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परमेश्वर हैँ देवताओंका भी आदि अंत और मध्य...





देवता करते हैँ, परमेश्वरके रुप की आकांशा





जो अज्ञानी लोग देवताओँको परमेश्वर का रुप समझकर पुजते हैँ वह तो अल्पबुद्दी हैँ ये आप ने पिछले प्रमाण मेँ समझ लिया, परंतु फिर भी आप वैसा ही समझ रहे हैँ तो जानिये देवता भी परमेश्वर के रुप को देखने की नित्य आकांक्षा करते हैँ...


सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥


[गिता अध्याय 11, श्लोक 52] Geeta Link


अर्थात... हे अर्जुन ! मेरा जो ये रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दर्श है अर्थात्‌ इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं ॥


तो आप ही बताईये अगर परमेश्वर और देवता एक ही हैँ, तो देवताओँको अपना ही रुप देखने की आकांक्षा क्योँ करनी पडेगी...?

इससे यहीँ सिद्द होता हैँ की अन्य देवता और परमेश्वर अलग अलग हैँ...





तथा परब्रम्ह परमेश्वर तो देवताओँ का भी आदी अंत और मध्य हैँ...


न मेँ विदू: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय: ।

अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश: ॥


[गिता अध्याय 10, श्लोक 2] Geeta Link


अर्थात, "हे अर्जुन ! मेरी उत्पत्ति को अर्थात लीलासे प्रकट होने को न देवता लोग जानते है और न महर्षिजन भी जानते है, क्योँकीँ मैँ सब प्रकार से देवताओँका और महर्षिओँका भी आदी अंत और मध्य मै हूँ" ।


अगर परमेश्वर और देवता एक हैँ तो देवता अपनी ही उत्पत्ति को अर्थात लीलासे प्रकट होने को क्यो नहीँ जान पाते...?

तथा भगवान कहते हैँ की मैँ सब प्रकार से देवताओँका और महर्षिओँका भी आदी अंत और मध्य मै हूँ तो देवता और परमेश्वर को कैसे एक माना जा सकता हैँ...





अगर आप देवता और परमेश्वर को अलग मानने पर मजबुर होँ गये हैँ तो आप कहेँगेँ की देवताओँ की भक्ति मेँ क्या बुराई हैँ...?

जी, लेकिन देवताओँके परमेश्वर मानकर पुजना गलत उस भक्त को भगवान अल्पमेधसाम अर्थात अल्पबुद्धी (गिता 7-22) कहते हैँ...

तथा देवताओँ की पुजा मेँ क्या हानी हैँ...?

तो जवाब ये हैँ की देवताओँ की पुजा से हमे मोक्ष नहीँ मिल सकता देवता आपका पुण्य समाप्त होने के बाद, आप को अपने धाम से निकालकर पृथ्वी लोक पर जन्म करा देते हैँ...


ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति।


[गिता 9-21]


अर्थात... उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं अर्थात पुण्य है तब तक देवता फल देते है और पुण्य समाप्त होते ही अपने फल से निकाल कर मृत्युलोक मेँ जन्म करा देते है।


तो आप ही देखिए देवता आपका पुण्य भुगवाकर आपको अपने धाम से धकेल देते हैँ मृत्युलोक मेँ और परमेश्वरके परम धाम को प्राप्त हुआ मनुष्य पुर्नजन्म को प्राप्त नहिं होँता यहीँ हानी देवता भक्ति की आप को देवता कभी मोक्ष नहीँ दे सकते यह हमने पहले प्रमाण मेँ हीँ बता दिया था...





भगवान श्रीकृष्ण कहते है की,

मद्याजिनोऽपि माम्‌ ॥ [गिता 9-25]


अर्थात, मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसीलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता। ॥25॥



और जो भक्त सभी देवताओँ और परमेश्वर को एक समझकर पुजते हैँ


ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः


[गिता 4-11] Geeta Link


अर्थात हे अर्जुन! जो भक्त मुझे देवता समझकर भजते हैं, मैं भी उनको देवताओँ का फल देता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं













आप समझ गये हैँ या नहीँ परन्तु परमेश्वरके परमधाम मेँ ही मोक्ष मिलता हैँ इसका प्रमाण अगले पेज पर...







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