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"परमेश्वर भक्ती" और "देवता भक्ती" मेँ क्या हैँ अतंर ?





देवता भक्ति अर्थात मिश्र भक्ति





अगर अब भी आप के आंखो पर से अज्ञान का पडदा नहीँ हटा तो जान लिजीये भगवान क्या कहते हैँ...


काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।

क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥


[गिता 4-12]


अर्थात... इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है


इससे यहीँ प्रतित होता हैँ की कर्मफल चाहने वाले सकाम भक्त देवताओँ कार्यसिद्धि के लिये भजते हैँ उनसे हमेँ मोक्ष नहीँ मिल सकता और भगवान ने कहा हैँ की "कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है" ॥GEETA 5-12॥

तथा इससे भी यहीँ सिद्ध होता हैँ की सकाम देवता भक्ति अलग हैँ और निष्काम परमेश्वर भक्ति अलग हैँ...





दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।

ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥


[गिता 4-25]


अर्थात... दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शनरूप यज्ञ द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं।

(परब्रह्म परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होना ही ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ को हवन करना है।)


इससे यह सिद्ध हो गया हैँ की देवता और परमेश्वर भक्ति भिन्न हैँ और वह एक साथ नहीँ की जा सकती...






परब्रह्म परमेश्वर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ...


मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण: ॥


[गिता अध्याय 9, श्लोक 34] Geeta Link


अर्थात... हेँ अर्जुन ! मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझको प्रणाम कर। इस प्रकार आत्मा को मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा



मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥


[गिता अध्याय 18, श्लोक 65] Geeta Link


हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है


सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥


[गिता अध्याय 18, श्लोक 66] Geeta Link


अर्थात... हे अर्जुन! सभी धर्मों का सर्वसंग परीत्याग करके तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर के मोक्ष दुँगा, तू शोक मत कर





भगवान श्रीकृष्णजी के वचनोँ से यह प्रतित होता हैँ की, देवता भक्ती और परमेश्वर भक्ती मेँ जमीन ओर आसमान का र्फक हैँ।





और "देवी-देवताओ" की असल संख्या तथा उनके स्थान जानने के लिये...यहां किल्क करे।









अगले प्रमाण मेँ सिद्द करेँगे की परमेश्वर की भक्ति के साथ साथ देवता भक्ति करना एक वेश्या की तरह हैँ...







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