'माँस' खाना भी हिँसा हैँ तो, "बुध्द धर्म" 'अहिँसावादी' कैसे ?

धम्मपद धम्मपद की गाथा “दण्ड्वग्गो’ मे तथागत बुद्ध कहते है : १२९.

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्चुनो। अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥

सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अंत सभी को अपने जैसा समझ कर न किसी की हत्या करे , न हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

१३०.

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं। अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥

सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अत सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

१३१.

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति। अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो न लभते सुखं॥

जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है ( कष्ट पहुँचाता है ) वह मर कर सुख नही पाता है ।

१३२.

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति। अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो लभते सुखं॥

जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित नही करता है ( कष्ट नही पहुँचाता है ) वह मर कर सुख पाता है ।

स्पष्ट है बुद्ध का मार्ग अहिसंक होते हुये भी मध्यमार्गीय रहा लेकिन वह व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिये पशु हिंसा के पक्ष मे न थे ।

अगर हिम्मत हैँ तो जवाब दो...की अपने सुख की चाह से मास के लिये, जानवर कष्ट पहुँचाने वालोँ क्या मर कर सुख पावोँगे और

क्या बुध्द की राह पर न चलना बुध्द धर्म के मुर्खता की पहचान नहीँ हैँ ?

बुध्द की मृत्यु सूअर का मास खाने से हुई| असल मे बोध्द धर्म मे बुध्द के बाद भिछुको ने अपनी सुविधानुसार परिवर्तन किए थे इसी तरह एक बौध्द भिछु ने किसी चील के मुह से गिरे हुए मास का टुकडा खा लिया ओर ये प्रचार फैला दिया कि पशु को मारना पाप है जबकि मास खाना नही वास्तव मे बुध्द ने कभी मासाहार नही किया ओर न कभी इसका समर्थन किया लेकिन विरोध अवश्य किया है| अब हम आप को बताते है सूअर के मास के पीछै का रहस्य- "चुदस्स भत्त मुजित्वा कम्मारस्साति ये सुतं| आबाधं सम्फुसो धीरो पबाव्ठे मारणान्तिकं| भत्तस्स च सूकर मद्दवेन,व्याधि पवाह उदपादि सत्थुनो| विरेचमानो मगवा आबोच गच्छामहं कुसिनारं नगरंति|{दीर्घ निकाय} इसका भावार्थ है कि चुन्नासा भट्ट ने महात्मा बुध्द को सूकर का मद्दव खिला दिया|उससे उनके पेट मे अति पीडा हुई और उनहे अतिसार हौ गया|तब उनहोने कहा ,"मै कुसीनगर को जाउगा " यहा सूकर मद्दव को लोग सूअर का मास समझते है विशेषकर श्रीलंकाई बोध्दो ने इसे सुअर का मास बताया लेकिन ये सच नही है वास्तव मै यहा सूकर मद्दव पाली शब्द है जिसे हिन्दी करे तो होगा सूकर कन्द ओर संस्कृत मे बराह कन्द यदि आम भाषा मे देखे तो सकरकन्द चुकि ये दो प्रकार का होता है १ घरेलु मीठा२ जंगली कडवा इस पर छोटे सूकर जैसे बाल आते है इस लिए इसे बराह कन्द या शकरकन्द कहते है|ये एक कन्द होता है जिसका साग बनाया जाता है |इसके गुण यह है कि यह चेपदार मधुर और गरिष्ठ होता है तथा अतिसार उत्पादक जिस जगह भगवान बुध्द ने यह खाया ओर उनहे अतिसार हुआ उस गौरखपुर देवरिया की तराई मे उस समय ओर आज भी सकर कन्द की खेती की जाती है| वास्तव मै उसका अर्थ सूअर का मास करना मुर्खता ही है इस तरह अन्य चीजे भी है जैसे एक औषधी अश्वशाल होती है जिसका शाब्दिक अर्थ घौडे के बाल लेकिन वास्तव मे यै औषधिय पौधा होता है इसी तरह अंग्रेजी मे lady finger जिसका अर्थ करे तो औरत की उंगली लेकिन वास्तव मे यह भिंडी के लिए है इसी तरह कुकरमुत्ता जिसका शाब्दिक अर्थ कुत्ते का मूत्र लेकिन ये वास्तव मे एक साग होता है इसी तरह अश्वगंधा जिसका घौडे की गंध लेकिन वास्तव मे ये औषधिए पौधा होता है|

महात्मा बुद्ध एवं माँसाहार महात्मा बुद्ध महान समाज सुधारक थे। उस काल में प्रचलित यज्ञ में पशु बलि को देखकर उनका मन विचलित हो गया और उन्होंने उसके विरुद्ध जन आंदोलन कर उस क्रूर प्रथा को रुकवाया। महात्मा बुद्ध जैसे अहिंसा के समर्थक एवं बुद्ध धर्म के विषय में दो बातें उनके आंदोलन कि मूलभूत आत्मा अहिंसा के विरुद्ध प्रतीत होती हैं। एक महात्मा बुद्ध कि मृत्यु सूअर का माँस खाने से पेट का संक्रमण होने से होना, द्वितीय बुद्ध को मानने वाले अधिकतर देशों में माँस खाया जाना हैं। इस सम्बन्ध में स्वामी दयानंद द्वारा यह कथन सबसे अधिक तर्कसंगत सिद्ध होता हैं कि बुद्ध काल में माँसाहार का प्रचलन नहीं था कालांतर में किसी बुद्ध भिक्षु को किसी पक्षी के मुख से गिरा हुआ माँस का टुकड़ा मिला जिसे उसने खा लिया और वही से इस परिपाटी का प्रचलन हो गया कि कोई भी केवल माँस खाने से पापी नहीं बनता, पापी तो पशु का वध करने वाला होता हैं। इस प्रचलन को देखकर मनु स्मृति का माँसाहार विषय पर एक श्लोक स्मरण हो गया। अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51) अर्थ - अनुमति = मारने की आज्ञा देने, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिए लेने और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले - ये आठों प्रकार के मनुष्य घातक, हिंसक अर्थात् ये सब एक समान पापी हैं। इस श्लोक से स्पष्ट सिद्ध होता हैं कि माँस खाने वाला भी उतना ही पापी हैं जितने पशु हत्या करने वाला पापी हैं। सन्देश यह हैं कि बुद्ध कि पवित्र शिक्षा को मानने वालो को उन्हें यथार्थ में अपने जीवन में ग्रहण करना चाहिए। केवल गेरुआ वस्त्र पहनने और सर मुण्डा कर मठ में रहने भर से व्यक्ति त्यागी और तपस्वी नहीं हो सकता। कोई मुझसे पूछे कि धर्म और अन्धविश्वास में क्या अंतर हैं तो मेरा उत्तर यही होगा कि धर्म सत्य का आचरण हैं जैसा बुद्ध ने निभाया था और अन्धविश्वासी बुद्ध का नाम लेकर माँस खाने वाले बौद्ध लोग हैं जो अज्ञानी हैं। क्या बुद्ध माँसाहारी थे? क्या उनकी मृत्यु सूअर का माँस खाने से हुई थी? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए आर्य विद्वान पंडित गंगा प्रसाद जी उपाध्याय द्वारा लिखित इस शोध पूर्ण लेख से पाठक लाभान्वित हो सकते हैं।

31 Aug 2015