पंढरपुर (महाराष्ट्र) के 'विठ्ठल' को "भगवान श्रीकृष्ण" का अवतार बतलना मुर्खता या मजाक...

मैँने विठ्ठल वाली मनघडन कहानी पर रिसर्च की ही  अब आप से सवाल करता हुं ।

(1) ये बात तो आप को पता ही होगी की भगवान ने गिता के 4 थे अध्याय के 7 वे श्लोक मेँ कहा हैँ की

"हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ ॥4-7॥

साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ॥4-8॥"

(1) अब सवाल पैदा होता हैँ की

विठ्ठल अवतार किस युग मेँ हुआ ?

(2) जब विठ्ठल अवतार हुआ तब कौन से धर्म की हानि और कौन से अधर्म की वृद्धि हुयी थी ?

(3) विठ्ठल अवतार ने किन साधु पुरुषों का उद्धार किया ?

(4) तथा विठ्ठल अवतार ने कौन से पाप कर्म करने वालों का विनाश किया ?

(5) और विठ्ठल अवतार ने कौन से धर्म की स्थापना की ?

भगवान श्रीकृष्णने भक्त पुडलिक मेँ दर्शन दिये । लेकिन यह तो भक्तिभाव में कही गई बाते हैं, इनमें तथ्य कहां है? इतिहास अलौकिक बातों से नहीं बनता। ऐसी बातें करने वालों को झूठा माना जाता है और ऐसे ही लोग तो धर्म की प्रतिष्ठा गिराते हैं।

ये कहानी मनघडन है इसमेँ तथ्य कहां हैँ. कहा से पढी

4 वेद 6 शात्र 18 पुराण 52 उपनिशद 108 कठोपनिशद 1 आगम 1 निगम 4 उपन्यास 1 महाभारत 1 गिता कहा पढा बताओ ?

[पुंडलिक माता-पिता के परम भक्त थे। एक दिन पुंडलिक अपने माता-पिता के पैर दबा रहे थे कि श्रीकृष्ण रुक्मिणी के साथ वहां प्रकट हो गए, लेकिन पुंडलिक पैर दबाने में इतने लीन थे कि उनका अपने इष्टदेवकी ओर ध्यान ही नहीं गया। तब प्रभु ने ही स्नेह से पुकारा, 'पुंडलिक, हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं।' पुंडलिक ने जब उस तरफ दृष्टि फेरी, तो रुक्मिणी समेत सुदर्शन चक्रधारी को मुस्कुराता पाया। उन्होंने पास ही पड़ी ईंटें फेंककर कहा, 'भगवन! कृपया इन पर खड़े रहकर प्रतीक्षा कीजिए। पिताजी शयन कर रहे हैं, उनकी निद्रा में मैं बाधा नहीं लाना चाहता #1। कुछ ही देर में मैं आपके पास आ रहा हूं।' वे पुनः पैर दबाने में लीन हो गए। पुंडलिक की सेवा और शुद्ध भाव देख भगवान इतने प्रसन्न हो गए कि कमर पर दोनों हाथ धरे तथा पांवों को जोड़कर वे ईंटों पर खड़े हो गए #2। किंतु उनके माता-पिता को निद्रा आ ही नहीं रही थी। उन्होंने तुरंत आंखें खोल दीं। पुंडलिक ने जब यह देखा तो भगवान से कह दिया, 'आप दोनों ऐसे ही खड़े रहे' और वे पुनः पैर दबाने में मग्न हो गए। भगवान ने सोचा कि जब पुंडलिक ने बड़े प्रेम से उनकी इस प्रकार व्यवस्था की है, तो इस स्थान को क्यों त्यागा जाए? और उन्होंने वहां से न हटने का निश्चय किया। पुंडलिक माता-पिता के साथ उसी दिन भगवत्‌धाम चले गए, किंतु श्रीविग्रहके रूप में ईंट पर खड़े होने के कारण भगवान 'विट्ठल' कहलाए और जिस स्थान पर उन्होंने अपने भक्त को दर्शन दिए थे, ।]

#1 भगवान श्रीकृष्ण गिता 12 वे अध्याय के श्लोक 2 से 8 मेँ कहते हैँ,

श्री भगवान बोले- (माता पिता में नहीँ1) मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं ॥12-2॥ परन्तु जो सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं (माता पिता में नहीँ2) , वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं ॥12-3,4॥ परन्तु (माता पिता में नहीँ3) जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके (माता पिता में नहीँ) मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। ॥12-6॥ हे अर्जुन! उन (माता पिता में नहीँ4) मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ ॥12-7॥ (माता पिता में नहीँ5) मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥12-8॥

उपर वाले श्लोक Note 1,2,3,4,5, मे भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ की 1. मुझमें मन को एकाग्र करके, 2. मुझमेँ ध्यान करते हुए भजते हैं, 3. जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन, 4. मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों, 5. मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा तो,

फिर ये माता पिता मेँ (1-5) मन लगने वाला पुडंलिक भक्त कैसे हो सकता हैँ ? और भगवान उसे किस आधार पर दर्शन दे सकते हैँ,

हे पार्थ ! बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है ॥7-19॥

और ये पुडलिक तो स्वयं वासुदेव आने के बाद भी माता पिता के पैर दबाने मेँ मग्न था फिर ये भक्त दर्शन देने योग्य किस प्रकार हैँ ?

#2 - क्या पुंडलिक ईंटें लेकर हीँ बैठा था ?

बैठा भी होगा तो फिर 'पंढरपुर' मेँ "विठ्ठल" का मंदिर "पुडंलिक" के मंदिर से 1 KM के दुर पर स्थित हैँ, अगर कोई भी पथ्थर भी फेंके तो इतनी दुर नही जाता फिर ईंटें कैसे चली गयी, और अगर ईंटें फेँकी भी होगी तो भी "विठ्ठल" के मंदिर के पास पुंडलिक का मंदिर क्यो नहीँ हैँ ।

इससे ये साबित होता हैँ की ये "विठ्ठल" वाली कहानी मनघडन हैँ।

16 Jun 2015