जगत गुरु भगवान श्री दत्तात्रेय महाराज जी के चौबीस गुरु (उध्दवगीता)

[17] पिंगला (वैश्या) :-

पिंगला वेश्या जब तक युवा रही तब तक उसके अनेक ग्राहक रहे ! लेकिन वृद्ध होते ही वे सब साथ छोड़ गए ! रोग और गरीबी ने उसे घेर लिया ! लोक में निंदा और परलोक में दुर्गति देखकर मैने सोचा की समय चूक जाने पर पछताना ही बाकी रह जाता है ,सो समय रहते ही वे सत्कर्म कर लेने चाहिये जिससे पीछे पश्चाताप न करना पड़े ! अपने पश्चाताप से दूसरों को सावधानी का सन्देश देने वाली पिंगला भी मेरे गुरु पद पर शोभित हुई ! पिंगला वैश्या से भोग विलासोँ से दुर रहने की शिक्षा मिलती हैँ ।

[18] कुरुरु (पक्षी) :-

कुरुरु नामक एक पक्षी था जो मछली को पकड कर उड रहा था । उसके पिछे सभी पक्षी उडकर उन्होने उसे नखो से घायल कर दिया कुरुरु ने मछली को छोड दिया । सभी पक्षी उसी मछली पर झपट तथा आपस मेँ लडने लगेँ । परन्तु कुरुरु पक्षी मछली का त्याग कर शांति पुर्वक बैठ गया। श्रीदत्तात्रेय महाराज ने भी संसार मेँ निष्कंचन रहने की शिक्षा ग्रहण की ।

[19] अबोध बालक :-

राग ,द्वेष ,चिंता ,काम ,लोभ ,क्रोध से रहित जीव कितना कोमल ,सोम्य और सुन्दर लगता है कितना सुखी और शांत रहता है यह मनुष्य को नन्हे बालक गुरु से जानना चाहिये !

[20] ब्राह्मण कन्या (स्री) :-

एक महिला चूडियाँ पहने धान कूट रही थी ,चूड़ियाँ आपस में खड़कती थीं ! वो चाहती थी की घर आये मेहमान को इसका पता ना चले इसलिए उसने हाथों की बाकी चूड़ियाँ उतार दीं और केवल एक एक ही रहने दी तो उनका आवाज करना भी बंद हो गया ! यह देख मेने सोचा की अनेक कामनाओ के रहते मन में संघर्ष उठते हैं ,पर यदि एक ही लक्ष्य परमेश्वर को प्राप्त होता नियत कर लिया जाए तो सभी उद्वेग शांत हो जाएँ ! जिस स्त्री से ये प्रेरणा मिली वो भी मेरी गुरु ही तो है !

[21] सेलारा (लौहार) :-

लुहार अपनी भट्टी में लोहे के बाणोँ की धार तेज कर रहा था । उसके घर के आगे से जा रहे राजा की सवारी निकली परन्तु उसका मन शस्त्रो की धार तेज करने मेँ ऐसा लगा हुआ था कि उसने राजा की सवारी को देखा ही नहीँ। इसी प्रकार एक साधक को एक चित्त होकर परमेश्वर के नाम का स्मरण करना चाहिए। !

[22] सर्प (सांप) :-

दूसरों को त्रास देता है और बदले में सबसे त्रास ही पाता है यह शिक्षा देने वाला भी मेरा गुरु ही है जो यह बताता है की उद्दंड ,आतताई, आक्रामक और क्रोधी होना किसी के लिए भी सही नहीं है !

[23] कांतीण ( मकडी) :-

मकड़ी अपने पेट में से रस निकाल कर उससे जाला बनाती हैँ । जीव भी माया के अधीन होकर मकड़ी की जाल की तरह प्रपंच की रचना करता हैँ तथा वह यहाँ अच्छे बुरे कर्म करता हैँ। वह परमेश्वर की तरफ जाने का प्रयत्न नहीँ करता । अपितु वह नरकोँ प्राप्त होता हैँ। इसिलीये संसार मकड़ी का जाल हैँ यह शिक्षा मकड़ी से प्राप्त होती हैँ ।

[24] भिंगरुटी (भुंगा किडा) :-

भ्रंग कीड़ा एक झींगुर को पकड़ लाया और अपनी भुनभुनाहट से प्रभावित कर उसे अपने जैसा बना लिया ! उसी प्रकार परमेश्वर की प्रती एकाग्रता और तन्मयता के द्वारा मनुष्य मोक्ष पाने मेँ सफल हो सकता है ! इस प्रकार भ्रंग भी मेरा गुरु बना !

24 गुरुओ का वृत्तान्त सुना कर भगवान श्रीदत्तात्रेय ने राजा से कहा -- गुरु बनाने का उद्देश्य जीवन के प्रगति पथ पर अग्रसर करने वाला प्रकाश प्राप्त करना ही तो है ! और यह कार्य अपनी विवेक बुद्धि के बिना संभव नहीं है ! इसलिए सर्वप्रथम गुरु है - विवेक ! उसके बाद ही अन्य सब ज्ञान पाने के आधार बनते हैं !

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