जगत गुरु भगवान श्री दत्तात्रेय महाराज जी के चौबीस गुरु (उध्दवगीता)

भगवान श्रीदत्तात्रेय महाराज यह सन्देश देते हैँ कि संसार की कुछ घटनाओँ से भी मनुष्य अनेक शिक्षायेँ ग्रहण कर इस जीवन का सुधार कर सकता हैँ ।

भगवान श्रीदत्तात्रेय जी ने चौबीस गुरु धारण किये जो की उन्होने राजा यदु को बताकर ज्ञानोपदेश किया। वे चौबीस गुरु इस प्रकार है और इसे ही उध्दव गिता कहते हैँ।

परम तेजस्वी अवधूत श्रीदत्तात्रेय का दर्शन पाकर राजा यदु ने अपने को धन्य माना और विनयावनत होकर पूछा -- " आपके शरीर ,वाणी और भावनाओं से प्रचंड तेज टपक रहा है ! इस सिद्धावस्था को पहुँचाने वाला ज्ञान आपको जिन सदगुरु द्वारा मिला हो उनका परिचय मुझे देने का अनुग्रह कीजिये "! भगवान श्रीदत्तात्रेय ने कहा --"राजन! सदगुरु किसी व्यक्ति विशेष को नहीं मनुष्य के गुणग्राही दृष्टिकोण को कहते हैं ! विचारशील लोग सामान्य वस्तुओं और घटनाओं से भी शिक्षा लेते और अपने जीवन में धारण करते हैं ! अतएव उनका विवेक बढ़ता जाता है ! यह विवेक ही सिद्धियों का मूल कारण है ! अविवेकी लोग तो ब्रह्म के समान गुरु को पाकर भी कुछ लाभ उठा नहीं पाते !इस संसार में दूसरा कोई किसी का हित साधन नहीं करता , उद्धार तो अपनी आत्मा के प्रयत्न से ही हो सकता है ! मेरे अनेक गुरु हैं , जिनसे भी मैंने ज्ञान और विवेक ग्रहण किया है उन सभी को मै अपना गुरु मानता हूं ! पर उनमे 24 गुरु प्रधान हैं ,ये हैं ---

[1] पृथ्वी (धरती) :-

सर्दी ,गर्मी ,बारिश को धेर्यपूर्वक सहन करने वाली ,लोगों द्वारा मल -मूत्र त्यागने और पदाघात जैसी अभद्रता करने पर भी क्रोध ना करने वाली ,अपनी कक्षा और मर्यादा पर निरंतर ,नियत गति से घूमने वाली पृथ्वी को मैंने गुरु माना है ! अतः मनुष्य को परोपकार का जीवन ही सच्चा जीवन हैँ।

[2] आकाश (गगन) :-

अनंत और विशाल होते हुए भी अनेक ब्रह्मांडों को अपनी गोदी में भरे रहने वाले ,ऐश्वर्यवान होते हुए भी रंच भर अभिमान ना करने वाले आकाश को भी मैंने गुरु माना है ! उसी प्रकार मनुष्य संसार रुपी कीचड़ मेँ फँसकर भी कमल के समान इनसे अछुता रहता है तो वह महान हैँ।

[3] जल (पानी) :-

सब को शुद्ध बनाना ,सदा सरल और तरल रहना , आतप को शीतलता में परिणित करना ,वृक्ष ,वनस्पतियों तक को जीवन दान करना ,समुद्र का पुत्र होते हुए भी घर घर आत्मदान के लिए जा पहुंचना -इतनी अनुकरणीय महानताओ के कारण जल को मैंने गुरु माना ! जो ब्रम्हविद्या ज्ञान बोलता हैँ वह पानी के समान शुध्द निर्मल होता हैँ तथा दुसरो को ज्ञान सुनाकर शुध्द निर्मल कर देता है । जैसे धुल लगने पर पानी से धोकर उसे स्वच्छ किया जाता हैँ इसी प्रकार इस अन्तःकरण को शुध्द निर्मल बनना चाहिए ।

[4] वायु (हवा) :-

अचल (निष्क्रिय ) होकर ना बेठना , निरंतर गतिशील रहना ,संतप्तों को सांत्वना देना ,गंध को वहन तो करना पर स्वयं निर्लिप्त रहना ! ये विशेषताएं मैंने पवन में पाई और उन्हें सीख कर उसे गुरु माना ! जैसे वायु गंध और दृगंध को समान मानकर उनका वहन करता हैँ उसी प्रकार मनुष्य को भी सुख-दुःख, लाभ-हानी, जय-पराजय, सरदी-गरमी और मान-अपमान को भी समान मानना चाहिये ।

[5] अग्नि (आग) :-

निरंतर प्रकाशवान रहने वाली , अपनी उष्मा को आजीवन बनाये रखने वाली , दवाव पड़ने पर भी अपनी लपटें उर्ध्वमुख ही रखने वाली ,बहुत प्राप्त करके भी संग्रह से दूर रहने वाली ,स्पर्श करने वाले को अपने रूप जैसा ही बना लेने वाली ,समीप रहने वालों को भी प्रभावित करने वाली अग्नि मुझे आदर्श लगी ! और तपस्वी भी अग्नी की भांति सांसारिक लोगो के साथ घुल-मिल नहीँ जाता ।

[6] चन्द्रमा (चाँद) :-

अपने पास प्रकाश ना होने पर भी सूर्य से याचना कर पृथ्वी को चांदनी का दान देते रहने वाला परमार्थी चन्द्रमा मुझे सराहनीय लोक-सेवक लगा ! विपत्ति में सारी कलाएं क्षीण हो जाने पर भी निराश होकर ना बेठना और फिर आगे बढ़ने के साहस को बार -बार करते रहना धेर्यवान चन्द्रमा का श्रेष्ठ गुण कितना उपयोगी है ,यह देख कर मैंने उसे अपना गुरु बनाया !

[7] सुर्य (सुरज) :-

नियत समय पर अपना नियत कार्य अविचल भाव से निरंतर करते रहना ,स्वयं प्रकाशित होना और दूसरों को भी प्रकाशित करना ,नियमितता ,निरंतरता ,प्रखरता और तेजस्विता के गुणों ने ही सूर्य को मेरा गुरु बनाया । जैसे सुर्य निकलने से अंधकार नष्ट होकर प्रकाश होता वैसे परमेश्वर ज्ञान प्राप्त करने से ही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त हो सकता हैँ ।

[8] कपोत (कबुतर) :-

पत्नी और बच्चे बिछे हुए जाल में फसेँ देखकर कबूतर भी जाल में फँस कर अपनी जान गवां बैठा ! यह देख कर की अपने सम्बन्धियोँ के मोह मेँ फस कर पतन होता है, इसिलिये संसार से मोह ममता दुःख का कारण बन जाती हैँ। यह शिक्षा देने वाला कबूतर भी मेरा गुरु ही तो है !



आगे जारी है...