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एक साधारण से ऋषी के शाप के कारण विष्णुजी को रामावतार मेँ पत्नी विहोग का दुख भोगना पडा और...





सर्वव्यापी परमेश्वर को कर्म नहीँ बांधते...





सर्वव्यापी परमेश्वर को न तो कर्म बांधते हैँ, और न ही कर्म करके को स्पृहा (इच्छा) होतीँ हैँ, तथा परमेश्वर कर्मो मेँ लिम्पायमान भी नहीँ होता हैँ...


न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।


[गिता 4-14]


अर्थात... हेँ अर्जुन ! कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते...


न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥


[गिता 9-9]


अर्थात... हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश#स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते

(जिसके संपूर्ण कार्य कर्तृत्व भाव के बिना अपने आप सत्ता मात्र ही होते हैं उसका नाम 'उदासीन के सदृश' है।)


अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥


[गिता 13-31]


अर्थात... हे अर्जुन ! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है



उपर्युक्त गिता के श्लोको से यह प्रतित होता हैँ की

[1] परमेश्वर को कर्मोके फल मेँ स्पृहा नहीँ हैँ...

[2] कर्मो के आसक्तिरहित परमात्मा को कर्म नहीँ बांधते हैँ...

[3] परमात्मा कर्मोमे लिप्त नहीँ होता...


परन्तु अगर विष्णुजी को परमेश्वर मान लिया जाय अथवा श्रीकृष्ण को विष्णूजी का अवतार मान लिया जाये तो गिता के श्लोको के अनुसान श्रीकृष्ण कथनी और विष्णुजी के करनी मेँ विरोधाभास उत्पन्न होता हैँ...

आगे दिये गये उदाहरण मेँ हम इस बात का स्पष्टीकरण करेँगेँ...


एक बार पुष्कर मेँ ब्रह्मदेव ने यज्ञ करने की ठानी ब्रह्माजी ने दिक्षा लेकर यज्ञ आरंभ करणे के लिये अध्वर्यु के साहयता से अपनी पत्नी सावित्री को बुलाया, परंतु सावित्री को कुछ काम आने के कारण नहीँ आ सकी, इसीलीये ब्रम्हाजीने क्रोधीत होकर इंद्र को कहा की " हे इंद्र ! यज्ञकाल मेँ देरी हो गयी हैँ, इसलिये दुसरी एक कोई भी पत्नी जल्दी लेकर आवो "

तब इंद्रने जबरदस्तीँसे एक ग्वाले की लडकी पकडकर लायी और विष्णुजीने उसका गंधर्व विवाह ब्रम्हाजीसे करवाया ब्रह्माजीने उसका नाम 'गायत्री' रख दिया ।

इस घटना से सावित्री को अत्यन्त क्रोध आया और वह ब्रम्हाजी को धिक्कारने लगी ।

उसने वहा उपस्थित इंद्र, ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित ब्रम्हाणोँको भी शाप दे डाला...


भृगृवाक्येन ते जन्म यदा मर्त्ये भविष्यति ॥158॥

भार्यावियोगजं दु:खं तदा त्वं तत्र भोक्ष्यसे । हृतां ते शत्रुणा पत्नीँ परे पारे महोदधे: ॥159॥

न च त्वं ज्ञास्यसे नीतां शोकोपहतचेतन: । भ्रात्रासह परां कष्टामा पदं प्राप्य दु:खित: ॥160॥


[पद्मपुराण, सृष्टिखंड, अध्याय 17 - श्लोक 158-160]


अर्थात... भृगृ के शाप # के कारण तुम्हारा जन्म मृत्यूलोक मेँ होगा, तब वहाँ तुम्हे भार्या वियोग (पत्नी वियोग) का दु:ख भोगना पडेगा,

तुम्हारा शत्रू तुम्हारी पत्नीको समुद्रके पार लेकर जाएगा और उसके शोक के कारण तूम्हारा बुध्दिभ्रंश होकर उसको कौन लेकर गया हैँ यह तुम नहीँ जान पावोगे,

तुम अपने बंधु सहित अतिशय कष्ट को प्राप्त होकर दु:खी होगे

(पुराणो के अनुसार)

भृगु ऋषी की पत्नी मर जाने पर विष्णुजी हंस पडे तो भृगुने शाप दे दिया की आपको भी मेरे जैसा पत्नी वियोग सहना पडेगा,

और जब देवदत्त ऋषी की पत्नी गंगा तट पर थी तो उस समय विष्णुजी ने सिंह गर्जना कर दी तभी ओ सुनकर ऋषी की पत्नी मर गयी, उस वक्त भी ऋषी ने विष्णुजी को शाप दिया की मेरी तरह आप को भी पत्नी वियोग से तडपना पडेगा,

[योगवासिष्ठ वै.प्र.स.1]



एक साधारण से ऋषी के शाप के कारण विष्णुजी को रामावतार मेँ वह दुख भोगना पडा यह एक शास्वत सत्य हैँ...


और इधर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैँ की परमेश्वर को कर्म नहीँ बांधते तथा परमात्मा कर्मो मेँ लिप्त कर्मो मेँ लिप्त नहीँ होता तो क्या एक साधारण ऋषी के शाप से दु:ख भोगने पर विवश होने वाले विष्णुजी भला परमेश्वर हो सकते है ?

और किस प्रकार विष्णु और कृष्ण एक हो सकते हैँ ?


फिर भी आपको यही लगता हैँ तो और एक प्रमाण आपका इंतजार कर रहा हैँ अगले पेज पर







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