"वैकुंठ" और 'श्रीकृष्ण' के "परमधाम" मेँ क्या अतंर है ?



वैकुंठ और श्रीकृष्ण के परमधाम मेँ क्या अतंर है ?


वैकुठ पर जाने से किसी भी जिव मोक्ष नहीं मिल सकता बल्की भगवान श्रीकृष्णजी ने अपने परमधाम के बारे मेँ कहा हैँ।

हे अर्जुन! जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है ॥6॥ गिता अध्याय 15, श्लोक 6. Geeta Link

हे अर्जुन! ब्रह्मलोक सहीत सभी लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं॥16॥ गिता अध्याय 8, श्लोक 16. Geeta Link

हे अर्जुन! अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है॥21॥ गिता अध्याय 8, श्लोक 21. Geeta Link

तो आईये, धामोँ का सरल अंतर जानते हैँ।

* परमधाम *

(1) यहां के रहिवासी श्रीकृष्ण हैँ।

(2) यहां से पुर्नजन्म पतन नहीँ हैँ।

(3) यहां का सुख नित्य अक्षय हैँ।

(4) ये स्थान चैतन के उपर हैँ।

(5) परमधाम सर्वोच्च यानी सबके उपर हैँ।

(6) परमधाम स्वंयम् प्रकाशित हैँ।

* वैकुंठ धाम *

(1) यहां के रहिवासी 'सहज विष्णू' हैँ।

(2) यहां से पुर्नजन्म पतन हैँ।

(3) यहां का सुख नित्य अक्षय नहीँ हैँ।

(4) ये स्थान स्वर्ग के उपर हैँ।

(5) वैकुंठ के उपर कैलास हैँ।

(6) वैकुंठ को सुर्य और चंद्र प्रकाशित करते हैँ।

दोनोँ धामोँ का अंतर लक्ष केद्रित करणे योग्य है। आगे आप समझदार हैँ।


कुछ प्रश्न और उनके समाधान