...तो क्या श्रीराम भी हिरण के रुप मे आये मरीच राक्षक को नहीँ पहचान सकते थे ?





* प्रमाण दुसरा *


जब रावण ने सिताजी का हरण कर लिया था, तब जब श्रीराम लक्ष्मण वापस आये तो श्रीराम ने अपना दुखः लक्ष्मण के सामने कुछ इस प्रकार से प्रकट किया।





नम: द्विधा दुष्कृत कर्मकारी । मन्यो द्वितीयो स्त वसुंधरायाम्॥
शोकानुशोको हि परंपराया । मामेति भिन्दं हृदयं मनश्च ॥1॥

पूर्व मया नूनमभीप्सितानि। पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि॥
तत्राय मद्दा पतितो विपाको । दु:खेन दु:खं यदहं विशामि॥2॥

सर्वतु दु:खं मम लक्ष्मणेवम्। शान्तं शरीरे वनमेत्य क्लेशम्॥
सीतावियोगात पुनरभ्यु दीर्घम्। कष्टैरिवाग्नि: सहसो प्रदीप्त: ॥3॥


वाल्मिकी रामायण - सिता हरण कांड





इस श्लोक के अनुसार रावणद्वारा सीताहरण होने पर श्रीराम अपना दुख लक्ष्मण के पास कुछ इस प्रकार प्रकट करते है।



"हे लक्ष्मण इस सृष्टी मेँ मेरे जैसा कोई दुसरा पापी मुझे दिखता नही, क्योकी, सांप्रत पुर्व पापाचरण की परंपरा के कारण मेरा मन विदारण हो रहा है और पुर्व जन्मकृत कर्मो के कारण आज मुझे दु:खरुपी भोग भोगने पड रहे है, माता पिता का व राज्य का वियोग होने के कारण दु:ख से वन मेँ आकर रहने से क्लेश थोडा कम हो गया था, लेकीन फिर से सीता के वियोग के कारण काष्ठ को अग्नी लगने की भांती इस देह मे दु:खो का भडका उमड रहा है । "





अब देखीये भगवान श्रीकृष्ण इसके उलट गिता मेँ क्या कहते है



न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफल स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥

गिता अध्याय 4, श्लोक 14. Geeta Link



अर्थात की हे अर्जुन, मैँ निष्पाप और शुध्द हुँ, मुझे किसी भी प्रकार का कर्म करणे की इच्छा नहीँ होती और पुण्य तथा पापरुपी कर्म मुझे नहीं लगते ।





तथा भगवान आगे कहते हैँ

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥
गिता अध्याय 3, श्लोक 22. Geeta Link



अर्थात की हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ॥



दोनोँ अवतारोँ के कहने मे विचारोँ कितनी भिन्नता है, एक तरफ श्रीराम अपने आप को पापी तथा कर्मफल भोगने वाला कह रहेँ हैँ, और दुसरी तरफ भगवान श्रीकृष्ण अपने आप को निष्पाप और अभोगता कह रहेँ है तथा भगवान श्रीकृष्ण को तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, और भगवान श्रीकृष्ण ने 11000 हजार राक्षसो को उनके रुप मे पहचान कर वध कर डाला, तो क्या श्रीराम भी हिरण के रुप मे आये मरीच राक्षक को नहीँ पहचान सकते थे। फिर भी क्या दोनोँ एक हो सकते है ? और आगे बडे खुलासे हमने किये आप बस पढते रहिये।





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