क्या "राधा" या "रुख्मिणी" की भक्ती करने से श्रीकृष्ण की प्राप्ति होगी ?

हे अर्जुन! उन मुझमें (राधा मेँ नहीँ) चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ ॥Geeta 12-7॥

मुझमें मन को लगा (राधा मेँ नहीँ) और मुझमें ही बुद्धि को लगा (राधा मेँ नहीँ) , इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥Geeta 12-8॥

हे अर्जुन! तू मुझमें मन लगानेवाला हो (राधा मेँ नहीँ) , मेरा ही भक्त बन (राधा का नहीँ) , मेरा ही पूजन करने वाला हो (राधा का नहीँ) और मुझको ही प्रणाम कर (राधा को नहीँ) । ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है ॥Geeta 18-65॥

जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है (राधा को नहीँ), वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है॥Geeta 6-31॥

सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझको (राधा को नहीँ) निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है ॥Geeta 6-47॥

सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है- उसको तू मेरा ही तेज जान (राधा नही) ॥Geeta 15-12॥

और मैं ही (राधा नही) पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप अर्थात अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ ॥Geeta 15-13॥

अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ (राधा नही) ॥Geeta 9-8॥

मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान्‌ ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात्‌ अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं ॥Geeta 9-11॥

वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम (राधा का नहीँ) और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी (राधा का नहीँ) प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना (राधा की नहीँ) करते हैं ॥Geeta 9-14॥

क्रतु मैं हूँ (राधा नहीँ), यज्ञ मैं हूँ (राधा नहीँ), स्वधा मैं हूँ (राधा नहीँ), औषधि मैं हूँ (राधा नहीँ), मंत्र मैं हूँ (राधा नहीँ), घृत मैं हूँ (राधा नहीँ), अग्नि मैं हूँ (राधा नहीँ) और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ (राधा नहीँ) ॥Geeta 9-16॥

इस संपूर्ण जगत्‌ का धाता अर्थात्‌ धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ (राधा नहीँ) ॥Geeta 9-17॥

प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य,प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ (राधा नहीँ)॥Geeta 9-18॥

जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को (राधा को नहीँ) निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम स्वयं प्राप्त कर देता हूँ ॥Geeta 9-22॥

बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मकर व्यक्तिभाव को प्राप्त हुआ मानते हैं ॥Geeta 9-24॥

उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है॥Geeta 18-55॥

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ (राधा को नहीँ) सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥Geeta 18-66॥



कुछ प्रश्न और उनके समाधान

राधा का सच जानिये...