क्या परमेश्वर का अंश जिवात्मा है ? क्या इसांन ही परमेश्वर हैँ ?

हिँदु धर्म अथवा, ईश्वर पर श्रद्दा रखने वाला समाज हर कोई "अहं ब्रह्मास्मि" वाले बेतुके बयान पर जाकर स्वंय को हीँ ब्रह्म मानकर चलते हैँ, और जिवात्मा को भगवान का अंश मानता हैँ, पर भगवान श्रीकृष्ण के गिता मेँ कहेँ गये वचन पर गौर कर तो परमात्मा शरीर मेँ व्याप्त होकर भी लिपायमान नहीँ होँता,

भगवान श्रीकृष्ण ने गिता के अध्याय 15 श्लोक 7 मेँ जिवात्मा को परमात्मा का वंश कहा हैँ किंतु बडे से बडे तत्वज्ञानी भी विचलित होकर अज्ञानीओँ की तरह बाते करते हैँ।

हम आपको समझाते हैँ ।

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।

मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

(गिता 15-7)

इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन वंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है ॥15-7॥

(जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटों में पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतों में एकीरूप से स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, इसी से देह में स्थित जीवात्मा को भगवान ने अपना 'सनातन वंश' कहा है)

जैसे भगवान चौदहवे अध्याह के तिसरे और चौथे श्लोक कहते की प्रकृति तो तुम सबकी (सभी जिवत्माओँकी) गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ

इसलिये मैँ सबका परम पिता हुँ । अत: जैसे 'पिताका' "वंश" का 'पुत्र' होता हैँ, वैँसे ही जिव समुदाय मेरा "वंश" हैँ, अंश नहीँ क्योँकी अंश याने तुकडा होता हैँ तथा जिवात्मा परमेश्वर का तुकडा कैसे हो सकता हैँ (इसिलिये, ममैवांशो का अर्थ मेरा वंश होता हैँ), परंतु गिता टीकाकार और सारे तत्वज्ञानी इस बात को स्पष्ट नहीँ कर पाये इसिलिये इ.स. 1221 मेँ परमेश्वर को श्रीचक्रधर स्वामी के रुप मेँ अवतार लेकर जिवोँको मार्गदर्शन करना पडा ।

आगे और प्रमाण हैँ जैसे

हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है ॥13-31॥

जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता ॥13-32॥

मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ ॥9-4॥

वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है ॥9-5॥

जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान्‌ वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान किँतु मै उनमेँ नहीँ ॥9-6॥

हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है ॥7-7॥

हे भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको क्षर (जिवात्मा) और अक्षरो (देवी-देवता) से उत्तम सर्वशक्तीमान तथा अच्युत पद प्रदान करनेवाला परब्रम्ह परमेश्वर के रुप मेँ जानता हैँ वो सब कुछ जाननेवाला पुरुष, सब प्रकार से सिर्फ मेरा ही स्मरण करता हैँ, और सिर्फ मेरी ही भक्ती करता है ॥15-19॥

हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए एकदेश से अर्थात्‌ संक्षेप से कहा है ॥10-40॥

जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान ॥10-41॥

अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रायोजन है। मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ ॥10-42॥

भगवान इस कथन का आशय सब सभी शोभायुक्त वस्तुओँ को विभुतीयोँको बताना था । पर इसका मतलब ये नहीँ की परमात्मा ही जिवात्मा का अंश हैँ और परमात्मा ही जिवात्मा हैँ या फिर ब्रह्म हम ही हैँ।



कुछ प्रश्न और उनके समाधान