अगर "श्रीविष्णु" और "श्रीकृष्ण" अलग अलग हैँ, तो भगवान ने गिता मेँ मैँ ही 'राम' या 'विष्णु' हुं ऐसा क्योँ कहा है ?



अगर विष्णु और श्रीकृष्ण अलग अलग हैँ, तो भगवान ने गिता मेँ मैँ ही 'राम' या 'विष्णु' हुं ऐसा क्योँ कहा है ? (भाग - 2)


और भगवान आगे कहते हैँ की, छल करने वाले मेँ जुआ मैँ हुँ तो क्या जुआ श्रीकृष्ण कैसे हो गया।

इन सभी विभुतीओँको अर्थात, {बारा आदित्यो मेँ एक विष्णु नाम का सुर्य, इंद्र, मन, चेतना, शंकर, कुबेर, अग्नी, मेरुपर्वत, बृहस्पती, कार्तिकेय, समुद्र, भृगृमहर्षी, पिपलवृक्ष, नारद, चित्ररथ गंधर्व, कपीलमुनी, उच्चैश्रवा, ऐरावत, राजा, वज्र, कामधेनु, कामदेव, सर्पराज वासुकी, शेषनाग, अर्यमा पीतर, यमराज, प्रल्हाद, काल, सिँह, गरुड, वायु, राम, मगरमच्छ, गंगा, ब्रम्हविद्या, तत्ववाद, अ कार, द्वंद्व समास, मृत्यु, किर्ती, लक्ष्मी, वाणी, स्मरणशक्ती, बुध्दी, धैर्य, क्षमा, ब्रम्हसाम, गायत्रीमंत्र, मार्गशीर्ष, महीना, वसंत ऋतु, जुआ, तेज, विजय, निश्चय, सात्विक भाव, यादवोँमेँ बलराम, अर्जुन, व्यास, उशना कवी, दंड, नीती, मौन, ज्ञान} मैँ हुँ।

इन सभी विभुतीओँ को परमेश्वर मानकर इनकी पुजा किस प्रकार की जा सकती हैँ। भगवान को ये विभुती बताने के पिछे कारण ये हैँ की,

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥40॥ यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥41॥ अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌ ॥42॥ wml: गिता अध्याय 10, श्लोक 41... Geeta Link

हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए एकदेश से अर्थात्‌ संक्षेप से कहा है॥40॥ जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान॥41॥ अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रायोजन है। मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ॥42॥

भगवान श्रीकृष्ण के इस कथन की "राम मैँ हुं" ये सब सभी शोभायुक्त वस्तुओँ को विभुतीयोँको बताना था । पर इसका मतलब ये नहीँ की

भगवान श्रीकृष्ण

श्रीराम और श्रीविष्णू के अवतार हैँ।



कुछ प्रश्न और उनके समाधान