भगवान श्री दत्तात्रेय परमेश्वर अवतार हैं, फिर भी उन्हेँ क्योँ ब्रम्हा - विष्णू - महेश का अवतार माना जाता हैँ ?

अज्ञानीजन हरीहरब्रह्मा को भगवान श्री दत्तात्रेय महाराज का अवतार मानने की भुल करते हैँ पर सच्चाई कुछ और हैँ ।

एक बार बालरूप में सैंग महाराज क्रीड़ा कर रहे थे। उतने में अनसूया के पास उसके सतित्व की परीक्षा लेने ब्रह्मा, विष्णू तथा महादेव, अपनी स्त्रीयों के कहने पर तीनों रूप बदलकर आये। सती ने अतिथियों का स्वागत किया और भोजन के लिये आग्रह किया। अतिथियों ने भोजन की स्वीकृति दे दी और अपने पास से कंकड़ निकालकर सती की ओर बढ़ाकर कहा- ''देवी! इनकी खीर बना देना और अतिथि भ्रमणार्थ निकल गए। कंकड़ देखकर सती हैरान हुई। उसने मन में सोचा- 'न जाने ब्राह्राण के भेस में ये कौन मेरी परीक्षा लेने आये हैं। लेकिन कंकड़-पत्थर की खीर! असम्भव!! नामुमकिन!!! हे प्रभु! अब क्या होगा। अब तो तुम ही रक्षक हो। यह कहकर सती ईश्वर-चिंतन में खो गयी। सती को ध्यानमग्न देख उसकी सहायता के लिये बालरूप महाराज सैंग रेंगते-रेंगते वहां आये और चुपचाप चूल्हेपर चढ़े कंकड़ों की ओर कृपादृषिट से देखा। देखते ही खीर तैयार हो गयी। ध्यान भंग होते ही सती उदासीन-भाव से चूल्हे के पास आई। खीर तैयार देखकर सती आनंद-विभोर हो गयी। उसने रेंगकर जाते बाल सैंग को उठाकर अपने छाती से लगाया और प्रगाढ़ अलिंगन देकर खूब चूमा। फिर धीरे धीरे कहा- 'पुत्र आज तुमने मेरी लाज रख ली। सती भोजन बनाने में लग गयी और कुछ ही देर पश्चात अतिथि भोजन करने आ बैठे। तीनों अतिथि खीर देखकर चकित हो गये। तब उन्होंने परीक्षा का नया ढंग निकालकर सती से कहा- 'देवी यदि आप नग्न होकर भोजन परोसेंगी, तो हम भोजन करेंगे, अन्यथा नहीं। उनके ऐसा कहते ही बालक सैंग उनके मध्य से निकल पार हो गये। और तिनो ब्रम्हा, विष्णु और महेश को बालक बना दिया सती ने देखा अतिथि बालक बन गये हैं। बच्चों के सामने नग्न होने पर सतीत्वपर किसी प्रकार की आंच नहीं आती। अत: सती ने बाल अतिथियों को भोजन करवाया।

भोजन के पश्चात तीनों बालकों को झूले में डाल सती महिर्ष को बुलाने गयी। महिर्षि सब घटना सुनकर चकित हो गये। भोजन के पश्चात जब महर्षि आराम करने जा रहे थे तब उन्होंने अनसूया की ओर जाती हुई तीन स्त्रीयाँ देखीं। सती अनुसूया द्वार पर लक्ष्मी, सावित्री तथा पार्वती को देखकर ससंभ्रम उनका स्वागत करने उठी। उन्हें आसनपर बिठलाते हुए उसने कहा- 'अहोभाग्य! आज देवियों ने यहाँ पधारने का कष्ट क्यों किया? देवियों ने कहा- 'सती! हम तुमसे क्षमा मांगने और अपने पतियों को लौटा ले जाने को यहा आयी हैं। हमें हमारे पति दे दो। सती ने कहा- 'देवियो! मेरे यहाँ आपके पति ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नहीं पधारे। मैंने उन्हें देखा नहीं। आपको भ्रम हुआ है। तीनों देवियों ने बालकों की ओर अंगुली निर्देश करते हुए कहा- 'वे रहे हमारे पति, देवी! इन्हें लौटाकर हम पर उपकार करो। सती ने कहा- 'ठीक है, लेकिन मैं इस रहस्य को नहीं जानती। यदि यह सत्य है तो आप उन्हें ले जा सकती हैं। उतने में सैंग महाराज फिर से बालकों के बीच से घूमकर निकल गये। तीनों बालक पुन: अपने असली रूप में प्रकट हुए। भगवान सैंग महाराज और सती अनुसूया की अतीव प्रशंसा करते हुए तीनों देवों और देवियों ने उन्हें प्रणाम किया और अपने-अपने लोकों में चले गये। देवियों के प्रति देवों को दान देने वाले को दत्त और अत्रिपुत्र को आत्रेय कहते हैं। इस प्रकार सैंग महाराज का नाम श्री दत्तात्रेय पड़ा। ____________________________________________________________

हिदुं परंपरा मेँ भगवान श्रीदत्तात्रेय को तिन मुख वाले कहा जाता हैँ परंतु वह भी गलत हैँ, क्यो की,

दत्तात्रेयो महायोगी भगवान् भूतभावन:।

चतुर्भुजो महाविष्णुयोगसाम्राज्यदीक्षित ॥

[श्रीजांबालदर्शनोपनिषद]

भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु चतुर्भुज हैँ।

इससे यह सिध्द होता हैँ की भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु को एक मुख हैँ परंतु इससे यह सिध्द नहीँ होता की तिन मुख और छह हाथ हैँ, क्योँ की सबसे पुराना ग्रंथ का प्रमाण मानना पडता हैँ ।

भस्मोध्दुलितसर्वाँग जटाजुटधरं विभुम ।

चुतुर्बाहुमुदाराङ्ग प्रफुल्लकमलेक्षणम् ॥

[शाण्डील्योपनिषद]

इससे भी यह सिध्द होता हैँ की भगवान श्रीदत्तात्रेय प्रभु को एक मुख हैँ, ।

इस प्रकार ब्रह्म को तत्व से जानकर, महानुभाविय सिर्फ एक परमेश्वर को ही भजते हैँ।









कुछ प्रश्न और उनके समाधान