष देखनेके लिये, (11-54)

>> *मेरे ही लिये, *मेरे परायण हैँ, *मेरा भक्त हैँ... वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष *मुझको ही प्राप्त होता हैँ (11-55)

>> *मुझमेँ मनको एकाग्र करके निरन्तर *मेरे भजन ध्यानमेँ लगे हुए...*मुझ सगुणरुप परमेश्वरको भजते हेँ, वे *मुझको योगियोँमे अति उत्तम योगी मान्य हैँ (12-2)

>> योगी *मुझको ही प्राप्त होते हैँ... (12-4)

>> *मेरे परायण रहनेवाले *मुझमेँ अर्पण करके *मुझ सगुणरुप परमेश्वरको... (12-6)

>> उन *मुझमेँ चित्त लगानेवाले प्रेमी भक्तोँका *मैँ शीघ्र ही... (12-7)

>> *मुझमेँ मनको लगा और *मुझमेँ ही बुध्दिको लगा, इसके उपरान्त तु *मुझमेँ ही निवास करेगा... (12-8)

>> यदि तु मनको *मुझमेँ; *मुझको प्राप्त होनेके लिये इच्छा कर । (12-9)

>> *मेरे लिये कर्म करने, *मेरे निमित्त कर्मोको करता हुआ भी *मेरी प्राप्तिरुप सिध्दिको ही प्राप्त होगा । (12-10)

>> यदी *मेरी प्राप्तिरुप योगके... (12-11)

>> *मुझ परमेश्वरके स्वरुपका ध्यान... (11-12)

>> *मुझमेँ दृढ निश्चयवाला हैँ वह *मुझमेँ अर्पण किये हुए मन बुध्दिवाला *मेरा भक्त *मुझको प्रिय हैँ। (12-14)

>> वह भक्त *मुझको प्रिय हैँ। (12-15)

>> *मेरा भक्त *मुझको प्रिय हैँ। (12-16)

>> वह भक्तियुक्त पुरुष *मुझको प्रिय हैँ। (12-17)

>> वह स्थिरबुध्दि भक्तमान् पुरुष *मुझको प्रिय हैँ। (12-19)

>> *मेरे परायण होकर...वे भक्त *मुझको अतिशय प्रिय हैँ। (12-20)

>> ऐसा *मेरा मत हैँ (13-2)

>> वह सब संक्षेप मेँ *मुझसे सुन (13-3)

>> *मुझ परमेश्वरमेँ अनन्य योगके... (13-10)

>> *मेरा भक्त इसको तत्वसे जानकर *मेरे स्वरुपको प्राप्त होता हैँ। (13-18)

>> *मैँ फिर कहुँगा... (14-1)

>> *मेरे स्वरूपको प्राप्त हुए पुरुष (14-2)

>> *मेरी महत् ब्रह्मरुप मुल प्रकृति... (14-3)

>> *मैँ बीजको स्थापन करनेवाला पिता हूँ। (14-4)

>> *मुझ परमात्माको तत्त्वसे जानता हैँ, उस समय वह *मेरे स्वरुपको प्राप्त होता हैँ। (14-19)

>> *मुझको निरन्तर भजता हैँ, (14-26)

>> अखण्ड एकरस आनन्दका आश्रय *मैँ हूँ। (14-27)

>> वही *मेरा परमधाम हैँ... (15-6)

>> जीवात्मा *मेरा ही वंश हैँ... (15-7)

>> उसको तु *मेरा ही तेज जान (15-12)

>> *मैँ ही पृथ्वीमेँ प्रवेश करके... (15-13)

>> *मैँ ही सब प्राणियोँके... (15-14)

>> *मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा *मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और शंका निवारण आदी होता है और सब वेदों द्वारा *मैं ही जानने योग्य हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी *मैं ही हूँ (15-15)

>> हे भारत! जो ज्ञानी पुरुष *मुझको क्षर और अक्षरो से उत्तम सर्वशक्तीमान तथा अच्युत पद प्रदान करनेवाला परब्रम्ह परमेश्वर के रुप मेँ जानता हैँ वो सब कुछ जाननेवाला पुरुष, सब प्रकार से सिर्फ *मेरा ही स्मरण करता हैँ, और सिर्फ *मेरी ही भक्ती करता है (15-19)

>> *मेरे द्वारा कहा गया, (15-20)

>> वे मुढ *मुझको न प्राप्त होकर... (16-20)

>> *मुझको प्राप्त हो जाता हैँ। (16-22)

>> *मुझ परमात्माको भी... (17-6)

>> *मेरी परा भक्ति को प्राप्त हो जाता हैँ... (18-54)

>> उस परा भक्तिके द्वारा वह *मुझ परमात्मा को, *मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से *मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही *मुझमें प्रविष्ट हो जाता है (18-55)

>> *मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी *मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है। (18-56)

>> सब कर्मों को मन से *मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके *मेरे परायण और निरंतर *मुझमें चित्तवाला हो। (18-57)

>> उपर्युक्त प्रकार से *मुझमें चित्तवाला होकर तू *मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण *मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा। (18-58)

>> हे अर्जुन! तू *मुझमें ही मन लगाने वाला हो, *मेरा ही भक्त बन, *मेरा पूजन करने वाला हो और *मुझको ही प्रणाम कर। ऐसा करने से तू *मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू *मेरा अत्यंत प्रिय है। (18-65)

>> संपूर्ण धर्मों का सर्वसंग परीत्याग करके तू केवल एक *मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। *मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर। (18-66)

>> जो पुरुष *मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को *मेरे भक्तों में कहेगा, वह *मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है। (18-68)