जगत गुरु भगवान श्री दत्तात्रेय महाराज जी के चौबीस गुरु (उध्दवगीता)

[9] आरु (अजगर सांप) :-

शीत ऋतु में अंग जकड जाने और वर्षा के कारण मार्ग अवरुद्ध रहने के कारण भूखा अजगर मिटटी खा कर काम चला रहा था और धेर्य पूर्वक दुर्दिन को सहन कर रहा था ! उसकी इसी सहनशीलता ने उसे मेरा गुरु बना दिया ! मनुष्य को भी जो मिले उसमे सन्तुष्ट रहना चाहिये ।

[10] उदधी (समुद्र) :-

जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं ।

[11] पतंग (किटक) :-

जैसे पतंग जलते हुये दीपक की ओर जाकर लौ पर जलकर मर जाता हैँ उसी प्रकार एक विकार दोष के अधीन होकर जो स्त्री के सोन्दर्य से आकर्षित होकर भोगोँ मे रममाण हो जाता हैँ उसकि बुध्दी नष्ट हो जाती हैँ ! इसलिये जलते पतंगे को जब मैने गुरु माना हैँ ।

[12] भ्रमर (भंवरा) :-

राग में आसक्त भोंरा अपना जीवन -मरण न सोच कर कमल पुष्प पर ही बैठा रहा ! रात को हाथी ने वो पुष्प खाया तो भोंरा भी मृत्यु को प्राप्त हुआ ! राग ,मोह में आसक्त प्राणी किस प्रकार अपने प्राण गँवाता है ! अपने गुरु भोंरे से यह शिक्षा मैंने ली !

[13] गज (हाथी) :-

बलवान से बलवान व्यक्ति भी स्त्री के संग से नष्ट हो जाता हैँ। कामातुर हाथी मायावी हथनियों द्वारा प्रपंच में फँसा कर बंधन में बाँध दिया गया और फिर आजीवन त्रास भोगता रहा ! यह देख कर मैंने वासना के दुष्परिणाम को समझा और कामवासना के लिये स्त्री के पिछे नहीँ भागना चाहिये ये शिक्षा हाथी से प्राप्त होती हैँ ।

[14] मधुवाँ (मधुमक्खी) :-

जैसे मधुमक्खी फूलों का रस संचय करके शहद बनाती है, उसी प्रकार संसार मेँ एक व्यक्ति अनेक वस्तुओँ का संग्रह करता चला जाता हैँ जिससे उसका मन भगवान के स्मरण करने मेँ नहीँ लगता और न ही उसे मोक्ष प्राप्त होता हैँ । वह वस्तुयेँ संग्रह करते-करते उनमेँ हीँ फसकर मर जाता हैँ यह शिक्षा मधुमक्खी से प्राप्त होती हैँ ।

[15] कृष्णसार (हिरन) :-

कानों के विषय में आसक्त हिरन को शिकारियों के द्वारा पकडे जाते हैँ उसी प्रकार मनुष्य भी कर्ण इन्द्रियोँ के आकर्षण से नाश को प्राप्त होता हैँ।

[16] मीन (मछली) :-

जैसे एक मछली जीभ के स्वाद के कारण लोलुप होकर मछुए के जाल में फँसकर तड़प कर मर जाती है देखा उसी प्रकार इंद्रियलिप्सा के क्षणिक आकर्षण में जीव का कितना बड़ा अहित होता है ,इससे बचे रहना ही बुद्धिमानी है !



आगे जारी हैँ...