तो शिव को किस प्रकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जा सकता हैँ...

सदियो से हिन्दु धर्मावलंबी लोग ब्रम्हा विष्णु महेश का पुजन करते आये है परंन्तु परमेश्वर श्रीकृष्ण महाराज को इन तिनो देवोँ मे रखना उचित प्रतित नहीँ होता

[चेतावनी:- हमारा उद्देश देवोँकेँ दोषोँ को दिखाना नहीँ हैँ बल्की सत्य को अवगत करना हैँ...]

{हो सके तो आप और हरीहरब्रम्हाजी हमेँ माफ करे... }

[A] शिवजी ने क्रोध मेँ एक बालक का शिरछेद कर डाला

शिर ऐसी जगह गया की उसे लाना असभंव हो गया था,

तथा कामदेव शिवजी द्वारा कोध्राग्नी मेँ जल जाने के कारण उनका शरीर वापस तयार करने मेँ भी शिव असमर्थ थे,

तो शिवजी किस प्रकार सर्वशक्तिमान परमेश्वर हो सकते हैँ

और भगवान श्रीकृष्ण ने सांदिपनी गुरु के पुत्र जो समुद्र मे डुब कर मर गया था, उसे यमलोक से सहशरीर वापस ले आये थे,

[श्रीमद्भगवत कथा महापुराण - दशम स्कन्द पुर्वार्ध अध्याय 45 श्लोक 35 से 50]

तो आप ही विचार किजिये सर्वशक्तिमान परमेश्वर कौन हैँ

श्रीकृष्ण सर्वशक्तीमान परमेशर के अवतार हैँ,

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥

{गिता अध्याय 9, श्लोक 18, }

अर्थात, हे अर्जुन, होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान (प्रलयकाल में संपूर्ण भूत सूक्ष्म रूप से जिसमें लय होते हैं उसका नाम 'निधान' है) और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ॥

एक तरफ भगवान श्रीकृष्णजी का कहना की मै पोषन कर्ता, उत्पादक, संहारक, हितचिंतक, रक्षक, साक्षी, आश्रयस्थान, निधान, अविनाशी, मुलकारण, मोक्षदाता परमेश्वर हुँ।

बल्की शिव को तो हाथी के शिर से काम चलाते हुये देखा जा सकता है ।

तथा शिवजी और भगवान श्रीकृष्ण के आचार और विचार भी नही मिलते हैँ

[B] शिवजी ने तो विष्णुजी के एक "मोहिनी" रुप को नहीँ पहचान सके और काम वासना तृप्त करने के लिये भाग गये मोहीनी के पिछे,

पढिये भागवतके कुछ श्लोक...

[({ वे मोहनीको निहारने और उसकी चितवनके रसमेँ डुबकर इतने विहल हो गये कि उन्हे अपने आपकी भी सुधि न रही ।...॥22॥

मोहिनी ने शंकरजीका विवेक छीन लिया । वे उसके हाव-भावोँसे कामातुर हो गये और भवानीके (पार्वतीजी) सामने ही लज्जा छोड़कर उसकी ओर चल पडे ॥25॥

शकंरजी की इद्रियाँ अपने वशमेँ नहीँ रहीँ, वे कामवश हो गये थे; अत: हथिनीके पीछे हाथीकी तरह उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे ॥27॥

शकंरजी भी उन मोहिनीवेषधारी अद्भुतकर्मा विष्णुजीके पीछे-पीछे दौड़ने लगे । मानो उनके शत्रु कामदेवने इस समय उनपर विजय प्राप्त कर ली हैँ ॥31॥

कामुक हथिनीके पीछे दौड़नेवाले मदोन्मत हाथीके समान वे मोहिनीके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे। यद्यपि शकंरजी का वीर्य अमोघ है, फिर भी मोहिनीकी मायासे वह स्खलित हो गया ॥32॥

श्रीमदभागवत कथा महापुराण अष्टम स्कन्ध, 12 अध्याय, श्लोक 17 से 37 })]

और दुसरी तरफ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ की

हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल ॥3-41॥

{गिता अध्याय 3, श्लोक 41, }

शिवजी के कोध्र मेँ गणपती अपना सिर तथा कामदेव अपना शिरीर गवा बैठे,

शिव मे काम वासना और क्रोध मौजुद परंन्तु भगवान श्रीकृष्ण नेँ कहा हैँ की

काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को 'नरक के द्वार' कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए ॥Geeta 16-21॥

तो आप हि तय किजीये शिव और भगवान श्री कृष्ण के आचरण और विचार मेँ कितना फरक हैँ...

[C] शिवजी ने वृकासुर (भस्मासुर) को वर दिया की "तुम जिनके सर पर हाथ रखो वो जल कर भस्म हो जाय" ...

तो वृकासुर ने ये प्रयोग शिवजी के साथ करने की ठानी और शिवजी के पिछे उनके सिर पर हाथ रखने के लिये भाग उठे...

"अब तो शिव अपने दिये हुए वरदानसे भयभीत होँ गये ॥23॥

"वह शिव का पिछा करने लगा

और शिव उससे डरकर काँपते हुये भागने लगे । वे पृथ्वी, स्वर्ग और दिशाऔँके अन्ततक दौड़ते गये; परन्तु फिर भी उसे पीछा करते देखकर उत्तरकी ओर बढे ॥24॥

बड़े बड़े देवता इस सकंटको टालनेका कोई उपाय न देखकर चुप रह गये। अन्तमेँ शिव वैकुठलोक मेँ गये ॥25॥

[श्रीमदभागवत कथा महापुराण - दशम स्कन्द उत्तरार्थ, अध्याय 88, श्लोक 23 से 25]

तो आप के पास दिमाग हो तो ही विचार कीजिये की...

एक राक्षस से भयभीत होकर शिव डरकर कापते हैँ और विष्णुजी से मदत मागते हैँ...

और इधर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ...

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च­ भविष्यताम्‌ ।

हे अर्जुन !मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ ॥GEETA 10-34॥

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌ ॥

और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो ॥GEETA 10-39॥

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥

मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ ॥GEETA 10-42॥

तो एक तरफ शिवजी का अपने भस्म हो जाने के डर से काँप कर डरकर भाग जाना..

और दुसरी तरफ भगवान श्रीकृष्ण का कहना की "मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ"

दोने के कथनी और करनी मेँ कितना फरक हैँ...

तो जरा सोचिये की एक राक्षस के भय से भागने वाले शिव सर्वशक्तिमान परमेश्वर कैसे हो सकते हैँ...

...आगे हमनेँ अत्यंत चौकाने वाले खुलासे किये हैँ जानने के लिये यहाँ किल्क करे...

14 Jul 2015