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एकभक्तिर्विशिष्यते ।





एक अकेले सर्वव्यापी परमेश्वर की अनन्य भक्ति से ही होता हैँ उद्धार...





भगवान जब अपना रुप अर्जुन को दिखाते है तब वह रुप बाकी भक्त किस उपाय से देख सकते हैँ ये बताते हुये कहते हैँ...


भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥


[गिता 11-54]


अर्थात... हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ


मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥


[गिता 11-55]


अर्थात... हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव # से रहित हैँ, वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है

(#सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है)



भगवान कहते हैँ अनन्य भक्ति योग से अर्थात मेरी अकेले परमेश्वरकी भक्ति करनेवाले को मैँ संसार समुद्र से उद्धार करने वाला होता हैँ...


ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥


[गिता 12-6]


अर्थात... जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं...


तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ ।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥


[गिता 12-7]


अर्थात... हे अर्जुन ! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ



और भगवान यथार्थ शब्दो मेँ कहते हैँ...


मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥


[गिता 12-8]


अर्थात... मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं हैँ





भगवान कहते हैँ की जो मुझे "पुरुषोत्तम" जानता वह सिर्फ मेरी ही भक्ति करता हैँ



यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ ।

स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥


[गिता 15-19]


अर्थात... हे भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको क्षर और अक्षरो से उत्तम सर्वशक्तीमान तथा अच्युत पद प्रदान करनेवाला परब्रम्ह परमेश्वर के रुप मेँ जानता हैँ वो सब कुछ जाननेवाला पुरुष, सब प्रकार से सिर्फ मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही निरन्तर भजता है और मेरा ही स्मरण करता हैँ, और सिर्फ मेरी ही भक्ती करता है


धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।

योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥


[गिता 18-33]


अर्थात... हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति# से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं@ को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है

(#भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।)

(@ मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।)





अगले प्रमाण मेँ जानेगेँ की वैँकुठ और क्षिराब्धी मेँ नहीँ हैँ मोक्ष...







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