*

जब हुआ जन्म श्रीकृष्ण का तो उनका बालरुप देखकर नमस्कार कर लिया बैठे बैठे ही क्षिराब्धी मेँ श्रीविष्णुजी ने ।





तो कैसे एक हुये श्रीविष्णु और श्रीकृष्ण





जब भगवान श्रीकृष्णजी का जन्म हुआ तो उनका बालरुप देखकर श्रीविष्णुजी ने क्षिराब्धी मेँ बैठे बैठे ही नमस्कार कर लिया तब उसी वक्त श्री लक्ष्मीजी ने पुछा

"हे स्वामी, आपने किसे नमस्कार किया है" ?

तब विष्णुजी ने कहा

"देवी लक्ष्मी मैने जिनको नमस्कार कीया है उनका वर्णन सुनिये,

देवादीदेव निर्गुण निरामय निराकार परमेश्वर ने गोकुल मेँ जन्म लिया है,

उनके बालरुप को देखकर मैने उन्हे नमस्कार किया है, उनके रुप के सामने मेरा ये रुप कुछ भी नहीँ हैँ।"

भगवान के उस रुप का वर्णन सुनकर लक्ष्मीजी श्रीकृष्णजी का वह रुप देखने की आकांक्षा करने लगी तब और हठ करने लगी, तब विष्णुजी ने एक योजना बनायी और मथुरा के एक ब्राम्हण के पुत्र को आकाश मार्ग से अपने धाम क्षिराब्धी को लाने लगे, जन्म के तुरन्त एक के बाद एक बच्चे उडकर आकाश की और जाने लगे तब उस ब्राम्हण ने सातवे पुत्र के वक्त भगवान श्रीकृष्णजी से विनती की उस वक्त भगवान बडे होकर द्वारका के राजा बन गये थे । फिर अर्जुन को लेकर चल पडे क्षिराब्धी की ओर..................

तब भगवान श्रीकृष्णजी को देखकर लक्ष्मीजी अपनी सुध बुध खोकर श्रीकृष्ण के साथ जाने लगी पर विष्णुजी के कहने पर रुक गयी फिर उसके बाद भगवान ब्राम्हण के सात पुत्रो को लेकर आये।


[श्रीमद्भागवत कथासार, दशम स्कन्द (उत्तरार्ध) अध्याय 89, श्लोक 31 से 66]


अब आप ही बताइये क्या विष्णुजी का अवतार श्रीकृष्णजी हो सकते है ? फिर भी



सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥


[गिता अध्याय 11, श्लोक 52] Geeta Link


अर्थात... हे अर्जुन ! मेरा जो रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दर्श है अर्थात्‌ इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं ॥॥



अगला प्रमाण मेँ सिध्द करेँगे की विष्णुजी को भी शाप लगता हैँ...







अगला प्रमाण अगले पेज पर...अगला पेज



Back Page



पेज :- 1 [2] 3 4 5